ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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उसपर अमूल्य रत्नोंके कलश चमक रहे थे और वह श्वेत चँवरों, दर्पणों तथा अग्निशुद्ध पवित्र वस्त्रोंद्वारा सब ओरसे सुशोभित था। तदनन्तर रुक्मिणीदेवीसे पूर्वकालमें शिवके द्वारा भस्मीभूत कामदेव प्रकट हुए। उन्होंने शम्बरासुरका वध करके अपनी पतिव्रता पत्नी रतिको प्राप्त किया। उस समय रति देवताके संकेतसे 'मायावती' नाम धारण करके शम्बरासुरके महलमें उसकी गृहिणी बनकर रहती थी; परंतु उसकी शय्यापर स्वयं न जाकर अपनी छायाको भेजती थी।
नारदने पूछा— महाभाग ! कामदेव (प्रद्युम्न)-ने किस प्रकार दैत्यराज शम्बरका वध किया था ? वह शुभ कथा विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
श्रीनारायणने कहा— नारद ! एक सप्ताहके व्यतीत होनेपर दैत्यराज शम्बर रुक्मिणीके सूतिकागृहसे बालकको लेकर वेगपूर्वक अपने वासस्थानको चला गया। वह दैत्यराज पुत्रहीन था; अतः उस पुत्रको पाकर उसे महान् हर्ष हुआ। फिर उसने प्रसन्नतासे वह बालक मायावतीको दे दिया। उसे पाकर सती मायावतीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर सरस्वतीदेवीने आकर मायावती (रति)-को और श्रीकृष्ण-पुत्र (कामदेव)-को समझाया कि तुम दोनों पत्नी-पति हो। शिवके कोपसे भस्म हुए कामदेवने ही श्रीकृष्णके पुत्ररूपसे जन्म लिया है; अतएव तुम दोनों पति-पत्नीकी भाँति रहो।
तब वे पति-पत्नीकी भाँति रहने लगे। इस बातका शम्बरासुरको पता लग गया। तब वह दोनोंकी भर्त्सना करके उन्हें मारने दौड़ा। उसने शिवजीका दिया हुआ शूल चलाया। इसी बीच पवनदेवने चुपके-से दुर्गाका स्मरण करनेको कहा। दुर्गाका स्मरण करते ही शिव-शूल रमणीय और मनोहर मालाके रूपमें परिणत हो गया। तदनन्तर कामदेवने हर्षपूर्वक ब्रह्मास्त्रद्वारा उस दैत्यको मार डाला और रतिको लेकर वे विमानद्वारा द्वारकापुरीको चले गये। उनके पीछे समस्त देवगण स्वयं पार्वतीकी स्तुति करके चले। रुक्मिणीने मङ्गल-कार्य सम्पन्न करके रतिको और अपने पुत्रको ग्रहण किया। श्रीहरिने स्वस्त्ययनपूर्वक परम उत्सव कराया, ब्राह्मणोंको जिमाया और पार्वतीकी पूजा की।
तदनन्तर श्रीकृष्णने वेदोक्त शुभ दिन आनेपर