ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड
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करता है इसी कारण विद्वान्लोग उसे 'राम' कहते हैं। रमाका रमणस्थान होनेके कारण राम-तत्त्ववेत्ता 'राम' बतलाते हैं। 'रा' लक्ष्मीवाची और 'म' ईश्वरवाचक है; इसलिये मनीषीगण लक्ष्मीपतिको 'राम' कहते हैं। सहस्रों दिव्य नामोंके स्मरणसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल निश्चय ही 'राम' शब्दके उच्चारणमात्रसे मिल जाता है¹।
विद्वानोंका कथन है कि 'नार' शब्दका अर्थ सारूप्य-मुक्ति है; उसका जो देवता 'अयन' है, उसे 'नारायण' कहते हैं। किये हुए पापको 'नार' और गमनको 'अयन' कहते हैं। उन पापोंका जिससे गमन होता है, वही ये 'नारायण' कहे जाते हैं। एक बार भी 'नारायण' शब्दके उच्चारणसे मनुष्य तीन सौ कल्पोंतक गङ्गा आदि समस्त तीर्थोंमें स्नानके फलका भागी होता है। 'नार' को पुण्य मोक्ष और 'अयन' को अभीष्ट ज्ञान कहते हैं। उन दोनोंका ज्ञान जिससे हो, वे ही ये प्रभु 'नारायण' हैं।²
जिसका चारों वेदों, पुराणों, शास्त्रों तथा अन्यान्य योगग्रन्थोंमें अन्त नहीं मिलता; इसी कारण विद्वान्लोग उसका नाम 'अनन्त' बतलाते हैं। 'मुकु' अध्ययमान, निर्माण और मोक्षवाचक है; उसे जो देवता देता है, उसी कारण वह 'मुकुन्द' कहा जाता है। 'मुकु' वेदसम्मत भक्तिरसपूर्ण प्रेमयुक्त वचनको कहते हैं; उसे जो भक्तोंको देता है वह 'मुकुन्द' कहलाता है। चूँकि वे मधु दैत्यका हनन करनेवाले हैं, इसलिये उनका एक नाम 'मधुसूदन' है। यों संतलोग वेदमें विभिन्न अर्थका प्रतिपादन करते हैं। 'मधु' नपुंसकलिङ्ग तथा किये हुए शुभाशुभ कर्म और माध्वीक (महुएकी शराब)-का वाचक है; अतः उसके तथा भक्तोंके कर्मोंके सूदन करनेवालेको 'मधुसूदन' कहते हैं। जो कर्म परिणाममें अशुभ और भ्रान्तोंके लिये मधुर है उसे 'मधु' कहते हैं, उसका जो 'सूदन' करता है; वही 'मधुसूदन' है।
'कृषि' उत्कृष्टवाची, 'ण' सद्भक्तिवाचक और 'अ' दातृवाचक है; इसीसे विद्वान्लोग उन्हें 'कृष्ण' कहते हैं। परमानन्दके अर्थमें 'कृषि' और
अङ्कुरो भक्तिवृक्षस्य भक्तसङ्गेन वर्धते। परं हरिकथालापपीयूषासेचनेन च॥
अभक्तालापदीप्ताग्निज्वालायाः कलयापि च। अङ्कुरं शुष्कतां याति पुनः सेकेन वर्धते॥
तस्माद्भक्तसङ्गं च सावधानः परित्यज। यथा दृष्ट्वा कालसर्पं नरो भीतः पलायते॥
यशोदे च प्रयत्नेन स्वात्मनः पुत्रमीश्वरम्। भजस्व परया भक्त्या परमात्मानमीश्वरम्॥
राम नारायणानन्त मुकुन्द मधुसूदन। कृष्ण केशव कंसारे हरे वैकुण्ठ वामन॥
इत्येकादश नामानि पठेद् वा पाठयेदिति। जन्मकोटिसहस्राणां पातकादेव मुच्यते॥
(१११। ११–१७)
¹- राशब्दो विश्ववचनो मश्चापीश्वरवाचकः। विश्वानामीश्वरो यो हि तेन रामः प्रकीर्तितः॥
रमते रमया सार्धं तेन रामं विदुर्बुधाः। रमाणां रमणस्थानं रामं रामविदो विदुः॥
राश्चेति लक्ष्मीवचनो मश्चापीश्वरवाचकः। लक्ष्मीपतिं गतिं रामं प्रवदन्ति मनीषिणः॥
नाम्नां सहस्रं दिव्यानां स्मरणे यत्फलं लभेत्। तत्फलं लभते नूनं रामोच्चारणमात्रतः॥
(१११। १८–२१)
²- सारूप्यमुक्तिवचनो नारेति च विदुर्बुधाः। यो देवोऽप्यायनं तस्य स च नारायणः स्मृतः॥
नाराश्च कृतपापाश्चाप्ययनं गमनं स्मृतम्। यतो हि गमनं तेषां सोऽयं नारायणः स्मृतः॥
सकृन्नारायणेत्युक्त्वा पुमान् कल्पशतत्रयम्। गङ्गादिसर्वतीर्थेषु स्नातो भवति निश्चितम्॥
नारं च मोक्षणं पुण्यमयनं ज्ञानमीप्सितम्। तयोर्ज्ञानं भवेद् यस्मात् सोऽयं नारायणः प्रभुः॥
(१११। २२–२५)