ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७६१
तुम द्वारकाको लौट जाओ, अपने धर्मकी रक्षा करो और मेरी अंशभूता एकानंशाका धर्मपूर्वक पालन करो। वत्स! कल्पवृक्षस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्णके चरणकमलका—जो पद्माद्वारा अर्चित और सबके लिये परम दुर्लभ है तथा शम्भु और सनकादि मुनीश्वर जिसका निरन्तर गुणगान करते रहते हैं—परित्याग करके कहाँ तपस्याके लिये जा रहे हो ? तुम्हारा यह कार्य तो मनोहर सुधाके त्यागके समान है। मुने ! जो स्वप्नमें भी श्रीकृष्णके चरणकमलका जप करता है, वह सौ जन्मोंमें किये हुए पापोंसे मुक्त हो जाता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। उसके द्वारा बचपन, कौमार, जवानी और वृद्धावस्थामें जानमें अथवा अनजानमें जो कुछ पाप किया होता है; वह सारा-का-सारा भस्म हो जाता है। इस भारतवर्षमें जो श्रीकृष्णके चरणकमलका साक्षात् दर्शन करता है; वह तुरंत ही पूजनीय और जीवन्मुक्त हो जाता है—यह ध्रुव है। वह करोड़ों जन्मोंके किये हुए संचित पापसे छूट जाता है और उससे सभी तीर्थ सदा पावन होते रहते हैं। जो श्रीकृष्णसे सम्बन्ध रखनेवाला है—वही व्रत, तप, सत्य, पुण्य और पूजन सफल है; क्योंकि उससे अपने जन्मचक्रका विनाश हो जाता है। वेदोंका पारगामी ब्राह्मण भी यदि श्रीकृष्णकी भक्तिसे विहीन है तो उसके सङ्गसे तथा उसके साथ वार्तालाप करनेसे भक्तोंकी भक्ति नष्ट हो जाती है। ब्राह्मण स्वयं श्रीकृष्णका स्वरूप होता है। जो श्रीकृष्णका प्रसाद खानेवाला है; उसके स्पर्शसे अग्निसे लेकर पवनतक पवित्र हो जाते हैं और वह सारे जगत्को पावन बनानेमें समर्थ हो जाता है। द्विजवर! श्रीकृष्णको छोड़कर कहाँ तपस्या करने जा रहे हो? अरे! सारी तपस्याओंका फल तो श्रीकृष्णके स्मरणसे ही प्राप्त हो जाता है। जिसके उपदेशसे परमात्मा श्रीकृष्णमें भक्ति न उत्पन्न हो, वह गुरु परम वैरी तथा जन्मको निष्फल करनेवाला है*।
पार्वतीके वचन सुनकर शंकर प्रेमविह्वल हो गये। उसके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया और वे परमेश्वरी पार्वतीकी प्रशंसा करने लगे। उधर दुर्वासा शिव और दुर्गाके चरणकमलोंमें प्रणाम करके बारंबार श्रीकृष्णके चरणका स्मरण करते हुए पुनः द्वारकाको लौट गये। वहाँ जाकर उन्होंने श्रीहरिके दर्शन किये और उन परमेश्वरकी स्तुति की। फिर एकानंशाके महलमें जाकर उसके साथ निवास करने लगे। इधर युधिष्ठिरके ध्यान करनेसे श्रीकृष्ण हस्तिनापुरको प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने परमानन्दपूर्वक कुन्ती, राजा युधिष्ठिर तथा भाइयोंसे बातचीत की। फिर युक्तिपूर्वक जरासंध आदिका वध करके मुनिवरों तथा श्रेष्ठ नरेशोंके साथ मनोवाञ्छित राजसूययज्ञ कराया, जिसमें विधिपूर्वक दक्षिणा नियत थी। उस यज्ञके अवसरपर उन्होंने शिशुपाल और दन्तवक्रको भी यमलोकका पथिक बना दिया। जिस समय शिशुपाल उस देवताओं और भूपालोंकी सभामें श्रीकृष्णकी अतिशय निन्दा कर रहा था, उसी समय उसका शरीर धराशायी हो गया और जीव श्रीहरिके परम पदकी ओर चला गया; परंतु वहाँ उन सर्वेश्वरको न देखकर वह लौट आया और माधवकी स्तुति करने लगा।
शिशुपाल बोला— माधव! तुम वेदों, वेदाङ्गों, देवताओं, असुरों और प्राकृत देहधारियोंके जनक हो। तुम सूक्ष्म सृष्टिका विधान करके उसमें कल्पभेद करते हो। तुम्हीं मायासे स्वयं ब्रह्मा, शंकर और शेष बने हुए हो। मनु, मुनि, वेद और सृष्टिपालकोंके समुदाय तुम्हारे कलांशसे तथा दिक्पाल और ग्रह आदि कलासे उत्पन्न हुए हैं। तुम स्वयं ही पुरुष, स्वयं स्त्री, स्वयं नपुंसक, स्वयं
* तपसां फलमाप्नोति श्रीकृष्णस्मरणेन च ॥
यतो भक्तिश्च न भवेत् श्रीकृष्णे परमात्मनि । स गुरुः परमो वैरी करोति जन्म निष्फलम् ॥
(११३।१९-२०)