ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७५- बलरामसहित श्रीकृष्णका विद्या पढ़नेके लिये महर्षि सांदीपतिके निकट जाना, गुरु और गुरुपत्नीद्वारा उनका स्वागत और विद्याध्ययनके पश्चात् गुरुदक्षिणारूपमें गुरुके मृतक पुत्रको उन्हें वापस देकर घर लौटना
७३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण इच्छारहित, परमात्मा, ईश्वर, अविनाशी, सत्य, परब्रह्म, प्रकृतिसे परे, परमेश्वर, परिपूर्णतम, शुद्ध, भक्तानुग्रहमूर्ति, कर्मियोंके कर्मोंके साक्षी, निर्लिप्त, ज्योतिःस्वरूप, कारणोंके भी परम कारण, सर्वस्वरूप, सर्वेश्वर, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता, शुभदायक, अपने भक्तोंको भक्ति, दास्य और अपनी सम्पत्ति प्रदान करनेवाले हैं; अतः अशुभकारक मात्सर्य तथा ज्ञाति-बुद्धिको छोड़कर आनन्दपूर्वक उन परमानन्दस्वरूप नन्दनन्दनका भजन करो। वेदकी कौथुमि-शाखामें उनका सहस्रनाम नन्दनन्दन नामसे वर्णित है। नारद ! यह सब सुनकर उद्धव परम विस्मित हुए और उस सम्पूर्ण ज्ञानको पाकर ज्ञानसे परिपूर्ण हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने अपने वस्त्रको गलेमें लपेट लिया और दण्डकी भाँति भूतलपर लेटकर मस्तकके बालोंसे राधिकाके चरणका स्पर्श करते हुए वे बारंबार उन्हें प्रणाम करने लगे। उस समय भक्तिके कारण उनके सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया था और नेत्रोंमें आँसू छलक आये थे। वे प्रेमवश तथा राधाके वियोगजन्य शोकसे व्यथित होकर उच्चस्वरसे रुदन करने लगे। तब उद्धवके प्रति प्रेम होनेके कारण राधा और गोपियाँ भी रोने लगीं। फिर उन्होंने उद्धवका गला पकड़कर बैठाया; परंतु उद्धवकी चेतना लुप्त हो गयी थी; अतः वे जँभाई लेते हुए मूर्च्छित हो गये। उनकी यह दशा देखकर राधिकाने शीघ्र ही उन कृष्णगतप्राण उद्धवको उठाकर बैठाया और उनके मुखकमलपर जलके छींटे देकर उन्हें चैतन्य कराया। नारद ! तत्पश्चात् उन्होंने 'वत्स ! चिरञ्जीव'—यों शुभाशीर्वाद दिया। तब उद्धव होशमें आकर उस उत्तम सभाके मध्य रोती हुई गोपियोंके सामने राधासे परमार्थप्रद वचन बोले। उद्धवने कहा—परम दुर्लभ जम्बूद्वीप सभी द्वीपोंमें धन्य और प्रशंसनीय है; क्योंकि उसमें श्रेष्ठ भारतवर्ष है, जिसकी सभी लोग कामना करते हैं। अहो ! उस भारतवर्षमें वृन्दावन नामक पुण्यवन है; जो श्रीराधाके चरणकमलके स्पर्शसे गिरी हुई रजसे पावन है और जिसके लिये देवगण भी लालायित रहते हैं। तीर्थपावनी राधाके चरणकमलकी रजसे पावन हुई वहाँकी भूमि तीनों लोकोंमें धन्य, मान्य, श्रेष्ठ और पूजनीय मानी जाती है। पूर्वकालमें ब्रह्माने गोलोकमें राधिका और श्रीकृष्णके दर्शनकी लालसासे पुष्करक्षेत्रमें वेदोक्त विधिके अनुसार भक्तिपूर्वक साठ हजार दिव्य वर्षोंतक तप किया; परंतु उस समय स्वप्नमें भी उन्हें गोलोकमें राधिका और श्रीकृष्णके दर्शन नहीं प्राप्त हुए। तदनन्तर उन्हें लीलापूर्वक सत्यरूपा आकाशवाणी सुनायी पड़ी, जो इस प्रकार थी— 'ब्रह्मन् ! वाराहकल्पके आनेपर भारतवर्षमें पुण्य वृन्दावनके मध्य जब परम रमणीय रासोत्सव प्रारम्भ होगा, तब वहीं रासमण्डलमें देवताओंके बीच बैठे हुए तुम्हें राधिका और श्रीकृष्णके दर्शन होंगे; इसमें संदेह नहीं है।' उस आकाशवाणीको सुनकर ब्रह्मा तपस्यासे विरत हो अपने लोकको लौट गये। समय आनेपर उन्हें श्रीकृष्णके दर्शन प्राप्त हुए, जिससे उनका हृदय प्रसन्न और चिरकालीन मनोरथ परिपूर्ण हो गया। अतः इन गोपों और गोपिकाओंका जन्म एवं जीवन सफल हो गया; क्योंकि ये नित्य श्रीराधाके चरणकमलको—जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये