भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 764, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 764

७५४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

निकट आयी हूँ। सति! श्रीहरिने ही मुझे तुम्हारे पास भेजा है। अब तुम उन गदाधरका मङ्गल-समाचार एवं मङ्गल-संदेश सुनो। तुम्हें शीघ्र ही उन श्रीकृष्णके दर्शन होंगे। हे देवि! होशमें आ जाओ और इस समय मुझे भक्त्यात्मक ज्ञानका उपदेश दो। हम दोनों तुम्हारे पतिके उपदेशसे तुम्हारे पास आये हैं। वरानने! इसके बाद श्रीहरि तुम्हारे पास आयेंगे और तुम शीघ्र ही श्रीदामाके शापसे मुक्त हो जाओगी। इस प्रकार यशोदाके वचन सुनकर और गदाधरका समाचार पाकर श्रीकृष्णके नामस्मरणसे राधाका अमङ्गल दूर हो गया। वे भीतर-ही-भीतर श्रीकृष्णकी सम्भावना करके चेतनामें आ गयीं और शान्त होकर मधुर वाणीसे परमोत्तम लौकिकी भक्तिका वर्णन करने लगीं।

(अध्याय ११०)


राधिकाद्वारा 'राम' आदि भगवन्नामोंकी व्युत्पत्ति और उनकी प्रशंसा तथा यशोदाके पूछनेपर अपने 'राधा' नामकी व्याख्या करना

राधिकाने कहा—यशोदे! स्त्रीजाति तो वस्तुतः यों ही अबला, मूढ़ और अज्ञानमें तत्पर रहनेवाली होती है; तिसपर भी श्रीकृष्णके विरहसे मेरी चेतना निरन्तर नष्ट हुई रहती है। ऐसी दशामें पाँच प्रकारके ज्ञानोंमें, जो सर्वोत्तम भक्त्यात्मक ज्ञान है, उसके विषयमें मैं क्या कह सकती हूँ? तथापि जो कुछ तुमसे कहती हूँ, उसे सुनो। यशोदे! तुम इन सारे नश्वर पदार्थोंका परित्याग करके पुण्यक्षेत्र भारतमें स्थित रमणीय वृन्दावनमें जाओ। वहाँ निर्मल यमुनाजलमें त्रिकाल स्नान करके सुकोमल चन्दनसे अष्टदल कमल बनाकर शुद्ध मनसे गर्ग-प्रदत्त ध्यानद्वारा परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्णका भलीभाँति पूजन करो और आनन्दपूर्वक उनके परमपदमें लीन हो जाओ। सति! सौ पूर्व पुरुषोंके साथ अपने कर्मका उच्छेद करके सदा वैष्णवोंके ही साथ वार्तालाप करो। भक्त अग्निकी ज्वाला, पिंजरेमें बंद होना, काँटोंमें रहना और विष खाना स्वीकार करता है, परंतु हरिभक्तिरहित लोगोंका सङ्ग ठीक नहीं समझता; क्योंकि वह नाशका कारण होता है। भक्तिहीन पुरुष स्वयं तो नष्ट होता ही है, साथ ही दूसरेकी बुद्धिमें भेद उत्पन्न कर देता है। भक्तके सङ्गसे तथा हरिकथालापरूपी अमृतके सिञ्चनसे भक्तिरूपी वृक्षका अङ्कुर बढ़ता है; किंतु भक्तिहीनोंके साथ वार्तालापरूपी प्रदीप्ताग्निकी ज्वालाकी एक कलाके स्पर्शसे भी वह अङ्कुर सूख जाता है; फिर सींचनेसे ही उसकी वृद्धि होती है। इसलिये सावधान होकर भक्तिहीनोंके सङ्गका उसी प्रकार परित्याग कर देना चाहिये, जैसे मनुष्य कालसर्पको देखकर डरके मारे दूर भाग जाते हैं। यशोदे! अपने ऐश्वर्यशाली पुत्रका, जो साक्षात् परमात्मा और ईश्वर हैं, उत्तम भक्तिके साथ भजन करो। उनके राम, नारायण, अनन्त, मुकुन्द, मधुसूदन, कृष्ण, केशव, कंसारे, हरे, वैकुण्ठ, वामन—इन ग्यारह नामोंको जो पढ़ता अथवा कहलाता है, वह सहस्रों कोटि जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है*।

'रा' शब्द विश्ववाची और 'म' ईश्वरवाचक है, इसलिये जो लोकोंका ईश्वर है उसी कारण वह 'राम' कहा जाता है। वह रमाके साथ रमण


* वरं हुतवहज्वालां भक्तोवाञ्छति पञ्जरम्। वरं च कण्टके वासं वरं च विषभक्षणम्॥
हरिभक्तिविहीनानां न सङ्गं नाशकारणम्। स्वयं नष्टो भक्तिहीनो बुद्धिभेदं करोति च॥