ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७५६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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उनके दास्य कर्ममें ‘ण’ का प्रयोग होता है। उन दोनोंके दाता जो देवता हैं, उन्हें ‘कृष्ण’ कहा जाता है। भक्तोंके कोटिजन्मार्जित पापों और क्लेशोंमें ‘कृषि’ का तथा उनके नाशमें ‘ण’ का व्यवहार होता है; इसी कारण वे ‘कृष्ण’ कहे जाते हैं। सहस्र दिव्य नामोंकी तीन आवृत्ति करनेसे जो फल प्राप्त होता है; वह फल ‘कृष्ण’ नामकी एक आवृत्तिसे ही मनुष्यको सुलभ हो जाता है। वैदिकोंका कथन है कि ‘कृष्ण’ नामसे बढ़कर दूसरा नाम न हुआ है, न होगा। ‘कृष्ण’ नाम सभी नामोंसे परे है। हे गोपी! जो मनुष्य ‘कृष्ण-कृष्ण’ यों कहते हुए नित्य उनका स्मरण करता है; उसका उसी प्रकार नरकसे उद्धार हो जाता है, जैसे कमल जलका भेदन करके ऊपर निकल आता है। ‘कृष्ण’ ऐसा मङ्गल नाम जिसकी वाणीमें वर्तमान रहता है, उसके करोड़ों महापातक तुरंत ही भस्म हो जाते हैं। ‘कृष्ण’ नाम-जपका फल सहस्रों अश्वमेध-यज्ञोंके फलसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उनसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति होती है; परंतु नाम-जपसे भक्त आवागमनसे मुक्त हो जाता है। समस्त यज्ञ, लाखों व्रत, तीर्थस्नान, सभी प्रकारके तप, उपवास, सहस्रों वेदपाठ, सैकड़ों बार पृथ्वीकी प्रदक्षिणा—ये सभी इस ‘कृष्णनाम’-जपकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते*। उन उपर्युक्त कर्मोंके लोभसे मनुष्योंको चिरकालके लिये स्वर्गरूप फलकी प्राप्ति होती है और उस स्वर्गसे पतन होना निश्चित है; परंतु जपकर्ता पुरुष श्रीहरिके परम पदको प्राप्त कर लेता है।
‘क’ जलको कहते हैं; उस जलमें तथा समस्त शरीरोंमें भी जो आत्मा शयन करता है; उस देवको सभी वैदिक लोग ‘केशव’ कहते हैं। ‘कंस’ शब्दका प्रयोग पातक, विघ्न, रोग, शोक और दानवके अर्थमें होता है, उनका जो ‘अरि’ अर्थात् हनन करनेवाला है; वह ‘कंसारि’ कहा जाता है। जो रुद्ररूपसे नित्य विघ्नोंका तथा भक्तोंके पातकोंका संहार करते रहते हैं, इसी कारण वे ‘हरि’ कहलाते हैं। जो ब्रह्मस्वरूपा ‘मा’ मूलप्रकृति, ईश्वरी, नारायणी, सनातनी विष्णुमाया, महालक्ष्मीस्वरूपा, वेदमाता सरस्वती, राधा, वसुन्धरा और गङ्गा नामसे विख्यात हैं, उनके स्वामी (धव) को ‘माधव’ कहते हैं।
यशोदे! ब्रह्मा, विष्णु, महेश और शेष आदि जिनकी वन्दना करते हैं; सनकादि मुनि ध्यानद्वारा जिनका कुछ भी रहस्य नहीं जान पाते और वेद-पुराण जिनका निरूपण करनेमें असमर्थ हैं; उन माखनचोरका भक्तिपूर्वक भजन करो। दूध, दही, घी, नया मथकर तैयार किया हुआ मट्ठा—ये सब कहाँ हैं, उनका चुरानेवाला कहाँ है, तुम कहाँ हो और तुम्हारा भवबन्धन कहाँ है? योगी,
* कृषिरुत्कृष्टवचनो णश्च सद्द्भक्तिवाचकः। अश्रापि दातृवचनः कृष्णं तेन विदुर्बुधाः॥
कृषिश्च परमानन्दे णश्च तद्दास्यकर्मणि। तयोर्दाता च यो देवस्तेन कृष्णः प्रकीर्तितः॥
कोटिजन्मार्जिते पापं कृषिः क्लेशे च वर्तते। भक्तानां णश्च निर्वाणे तेन कृष्णः प्रकीर्तितः॥
सहस्रनाम्नां दिव्यानां त्रिरावृत्त्या च यत्फलम्। एकावृत्त्या तु कृष्णस्य तत्फलं लभते नरः॥
कृष्णनाम्नः परं नाम न भूतं न भविष्यति। सर्वेभ्यश्च परं नाम कृष्णेति वैदिका विदुः॥
कृष्ण कृष्णेति हे गोपि यस्तं स्मरति नित्यशः। जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम्॥
कृष्णेति मङ्गलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते। भस्मीभवन्ति सद्यस्तन्महापातककोटयः॥
अश्वमेधसहस्रेभ्यः फलं कृष्णजपस्य च। वरं तेभ्यः पुनर्जन्म नातो भक्तपुनर्भवः॥
सर्वेषामपि यज्ञानां लक्षाणि च व्रतानि च। तीर्थस्नानानि सर्वाणि तपांस्यनशनानि च॥
वेदपाठसहस्राणि प्रदक्षिण्यं भुवः शतम्। कृष्णनामजपस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