दुर्लभ है—देखती रहती हैं। योगीन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्धेन्द्र तथा वैष्णव संत सती राधिकाकी—जो मानिनी, पुण्यमयी, तीर्थोंको पावन बनानेवाली स्वतः शुद्ध और अत्यन्त दुर्लभ हैं—नित्य निरन्तर सेवा करते रहते हैं। जिससे उनको राधाका वह चरणकमल सुलभ हो जाता है, जिसका मिलना ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। सर्वेश्वरेश्वर परमात्मा श्रीकृष्णने जिनके चरणकमलोंके नखोंको महावरसे सुशोभित किया था; गोलोकमें स्थित शतशृङ्ग पर्वतपर रासमण्डलमें
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७३१ स्वयं श्रीकृष्णने सुदुर्लभ स्तोत्रराजद्वारा जिनकी पूजा की थी तथा जिनके चरणकमलोंमें कोमल दूर्वाङ्कुर, अक्षत, गन्ध और चन्दन निवेदित करके पारिजात-पुष्पोंकी पुष्पाञ्जलि समर्पित की थी; जो छत्तीस सखियोंकी स्वामिनी और तीस हजार करोड़ गोपियोंकी अधीश्वरी हैं; जिनका राधिका नाम है, जो श्रीकृष्णकी प्राणप्रिया और देवताओंकी भी पूजनीया हैं; उन सर्वश्रेष्ठ राधिकासे जो पापी द्वेष करते हैं अथवा उनकी निन्दा और हँसी उड़ाते हैं, उन्हें सौ ब्रह्महत्याका पाप लगता है; इसमें तनिक भी संशय नहीं है। उस पापके फलस्वरूप वे तप्त तैल, महाभयंकर अन्धकार, कीट और पीड़ा-यन्त्रोंसे युक्त कुम्भीपाक और रौरवनरकमें अपनी सात पीढ़ियोंके साथ चौदह इन्द्रोंकी आयुपर्यन्त यातना भोगते हैं। तत्पश्चात् लोकजन्मानुसार वे एक जन्ममें उस पापके कारण एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक विष्ठाके कीट होकर उत्पन्न होते हैं। इसके बाद उतने ही वर्षोंतक कुलटाओंकी योनिके रक्त और मलको खानेवाले योनि-कीट तथा मवाद चाटनेवाले मलकीट होते हैं। यों कहकर जब उद्धव रोने लगे और जानेके लिये उद्यत हुए, तब उनसे श्रीकृष्णके वियोगसे कातर हुई राधिका आँसू बहाती हुई पुनः बोलीं। श्रीराधिकाजीने कहा - वत्स! अब तुम मथुरापुरीको जाओ और यह सब माधवको बतलाओ। बेटा! मैं जिस प्रकार गोविन्दके शीघ्र दर्शन कर सकूँ, तुम्हें प्रयत्नपूर्वक वैसा ही करना चाहिये। अच्छा अब जाओ, मेरा जन्म तो मिथ्या दुराशासे निष्फल ही बीत गया; क्योंकि आशा ही परम दुःख है और निराशा परम सुख है। तत्पश्चात् गोविन्दका ध्यान करके राधिका जीवन्मुक्त हो गयीं। तदनन्तर राधिका पुनः वहाँ डाह मारकर रोने लगीं। तब रोती हुई राधाको प्रणाम करके उद्धव यशोदाके भवनकी ओर चले गये। नारद ! उद्धवके चले जानेपर राधा मूच्छित हो गयीं। उनकी चेतना लुप्त हो गयी और वे निरन्तर ध्यानमें तत्पर हो गयीं। मुने! तब श्रेष्ठ गोपियोंने कमल-सदृश नेत्रोंमें आँसू भरकर राधिकाको गीली भूमिपर बिछे हुए जलयुक्त कमलदलकी शय्यापर लिटाया; परंतु राधाके गात्रस्पर्शमात्रसे ही वह शय्या भस्म हो गयी। तब सखियोंने विरह-तापसे संतप्त हुई राधाको पुनः एक ऐसे कोमल स्थानपर सुलाया, जिसपर मुलायम चद्दर बिछी हुई थी और चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया था; परंतु वह सुगन्धित चन्दनयुक्त जल भी सहसा सूख गया। उस समय उद्धवके बिना राधाको एक निमेष सौ युगके समान प्रतीत होने लगा। वे कहने लगीं- 'हा उद्धव ! हा उद्धव ! तुम जल्दी जाकर श्रीहरिको मेरी दशा बतलाओ और जो मेरे प्राणेश्वर हैं उन श्रीहरिको शीघ्र यहाँ ले आओ।' तब संतापके कारण जिनकी चेतना नष्ट हो गयी थी; उन राधाको ऐसे दीन वचन कहते देखकर सभी गोपियाँ उन्हें अपनी छातीसे लगाकर रुदन करने लगीं; फिर राधाको होशमें लाकर उन्हें ढाढ़स बँधाने लगीं। (अध्याय ९७) श्रीकृष्णद्वारा गोकुलका वृत्तान्त पूछे जानेपर उद्धवका उसे कहते हुए राधाकी दशाका विशेषरूपसे वर्णन करना श्रीनारायण कहते हैं - नारद ! तदनन्तर उद्धव यशोदाको प्रणामकर उतावलीके साथ हर्षपूर्वक खर्जूर-काननको बाँयें करके यमुना- तटपर गये। वहीं स्नान-भोजन करके वे पुनः मथुराको चल पड़े। वहाँ पहुँचकर एकान्तमें वटकी छायामें बैठे हुए गोविन्दको देखा। उस
