ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड
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क्रमशः सात रमणियोंका पाणिग्रहण किया। उनके नाम हैं—कालिन्दी, सत्यभामा, सत्या, सती, नाग्नजिती, जाम्बवती और लक्ष्मणा। उन्होंने क्रमशः इनके साथ विवाह किये और पुत्र उत्पन्न किये। उनमें एक-एकसे क्रमशः दस-दस पुत्र और एक-एक कन्या उत्पन्न हुई। तत्पश्चात् श्रीकृष्णने राजाधिराज नरकासुरको पुत्रसहित मारकर रणके मुहानेपर महाबली मुर दैत्यको भी यमलोकका पथिक बना दिया। वहाँ उसके महलमें श्रीकृष्णको सोलह हजार कन्याएँ दीख पड़ीं, जिनकी अवस्था सौ वर्षसे ऊपर हो चुकी थी; परंतु उनका यौवन सदा स्थिर रहनेवाला था। वे सब-की-सब रत्नाभूषणोंसे विभूषित थीं तथा उनके मुख प्रफुल्लित थे। माधवने शुभ मुहूर्तमें उन सबका पाणिग्रहण किया और शुभकालमें क्रमशः उन सबके साथ रमण किया उनमें भी प्रत्येकसे क्रमशः दस-दस पुत्र और एक-एक कन्याका जन्म हुआ। इस प्रकार श्रीहरिके पृथक्-पृथक् इतनी संतानें उत्पन्न हुईं।
नारद ! एक समयकी बात है। मुनिवर दुर्वासा अनायास घूमते-घूमते रमणीय द्वारकापुरीमें आये। उस समय उनके साथ तीन करोड़ शिष्य भी थे। उन्हें आया देखकर पुत्र और पुरोहितके साथ महाराज उग्रसेन, वसुदेव, श्रीकृष्ण, अक्रूर तथा उद्धवने षोडशोपचारद्वारा मुनिवरकी पूजा करके उन्हें प्रणाम किया। ब्रह्मन् ! तब मुनिवरने उन्हें पृथक्-पृथक् शुभाशीर्वाद दिये। तदनन्तर वसुदेवजीने अपनी कन्या एकानंशाको शुभ मुहूर्तमें महर्षि दुर्वासाको दान कर दिया और बहुत-से मोती, माणिक्य, हीरे तथा रत्न दहेजमें दिये। उन्होंने दुर्वासाको बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित एक सुन्दर आश्रम भी दिया।
एक बार मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाने अपने मनमें विचारकर देखा कि कहीं तो श्रीकृष्ण रत्ननिर्मित मनोहर पलंगपर शयन कर रहे हैं, कहीं वे सर्वव्यापी प्रभु श्रद्धापूर्वक पुराणकी कथा सुन रहे हैं, कहीं सुन्दर आँगनमें महोत्सव मनानेमें संलग्न हैं, कहीं सत्याद्वारा भक्तिपूर्वक दिया गया ताम्बूल चबा रहे हैं, कहीं शय्यापर पौढ़े हैं और रुक्मिणी श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रही हैं, कहीं आनन्दपूर्वक शयन कर रहे हैं और कालिन्दी उनके चरण दबा रही हैं; फिर सुधर्मा-सभामें सुन्दर रूप धारण करके सत्समाजके मध्य विराज रहे हैं। ऐश्वर्यशाली मुनिने सर्वत्र उनके साथ समान रूपसे सम्भाषण किया। इस परम अद्भुत दृश्यको देखकर विप्रवर दुर्वासाको महान् विस्मय हुआ। तब वे पुनः रुक्मिणीके महलमें उन जगदीश्वरकी स्तुति करने लगे।
दुर्वासा बोले—जगदीश्वर ! आप सबपर विजय पानेवाले, जनार्दन, सबके आत्मस्वरूप, सर्वेश्वर, सबके कारण, पुरातन, गुणरहित, इच्छासे परे, निर्लिप्त, निष्कलङ्क, निराकार, भक्तानुग्रह-मूर्ति, सत्यस्वरूप, सनातन, रूपरहित, नित्य नूतन और ब्रह्मा, शिव, शेष तथा कुबेरद्वारा वन्दित हैं। लक्ष्मी आपके चरणकमलोंकी सेवा करती रहती हैं। आप ब्रह्मज्योति और अनिर्वचनीय हैं,