भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 763, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 763

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७५३ श्रीभगवान्ने कहा—माँ! जो भक्त्यात्मक ज्ञान है, वह तुम्हें राधा बतलायेगी। यदि तुम राधाके प्रति मानवभावका त्याग करके उसकी आज्ञाका पालन करोगी तो जो ज्ञान मैंने नन्दजीको दिया है; वही ज्ञान वह तुम्हें प्रदान करेगी। अतः अब नन्दजीके साथ आदरपूर्वक नन्द-ब्रजको लौट जाओ। इतना कहकर और विनय प्रदर्शित करके श्रीहरि महलके भीतर चले गये। तब नन्दजी यशोदाके साथ कदलीवनको गये। वहाँ उन्होंने राधाको देखा, जो पङ्कस्थ चन्दनचर्चित जलयुक्त कमल-दलकी शय्यापर अचेत हो शयन कर रही थीं। राधाने अपने अङ्गोंसे भूषणोंको उतार फेंका था, उनके शरीरपर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहा था, आहारका त्याग कर देनेसे उनका उदर कृश हो गया था, मूर्च्छितावस्थामें उनके ओष्ठ सूख गये थे और नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे। वे परमात्मा श्रीकृष्णके चरणकमलका ध्यान कर रही थीं, उनका चित्त एकमात्र उन्हींमें निविष्ट था और बाह्यज्ञान लुप्त हो गया था। वे बीच-बीचमें मुखकमलको ऊपर उठाकर मन्द मुस्कानयुक्त प्रियतम श्रीकृष्णका मार्ग जोहती रहती थीं। स्वप्नमें प्रियतमके समीप पहुँचकर कभी हँसती और कभी रोती थीं। सखियाँ चारों ओरसे श्वेत चँवरद्वारा निरन्तर उनकी सेवा कर रही थीं। राधाकी यह दशा देखकर भार्यासहित नन्दको महान् विस्मय हुआ। उन्होंने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर परम भक्तिके साथ राधाको नमस्कार किया। उसी समय ईश्वरेच्छासे सहसा राधाकी नींद उचट गयी। वे जाग पड़ीं और क्षणभरमें ही उन्हें विषयज्ञानरहित चेतना प्राप्त हो गयी। तब वे उस सखी-समाजमें सामने पति-पत्नी नन्द-यशोदाको देखकर उनसे आदरपूर्वक पूछते हुए मधुर वचन बोलीं। राधिकाने पूछा—बतलाओ, तुम कौन हो और यहाँ किस प्रयोजनसे आये हो? सुनो; मुझे विषयज्ञान नहीं है। मैं यह भी नहीं जान पाती कि कौन मनुष्य है कौन पशु; कौन जल है कौन स्थल; और कौन रात है कौन दिन? यहाँतक कि मुझे स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसकका भी भेद नहीं ज्ञात होता। राधिकाकी बात सुनकर नन्दको महान् विस्मय हुआ। तब गोपी यशोदा सम्भाषण करनेके लिये डरते-डरते राधाके निकट गयीं और उनके पास ही बैठकर प्रिय वचन बोलीं। नन्द भी वहीं यशोदाद्वारा दिये गये आसनपर बैठ गये। तब यशोदाने कहा—राधे! चेत करो; तुम यत्नपूर्वक अपनी रक्षा करो; क्योंकि मङ्गल दिन आनेपर तुम अपने प्राणनाथके दर्शन करोगी। सुरेश्वरि ! तुमने अपने कुल तथा विश्वको पवित्र कर दिया है। तुम्हारे चरणकमलकी सेवासे ये गोपियाँ पुण्यवती हो गयी हैं। जनसमूह, संतगण, चारों वेद और पुरातन पुराण तुम्हारी तीर्थोंको पावन बनानेवाली सुमङ्गल कीर्तिका गान करेंगे। बुद्धिरूपे ! मैं यशोदा हूँ, ये नन्द हैं और तुम वृषभानुनन्दिनी राधा हो। सुव्रते ! मेरी बात सुनो। भद्रे ! मैं द्वारका नगरसे श्रीकृष्णके पाससे तुम्हारे