७६- द्वारकापुरीका निर्माण, उसे देखनेके लिये देवताओं और मुनियोंका आना और उग्रसेनका राज्याभिषेक
७३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
समय उद्धव शोकसे दग्ध होनेके कारण दुःखी हो रो रहे थे, उनके नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे। उद्धवको आया देखकर श्रीकृष्णका मन प्रफुल्लित हो गया। तब वे उद्धवसे मुस्कराते हुए बोले।
श्रीभगवान्ने पूछा— उद्धव! आओ। कल्याण तो है न? राधा जीवित है न? विरह-तापसे संतप्त हुई कल्याणमयी गोपियोंका जीवन चल रहा है न? ग्वालबालों तथा गोवत्सोंका मङ्गल है न? पुत्र-विरहसे दुःखी हुई मेरी माता यशोदाका क्या हाल है? बन्धो! यह ठीक-ठीक बतलाओ कि तुम्हें देखकर मेरी माताने क्या कहा? तुमने उसे क्या उत्तर दिया तथा उसने मेरे लिये क्या कहा है? क्या तुमने वह यमुना-तट, वृन्दावन नामक पुण्यवन, जनशून्य एवं शीतल-मन्द-सुगन्ध पवनसे व्याप्त परम रमणीय रासमण्डल, कुञ्ज-कुटीरोंसे घिरा हुआ रमणीय क्रीड़ासरोवर और जिनपर भँवरे मँडरा रहे थे, उन खिले हुए फूलोंसे परिपूर्ण पुष्पवाटिका देखी? क्या भाण्डीरवनमें अत्यन्त सघन छायावाला एवं बालकोंसे संयुक्त वटवृक्ष तुम्हें दृष्टिगोचर हुआ? क्या गौओंके गोष्ठ, गोकुल और गो-समुदाय देखनेको मिला? यदि राधा जीवित है तो तुम्हारे द्वारा देखे जानेपर उसने मेरे लिये क्या संदेशा दिया है? बन्धो! वह सारा समाचार मुझे बताओ; क्योंकि मेरा मन स्थिर नहीं है। सभी गोपिकाओंने क्या कहा है? ग्वालबालोंने कौन-सी बात कही है? मेरे पिताकी-सी अवस्थावाले वृद्ध गोपोंने क्या संदेशा दिया है? तात! बलदेवकी माता सती रोहिणीने क्या कहा है तथा दूसरी प्रिय बन्धुओंकी पत्नियोंने कौन-सी बात कही है? तुम्हें भोजन क्या मिला था? माता यशोदा तथा राधाने कौन-सी अपूर्व वस्तु उपहारमें दी है? उन्होंने किस ढंगसे बातचीत की है और उनके वचन कैसे मधुर थे? उद्धव! गोपों, गोपियों, शिशुओं, राधा और मेरी माताका मेरे प्रति कैसा प्रेम है? क्या मेरी माता मुझे स्मरण करती है? क्या रोहिणी मुझे याद करती है? क्या मेरे प्रेमविरहसे व्याकुल हुई मेरी राधाको मेरा स्मरण रहता है? क्या गोपियों, गोपों और ग्वालबालोंको मेरी याद आती है? क्या मेरे न रहनेपर भी ग्वालबाल भाण्डीरवनमें वटवृक्षके नीचे क्रीड़ा करते हैं? जहाँ ब्राह्मणपत्नियों-द्वारा दिये गये अमृतोपम अन्नका मैंने नारियों और बालकोंके साथ भोग लगाया था, उस अभीष्ट स्थानको तुमने देखा है? इन्द्रयागस्थल, श्रेष्ठ गोवर्धन तथा जहाँ ब्रह्माने गौओंका अपहरण किया था, उस उत्तम स्थानको देखा है न? श्रीकृष्णके ये प्रश्न सुनकर उद्धव सनातन भगवान् श्रीकृष्णसे यह शोकयुक्त तथा मधुरताभरी वाणी बोले।
उद्धवने कहा— नाथ! आपने जिस-जिसका नाम लिया है, वह सब मैंने इच्छानुसार देख लिया और इस भारतवर्षमें अपने जीवन और जन्मको सफल बना लिया। मैंने उस पुण्यमय वृन्दावनको भी देख लिया, जो भारतवर्षका साररूप है। व्रजभूमिमें उस वृन्दावनका साररूप परम रमणीय रासमण्डल है। उसकी सारभूता गोलोकवासिनी श्रेष्ठ गोपिकाएँ हैं। उनकी सारभूता जो परात्परा
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७३३
