ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७५७
सिद्धगण, मुनीन्द्र, भक्तसमुदाय, ब्रह्मा, शिव और शेष योगद्वारा जिन्हें बाँध नहीं सके; वह तुम्हारे ओखली-मूलसे कैसे बँध गया? अतः सति। भारतवर्षमें शीघ्र ही हृत्कमलके मध्यमें स्थित परमेश्वररूप अपने पुत्रका प्रेम, भक्ति, स्तवन, पूजन और यत्नपूर्वक ध्यान करते हुए भजन करो। गोपी! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, वह वरदान माँग लो। इस समय जगत्में जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ होगा, वह सब कुछ मैं तुम्हें प्रदान करूँगी।
यशोदाने कहा—राधे! श्रीहरिके चरणोंमें निश्चल भक्ति तथा उनकी दासता—यही मेरा अभीष्ट वर है। साथ ही तुम्हारे नामकी क्या व्युत्पत्ति है—यह भी मुझे बतलानेकी कृपा करो।
श्रीराधिका बोलीं—यशोदे! मेरे वरदानसे तुम्हारी श्रीहरिके चरणोंमें निश्चल भक्ति हो और तुम्हें श्रीहरिकी दुर्लभ दासता प्राप्त हो। अब उत्तम निर्णयका वर्णन करती हूँ, सुनो। पूर्वकालमें नन्दने मुझे भाण्डीर-वटके नीचे देखा था, उस समय मैंने व्रजेश्वर नन्दको वह रहस्य बतलाया था और उसे प्रकट करनेको मना कर दिया था। मैं ही स्वयं राधा हूँ और रायाण गोपकी भार्या मेरी छायामात्र है। रायाण श्रीहरिके अंश, श्रेष्ठ पार्षद और महान् हैं।
जिनके रोमकूपोंमें अनेकों विश्व वर्तमान हैं, वे महाविष्णु ही ‘रा’ शब्द हैं और ‘धा’ विश्वके प्राणियों तथा लोकोंमें मातृवाचक धाय है; अतः मैं इनकी दूध पिलानेवाली माता, मूलप्रकृति और ईश्वरी हूँ। इसी कारण पूर्वकालमें श्रीहरि तथा विद्वानोंने मेरा नाम ‘राधा’ रखा है*। इस समय मैं सुदामाके शापसे वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई हूँ। अब सौ वर्ष पूरे होनेतक मेरा श्रीहरिके साथ वियोग बना रहेगा। मेरे पिता वृषभानु श्रीकृष्णके श्रेष्ठ पार्षद और महान् हैं तथा मेरी माता कलावती पितरोंकी मानसी कन्या हैं। इस भारतवर्षमें मेरी माता तथा मैं—दोनों अयौनिजा हैं। पुनः तुमलोगोंके साथ श्रीहरिके परमपदको प्राप्त होंगी। व्रजेश्वरि! इस प्रकार मैंने तुम्हें सारा भक्त्यात्मक ज्ञान बतला दिया। सति! तब तुम अपने ज्ञानी स्वामी व्रजेश्वरके साथ व्रजको लौट जाओ; क्योंकि इस समय तुम्हीं मेरे ध्यानमें रुकावट डालनेवाली हो। सुन्दरि! ध्यानभङ्ग हो जानेपर मनुष्योंको महान् दोषका भागी होना पड़ता है।
(अध्याय १११)
प्रद्युम्नाख्यान-वर्णन, श्रीकृष्णका सोलह हजार आठ रानियोंके साथ विवाह और उनसे संतानोत्पत्तिका कथन, दुर्वासाका द्वारकामें आगमन और वसुदेव-कन्या एकानंशाके साथ विवाह, श्रीकृष्णके अद्भुत चरित्रको देखकर दुर्वासाका भयभीत होना, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और दुर्वासाका पत्नीको छोड़कर तपके लिये जाना
श्रीनारायण कहते हैं—मुने! द्वारकामें पहुँचकर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वसुदेवजीकी आज्ञासे रुक्मिणीके रत्ननिर्मित श्रेष्ठ भवनमें गये। वह भवन शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल, बहुमूल्य रत्नोंद्वारा रचित, सामने तथा चारों ओरसे रमणीय और नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित था।
* राशब्दश्च महाविष्णुर्विश्वानि यस्य लोमसु । विश्वप्राणिषु विश्वेषु धा धात्री मातृवाचकः ॥
धात्री माताहमेतेषां मूलप्रकृतिरीश्वरी । तेन राधा समाख्याता हरिणा च पुरा बुधैः ॥
(१११ । ५७-५८)