ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वेद भी आपके रूप और गुणका थाह नहीं लगा पाते और आप महाकाशके समान सम्माननीय हैं; आपकी जय हो, जय हो। परमात्मन्! आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। श्रीहरिकी अनुमतिसे मन-ही-मन यों कहकर प्रियवर दुर्वासा श्रीकृष्णको प्रणाम करके वहीं उनके सामने खड़े हो गये। तब जगन्नाथ श्रीकृष्णने उन्हें वह ज्ञान बतलाना आरम्भ किया; जो हितकारक, सत्य, पुरातन, वेदविहित और सभी सत्पुरुषोंद्वारा मान्य था।
श्रीभगवान्ने कहा— विप्र! तुम तो शिवके अंश हो; अतः डरो मत। क्या ज्ञानद्वारा तुम्हें यह नहीं ज्ञात है कि मैं सबका उत्पत्तिस्थान हूँ और सभी मुझसे उत्पन्न होते हैं? मुने! मैं ही सबका आत्मा हूँ। मेरे बिना सभी शव Ocean... शवतुल्य हो जाते हैं। प्राणियोंके शरीरसे मेरे निकल जानेपर सभी शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। अकेला मैं ही उत्पन्न होकर पृथक्-पृथक्-रूपसे व्यक्त होता हूँ। जो भोजन करता है, उसीकी तृप्ति होती है; दूसरे कभी भी तृप्त नहीं होते। जीवादि समस्त प्राणियोंकी प्रतिमाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। गोलोक-स्थित रासमण्डलमें परिपूर्णतम मैं ही हूँ। राधा श्रीदामाके शापसे इस समय मेरा दर्शन नहीं कर सकती। सभी राधाके अंश-कलांशरूपसे उत्पन्न हुए हैं। रुक्मिणीके भवनमें राधाका अंश है और अन्य सभी रानियोंके महलोंमें कलाएँ हैं। मेरा भी शरीरधारियोंकी प्रतिमाओंमें कहीं अंश, कहीं कलाकी कला और कहीं कलाका कलांश वर्तमान है। इतना कहकर जगदीश्वर महलके भीतर चले गये और दुर्वासाजी अपनी प्रिया एकानंशाको त्यागकर श्रीहरिके लिये तप करने चले गये।
(अध्याय ११२)
पार्वतीद्वारा दुर्वासाके प्रति अकारण पत्नी-त्यागके दोषका वर्णन, दुर्वासाका पुनः लौटकर द्वारका जाना, श्रीकृष्णका युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें पधारना, शिशुपालका वध, उसके आत्माद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन, श्रीकृष्ण-चरितका निरूपण
श्रीनारायण कहते हैं— नारद! महर्षि दुर्वासा शिष्योंसहित द्वारकापुरीसे निकलकर भक्तिपूर्वक भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये कैलासको चले। कैलासपर पहुँचकर मुनिने शिव और शिवाको नमस्कार किया तथा शिष्योंसहित पवित्रभावसे प्रणत होकर परम भक्तिके साथ उनकी स्तुति की। फिर श्रीहरिका वह सारा वृत्तान्त, अपनी तपस्याका तत्त्व तथा अपने मनके वैराग्यका वर्णन किया। मुनिकी बात सुनकर सती पार्वती हँस पड़ीं और साक्षात् शंकरजीके संनिकट मुनिसे हितकारक एवं सत्य वचन बोलीं।
पार्वतीने कहा— मुने! तुम्हें धर्मका तत्त्व तो ज्ञात है नहीं, किंतु अपनेको धर्मिष्ठ मानते हो। भला, तुम अपनी संतानहीना पत्नीका परित्याग करके कहाँ तपस्याके लिये जा रहे हो? जो अपनी कुलीना पतिव्रता युवती पत्नीको संतानहीन अवस्थामें त्यागकर संन्यासी, ब्रह्मचारी अथवा यति हो जाता है; व्यापार अथवा नौकर आदिके निमित्त चिरकालके लिये दूर चला जाता है, मोक्षके हेतु अथवा आवागमनका विनाश करनेके लिये तीर्थवासी अथवा तपस्वी हो जाता है, उसे पत्नीके शापसे मोक्ष तो मिलता नहीं; उलटे धर्मका नाश हो जाता है—परलोकमें उसे निश्चय ही नरककी प्राप्ति होती है और इस लोकमें उसकी कीर्ति नष्ट हो जाती है। ऐसा कमलजन्मा ब्रह्माने कहा है। इसलिये हे विप्र! इस समय