रासेश्वरी राधा हैं; उनके भी मैंने दर्शन किये हैं। वे कदलीवनके मध्य एकान्तमें चन्दनचर्चित एवं जलयुक्त पङ्किल भूमिपर बिछे हुए कमलदलकी शय्यापर अत्यन्त खिन्न होकर पड़ी थीं। उन्होंने रत्नाभरणोंको उतार फेंका है। उनका शरीर श्वेत वस्त्रसे आच्छादित है। वे अत्यन्त मलिन एवं दुर्बल हो गयी हैं। आहार छोड़ देनेके कारण उनका उदर शीर्ण हो गया है। वे क्षण-क्षणपर साँस लेती हैं। वहाँ सखियाँ निरन्तर श्वेत चँवरसे उनकी सेवा कर रही हैं। हरे! यों विरह-तापसे पीड़िता श्रीराधा क्या क्षणभर जीवित रह सकती हैं? अरे! उन्हें तो इसका भी भान नहीं रह गया है कि क्या जल है और क्या स्थल है, क्या रात है और क्या दिन है, कौन मनुष्य है और कौन पशु है तथा कौन अपना है और कौन पराया है? वे बाह्यज्ञानशून्य होकर तुम्हारे चरणके ध्यानमें मग्न हैं। वे त्रिलोकीमें अपने उज्ज्वल यशसे प्रकाशित हो रही हैं। उनकी मृत्यु भी कीर्तिदायिनी है। परंतु जगन्नाथ! अज्ञानी चोर-डाकू भी इस प्रकार स्त्री-हत्या करना नहीं चाहते; अतः तुम शीघ्र ही अभीष्ट कदलीवनको जाओ; क्योंकि राधासे बढ़कर भक्त न कोई हुआ है और न होगा। वे सब तरहसे पीड़ित होकर अनाथ हो गयी हैं। वसन्त-ऋतु, किरणधारी चन्द्रमा और सुगन्धित वायु उनके लिये दाहकारक हो गये हैं। तपाये हुए सुवर्णके समान उनकी चमकीली कान्ति इस समय कज्जलकी तरह श्याम हो गयी है और उनके केश सुवर्णके-से भूरे हो गये हैं।
उन्होंने उत्तम वस्त्र और शृङ्गारका त्याग कर दिया है। श्रीकृष्ण! स्वयं भगवान् ब्रह्मा—जो देवताओंमें सर्वश्रेष्ठ हैं—तुम्हारे भक्त हैं। योगीन्द्रोंके गुरुके गुरु भगवान् शंकर तुम्हारे भक्त हैं। ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ गणेश और सनत्कुमार भी तुम्हारा भजन करते हैं। भूतलपर कितने मुनीन्द्र तुम्हारे भजनमें लगे रहते हैं; परंतु राधा तुम्हारी जैसी भक्ति करती हैं, वैसा भक्त कोई भी कहीं भी दूसरा नहीं है। राधा जिस प्रकार तुम्हारे ध्यानमें तल्लीन रहती हैं वैसा तो स्वयं लक्ष्मी भी नहीं कर सकतीं। महाभाग! मैंने राधाके सामने ‘श्रीहरि आयेंगे’ यों स्वीकार कर लिया है; अतः तुम शीघ्र ही वहाँ जाओ और मेरा वचन सार्थक करो। उद्धवकी बात सुनकर माधव ठठाकर हँस पड़े और वेदोक्त हितकारक एवं उत्तम सत्यव्रतका वर्णन करते हुए बोले।
श्रीभगवान्ने कहा— उद्धव! मैं तुम्हारे द्वारा अङ्गीकार किये गये वचनको अवश्य सफल करूँगा। मैं स्वप्नमें माता यशोदाके तथा गोपियोंके निकट जाऊँगा। यह सुनकर महायशस्वी उद्धव अपने घर चले गये और श्रीकृष्ण स्वप्नमें विरहाकुल गोकुलमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने स्वप्नमें राधाको भलीभाँति आश्वासन देकर परम दुर्लभ ज्ञान प्रदान किया। क्रीड़ा करके उन गोपिकाओंको यथोचितरूपसे संतुष्ट किया; नींदमें पड़ी हुई माता यशोदाका स्तन-पान करके उन्हें ढाढ़स बँधाया तथा गोपों और ग्वालबालोंको समझा-बुझाकर वे पुनः वहाँसे चल दिये।
(अध्याय ९८)
गर्गजीका आगमन और वसुदेवजीसे पुत्रोंके उपनयनके लिये कहना, उसी प्रसङ्गमें मुनियों और देवताओंका आना, वसुदेवजीद्वारा उनका सत्कार और गणेशका अग्र-पूजन
श्रीनारायण कहते हैं— नारद! इसी समय तपस्वी गर्गजी, जो सदा संयममें तत्पर रहनेवाले
और यदुवंशियोंके कुल-पुरोहित थे, वसुदेवजीके आश्रमपर पधारे। उनके सिरपर जटा थी तथा
७३४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
हाथमें दण्ड और छत्र सुशोभित थे। वे शुक्ल यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। उनके दाँत और वस्त्र श्वेत थे तथा वे ब्रह्मतेजसे उद्दीप्त हो रहे थे। उन्हें आया देख वसुदेव और देवकीने सहसा उठकर भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और बैठनेके लिये रत्नसिंहासन दिया। फिर मधुपर्क, कामधेनु और अग्निशुद्ध वस्त्र प्रदान करके चन्दन और पुष्पमालाद्वारा उनकी भक्तिभावसहित पूजा की। इसके बाद यत्नपूर्वक उन्हें मिष्टान्न, उत्तम अन्न और मधुर पिष्टकका भोजन कराया और सुवासित पानका बीड़ा दिया। तदनन्तर गर्गजीने बलदेवसहित श्रीकृष्णको देखकर उन्हें मन-ही-मन प्रणाम किया और पतिव्रता देवकी तथा वसुदेवजीसे कहा।
गर्गजी बोले— वसुदेव! जरा, बलरामसहित अपने शुद्धाचारी एवं श्रेष्ठ पुत्र श्रीकृष्णकी ओर तो देखो। अब इनकी अवस्था उपनयन-संस्कारके योग्य हो गयी है; अतः मेरी इस बातपर ध्यान दो।
वसुदेवजीने कहा— गुरो! आप यदुवंशियोंके पूज्य देव हैं, अतः उपनयनके योग्य ऐसा शुद्ध एवं शुभ मुहूर्त नियत कीजिये, जो सत्पुरुषोंके लिये भी प्रशंसनीय हो।
गर्गजी बोले— वसु-तुल्य वसुदेव! परसों वह शुभ मुहूर्त है; उस दिन चन्द्रमा और तारा अनुकूल हैं। वह दिन सत्पुरुषोंको भी मान्य है; अतः उसी मुहूर्तमें तुम उपनयन-संस्कार कर सकते हो। इसके लिये यत्नपूर्वक सभी सामग्री एकत्रित करो और सभी भाई-बन्धुओंको निमन्त्रण-पत्र भी भेज दो।
गर्गजीके वचन सुनकर वसूपम वसुदेवजीने सभी जाति-बन्धुओंके पास मङ्गल-पत्रिका भेज दी। फिर दूध, दही, घी, मधु और गुड़ की छोटी-छोटी मनोहर नदियाँ तैयार करायीं और नाना प्रकारके उपहारोंकी राशि तथा मणि, रत्न, सुवर्ण, मुक्ता, माणिक्य, हीरे, अनेक तरहके आभूषण और वस्त्रोंकी ढेरियां लगवा दीं। इधर भक्तवत्सल श्रीकृष्णने भी भक्तिपूर्वक देवगणों, मुनीन्द्रों, श्रेष्ठ सिद्धों और भक्तोंका मन-ही-मन स्मरण किया। तदनन्तर उस शुभ दिनके प्राप्त होनेपर वे सभी उपस्थित हुए। मुनिश्रेष्ठ, बान्धव, बहुत-से नरेश, देवकन्याएँ, नागकन्याएँ, राजकुमारियाँ, विद्याधरियाँ और बाजा बजानेवाले गन्धर्व भी आये। ब्राह्मण, भिक्षुक, भट्ट, यति, ब्रह्मचारी, संन्यासी, अवधूत और योगीलोग भी पधारे। उस शुभ कर्ममें स्त्रियोंके भाई-बन्धु, अपने बन्धुओंका समुदाय, नानाका तथा उनके बन्धुओंका कुटुम्ब—ये सभी सम्मिलित हुए। फिर भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा, द्विजवर कृपाचार्य, पत्नी और पुत्रोंसहित धृतराष्ट्र, हर्ष और शोकमें भरी हुई पुत्रोंसहित विधवा कुन्ती तथा विभिन्न देशोंमें उत्पन्न हुए योग्य राजा और राजकुमार भी आये। नारद! अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, महातपस्वी भरद्वाज, याज्ञवल्क्य, भीम, गार्ग्य, महातपस्वी गर्ग, वत्स, पुत्रसहित धर्म, जैगीषव्य, पराशर, पुलह, पुलस्त्य, अगस्त्य, सौभरि, सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, भगवान् सनत्कुमार, वोढु, पञ्चशिख, दुर्वासा, अङ्गिरा, व्यास, व्यासनन्दन शुकदेव, कुशिक, कौशिक, परशुराम, ऋष्यशृङ्ग, विभाण्डक, शृङ्गी, वामदेव, गुणके सागर गौतम, क्रतु, यति, आरुणि, शुक्राचार्य, बृहस्पति, अष्टावक्र, वामन, पारिभद्र, वाल्मीकि, पैल, वैशम्पायन, प्रचेता, पुरुजित्, भृगु, मरीचि, मधुजित्, प्रजापति कश्यप, देवमाता अदिति, दैत्यजननी दिति, सुमन्तु, सुभानु, एक, कात्यायन, मार्कण्डेय, लोमश, कपिल, पराशर, पाणिनि, पारियात्र, मुनिवर पारिजात, संवर्त, उतथ्य, नर, मैं (नारायण), विश्वामित्र, शतानन्द, जाबालि, तैतिर, योगियों और ज्ञानियोंके गुरु ब्रह्मांशभूत सान्दीपनि, उपमन्यु, गौरमुख, मैत्रेय, श्रुतश्रवा, कठ, कच, करथ, धर्मज्ञ भरद्वाज—ये सभी मुनि शिष्योंसहित वसुदेवजीके आश्रमपर
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७३५
पधारे। उन्हें आया देखकर वसुदेवजीने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर सबकी चरण-वन्दना की।
इसी समय अपने वाहन हंसपर सवार हो प्रसन्नमुखवाले ब्रह्मा, रत्ननिर्मित विमानपर आरूढ़ हो पार्वतीसहित शंकर, स्वयं नन्दी, महाकाल, वीरभद्र, सुभद्रक, मणिभद्र, पारिभद्र, कार्तिकेय, गणेश्वर, गजराज ऐरावतपर बैठे हुए महेन्द्र, धर्म, चन्द्रमा, सूर्य, कुबेर, वरुण, पवन, अग्नि, संयमनीपुरीके स्वामी यम, जयन्त, नलकूबर, सभी ग्रह, आठों वसु, गणोंसहित ग्यारहों रुद्र, बारहों आदित्य, शेषनाग तथा अनेकानेक देवगण भी आये। वसुदेवजीने भक्तिपूर्वक भूमिपर सिर रखकर उन सबकी वन्दना की और भक्तिवश मस्तक झुकाकर परम भक्तिके साथ उन ऋषिगणों, देवेन्द्रों तथा देवगणोंका स्तवन आरम्भ किया। उस समय उनका शरीर हर्षसे पुलकायमान हो रहा था।
वसुदेवजी बोले—जो परब्रह्म, परम धाम, परमेश्वर, परात्पर, लोकोंके प्रतिपालक, वेदोंके उत्पादक, सृष्टिकर्ता, सृष्टिके कारण और सनातन देव हैं; वे स्वयं ब्रह्मा, जो देवताओं, मुनीन्द्रों और सिद्धेन्द्रोंके गुरुके गुरु हैं, स्वप्नमें भी जिनके चरणकमलका क्षणमात्रके लिये दर्शन मिलना परम दुर्लभ है, जिनके स्मरणमात्रसे सभी अनिष्ट दूर भाग जाते हैं, वे भगवान् शिव; जिनके स्मरणसे मनुष्य सम्पूर्ण संकटोंसे पार होकर कल्याणका भागी हो जाता है, सर्वप्रथम जिनकी पूजा होती है, जो देवताओंके अगुआ और श्रेष्ठ हैं, कलशोंपर भक्तिपूर्वक मन्त्रोंद्वारा जिनका आवाहन करनेसे मङ्गल होता है, जो विघ्नोंके विनाशक हैं, वे स्वयं साक्षात् भगवान् गणेश, देवताओंके पूज्य भगवान् कार्तिकेय—ये सब मेरे घर आये हैं। देवताओंकी पूजनीया परात्परा सर्वश्रेष्ठा महालक्ष्मीने भी मेरे गृहमें पदार्पण किया है। जो लोकोंकी आदिरूपिणी, सर्वशक्तिस्वरूपा, मूलप्रकृति, ईश्वरी, परात्परोंमें भी परमश्रेष्ठ और परब्रह्मस्वरूपिणी हैं; शरत्कालमें भक्तिपूर्वक जिनके चरणोंकी समाराधना करके मनुष्य अपना अभीष्ट सिद्ध कर लेता है; जो परमाद्या, कृपामयी और कृपापरवश हो भारत-भूमिपर आविर्भूत हुई हैं; उन भक्तवत्सला साक्षात् माता पार्वतीका सम्पूर्ण देवताओं और गणोंके साथ मेरे मन्दिरमें शुभागमन हुआ है। दुर्गे ! चूँकि आप मेरे घर पधारी हैं, अतः मैं धन्य और कृतार्थ हो गया। मेरा जीवन सफल हो गया।
इस प्रकार वसुदेवजीने गलेमें वस्त्र बाँधकर हर्षपूर्वक क्रमशः परस्पर सभी देवों, मुनिवरों और विप्रोंकी स्तुति की और उन्हें पृथक्-पृथक् श्रेष्ठ रत्नसिंहासनोंपर बैठाया। फिर क्रमशः अलग-अलग उनकी विधिवत् पूजा की। तत्पश्चात् भक्तिभावित हृदयसे रत्न, मूँगा, मणि, मोती, माणिक्य, हीरा, भूषण, वस्त्र, सुगन्धित चन्दन और पुष्पमालाओंद्वारा ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनिसमूहों, ब्राह्मणों और पुरोहित गर्गजीका एक-एक करके वरण किया। तदनन्तर उस शुभ कर्मके अवसरपर सभीके मध्यभागमें स्थित एक रमणीय रत्नसिंहासनपर गणेशजीका पूजाके लिये वरण किया और जिसमें सात तीर्थोंका जल, पुष्प-चन्दनयुक्त शीतल, सुवासित स्वर्गगङ्गाका जल, पुष्करका पुण्यमय जल और समुद्रका जल भरा था, उस सुवर्णकलशसे तथा शुद्ध पञ्चामृत और पञ्चगव्यसे भक्तिभावसहित मन्त्रोच्चारणपूर्वक गणेशको स्नान कराया। फिर अग्निशुद्ध वस्त्र, रत्नोंके आभूषण, पारिजातपुष्पोंकी माला, गन्ध, चन्दन, पुष्प, रत्नोंकी माला और अंगूठी निवेदित की। नारद ! तत्पश्चात् जो समस्त देवताओंके अधिपति, शुभकारक, विघ्नोंके विनाशक, शान्त, ऐश्वर्यशाली और सनातन हैं; उन पार्वतीनन्दन गणेशकी वसुदेवजीने स्तुति की। (अध्याय ९९)
७७- भीष्मकद्वारा रुक्मिणीके विवाहका प्रस्ताव, शतानन्दका उन्हें श्रीकृष्णके साथ विवाह करनेकी सम्मति देना, रुक्मीद्वारा उसका विरोध और शिशुपालके साथ विवाह करनेका अनुरोध, भीष्मकका श्रीकृष्ण तथा अन्यान्य राजाओंको निमन्त्रित करना
| ७३६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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अदिति आदि देवियोंद्वारा पार्वतीका स्वागत-सत्कार, वसुदेवजीका देव-पूजन आदि माङ्गलिक कार्य करके बलराम और श्रीकृष्णका उपनयन करना, तत्पश्चात् नन्द आदि समागत अभ्यागतोंकी बिदाई और वसुदेव-देवकीका अनेकविध वस्तुओंका दान करना
श्रीनारायण कहते हैं— नारद! तदनन्तर अदिति, दिति, देवकी, रोहिणी, रति, सरस्वती, पतिव्रता यशोदा, लोपामुद्रा, अरुन्धती, अहल्या तथा तारका—ये सभी महिलाएँ पार्वतीको देखकर तुरंत ही मन्दिरसे बाहर निकलीं और बारंबार आलिङ्गन करके उन्हें नमस्कार करने लगीं। तत्पश्चात् परस्पर वार्तालाप करके उन्हें एक रत्ननिर्मित महलमें प्रवेश कराया। वहाँ उन परमेश्वरीको रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया गया और वस्त्र, रत्नोंके आभूषणों तथा पुष्पमालाओंसे उनकी पूजा की गयी। तत्पश्चात् देवकीने भक्तिपूर्वक उनके चरणकमलोंमें इन्द्रद्वारा लाया गया पारिजातका मनोहर पुष्प निवेदन किया। फिर माँगमें सिन्दूरकी बेंदी और ललाटपर चन्दनका बिन्दु लगाकर उन दोनों बिन्दुओंके चारों ओर कस्तूरी और कुङ्कुम आदिका लेप किया। तत्पश्चात् मिष्टान्न भोजन कराया, सुवासित शीतल जल पीनेको दिया और कपूर आदिसे सुवासित सुन्दर एवं श्रेष्ठ पानका बीड़ा समर्पित किया। उनके दोनों चरणकमलोंके नखोंपर अलक्तक लगाकर पैरोंको कुङ्कुमसे रँग दिया और श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा की। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नारद! इस प्रकार पार्वतीदेवीका भलीभाँति पूजन करके वसुदेवजीकी प्रियतमा देवकीने क्रमशः मुनिपत्नियों, पति-पुत्रवती सतियों, राजकन्याओं, देवकन्याओं, सौन्दर्यशालिनी नाग-कन्याओं, मुनिकन्याओं और भाई-बन्धुओंकी कन्याओंका भी विधिवत् पूजन किया। कौतुकवश नाना प्रकारके सुन्दर बाजे बजवाये; माङ्गलिक कार्य कराया; ब्राह्मणोंको जिमाया; मथुराकी ग्रामदेवता भैरवी और मङ्गलचण्डिका षष्ठीकी षोडशोपचारद्वारा पूजा की। पुण्यकारक एवं मङ्गलमय शुद्ध स्वस्त्ययन तथा वेदोंका पाठ कराया। तदनन्तर पुत्रवत्सला देवकीने स्वर्गगङ्गाके उत्तम जलसे परिपूर्ण सुवर्णकलशसे बलरामसहित श्रीकृष्णको नहलाया और वस्त्र, चन्दन, माला तथा बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए मनोहर आभूषणोंसे उन दोनों बालकोंका शृङ्गार किया। नारद! यों माताद्वारा दिये गये आभूषणोंसे विभूषित हो बलराम और श्रीकृष्ण देवताओं और मुनिवरोंकी उस सभामें आये। उन जगदीश्वरको आये हुए देखकर स्वयं ब्रह्मा, शम्भु, शेषनाग, धर्म और सूर्य आदि सभी सभासद् बड़ी उतावलीके साथ अपने-अपने आसनोंसे उठकर खड़े हो गये। फिर देवगण, मुनिगण, कार्तिकेय, गणेश, भगवान् ब्रह्मा, शिव और अनन्त आदिने पृथक्-पृथक्
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७३७
परमेश्वर श्रीकृष्णकी स्तुति की।
मुने ! इस प्रकार जब देवताओं और मुनियोंने मन-ही-मन श्रीकृष्णकी स्तुति करके विराम लिया, तब आँगनमें पीले वस्त्रसे सुशोभित श्रीकृष्णको देखा। उस समय उनकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसी मालतीकी मालासे सुशोभित बकपङ्क्ति तथा बिजलीसे युक्त नूतन मेघकी होती है। उनके ललाटपर कस्तूरीयुक्त चन्दनका मण्डलाकार तिलक बादलमें छिपे हुए कलङ्कयुक्त चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा था। उनके दो भुजाएँ थीं। उन राधाकान्तका शरीर श्याम, कमनीय और मनोहर था। उनके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी छटा थी। वे भक्तानुग्रह-मूर्ति तथा रत्नोंके बाजूबंद, कङ्कण और करधनीसे सुशोभित थे और बलरामसहित पिताकी गोदमें विराज रहे थे। तदनन्तर मनोरम शुभलग्नके आनेपर जब कि लग्नेश उच्च स्थानमें स्थित था, उसपर सौम्य ग्रहोंकी दृष्टि पड़ रही थी, केवल सद्ग्रह ही उसे देख रहे थे तथा वह असद्ग्रहोंकी दृष्टिसे परे था। ऐसे मङ्गल-कालमें देवताओं और ब्राह्मणोंकी आज्ञासे वसुदेवजीने स्वस्तिवाचनपूर्वक शुभकर्म आरम्भ किया। उस समय उन्होंने ब्राह्मणको आदरसहित सौ मोहरें दान देकर देवगण, मुनिगण, पुरोहित गर्गजी, गणेश, सूर्य, अग्नि, शंकर और पार्वतीको नमस्कार किया। फिर उस देवसमाजमें छः प्रधान देवताओंकी भक्तिपूर्वक अक्षतसहित षोडशोपचारद्वारा पूजा करके वेदमन्त्रोच्चारणपूर्वक पुत्रका अधिवासन (सुगन्धित पदार्थका अनुलेप अर्थात् हरिद्राकर्म) किया। फिर अनेकानेक देवताओं, दिक्पालों और नवग्रहोंका भलीभाँति पूजन करके षोडश मातृकाओंको भक्तिपूर्वक पञ्चोपचार समर्पित किया। घीसे सात बार वसुधारा दिया। पुनः चेदिराज वसुका पूजन-नमस्कार करके वे आगे बढ़े और वृद्धिश्राद्धको समाप्त करके जो कुछ अन्य देवसम्बन्धी कार्य था; उसे सम्पन्न किया। इसके बाद वेदोक्त यज्ञ करके हर्षपूर्वक अग्रज बलदेव और परमात्मा श्रीकृष्णको यज्ञसूत्र (जनेऊ) पहनाया। मुनिवर सांदीपनिने उन दोनोंको गायत्री-मन्त्र प्रदान किया। पहले-पहल पार्वतीने बड़े आदरके साथ बहुमूल्य रत्नद्वारा निर्मित पात्रमें रखे हुए मोती, माणिक्य और हीरोंको भिक्षारूपमें समर्पित किया। पिता वसुदेवजीने हीरेका बना हुआ हार देकर श्वेत पुष्प और दूर्वाङ्कुरद्वारा शुभाशीर्वाद प्रदान किया। तत्पश्चात् अदिति, दिति, मुनिपत्नियों, देवकी, यशोदा, रोहिणी, सावित्री और सरस्वती—इन सभीने हर्षपूर्वक अलग-अलग मणि और सुवर्णसे भूषित भिक्षा प्रदान की। इसके बाद जिनके नेत्र स्निग्ध थे और मुखपर मुस्कानकी छटा छा रही थी; वे देवकन्याएँ, नागकन्याएँ, राजकन्याएँ, पतिव्रताएँ, भाई-बन्धुओंकी स्त्रियाँ, इन्द्राणी, वरुणाणी, पवन-पत्नी, रोहिणी, कुबेर-पत्नी, स्वाहा और कामदेवकी प्रियतमा रति—इन लोगोंने पृथक्-पृथक् रत्नाभरणोंसे विभूषित भिक्षा दी। तब बलरामसहित भगवान् श्रीकृष्णने भक्तिपूर्वक भिक्षा ग्रहण करके उसका कुछ भाग पुरोहित गर्गजीको तथा कुछ भाग अपने गुरु सांदीपनि मुनिको दे दिया। फिर वैदिक कर्म समाप्त करके गर्गजीको दक्षिणा दी गयी। आदरपूर्वक देवताओं और ब्राह्मणोंको भी भोजन कराया गया। तदनन्तर उस यज्ञमें जो-जो लोग आये थे, वे सभी बलदेव और श्रीकृष्णको शुभाशीर्वाद देकर प्रसन्नमनसे अपने-अपने गृहको लौट गये। तब पत्नीसहित नन्द पुत्रके उस शुभकर्मको समाप्त करके बलराम और श्रीकृष्णको गोदमें लेकर उन दोनोंका मुख चूमने लगे। उस समय नन्द और पतिव्रता यशोदा उच्चस्वरसे रो पड़ीं, तब श्रीकृष्णने बड़े यत्नसे उन्हें आश्वासन देकर समझाते हुए कहा।
श्रीकृष्ण बोले— तात! तुम मेरे परमार्थतः पिता हो और हे माता यशोदा! तुम्हीं मेरी पालन-
७८- रेवती और बलरामके विवाहका वर्णन तथा रुक्मी, शाल्व, शिशुपाल और दन्तवक्रका श्रीकृष्णको कटुवचन कहना
| ७३८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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पोषण करनेवाली माता हो। अब तुमलोग आनन्दपूर्वक शीघ्र ही व्रजको लौट जाओ। पिताजी ! इस समय मैं बलरामजीके साथ वेदाध्ययन करनेके लिये मुनिवर सांदीपतिके निवासस्थान अवन्तिनगरको जाऊँगा। चिरकालके बाद वहाँसे लौटनेपर पुनः आपके दर्शन होंगे। माताजी ! काल ही ग्रहण करता है और वही भेद उत्पन्न करता है। यहाँतक कि मनुष्योंके जो वियोग, मिलन, सुख, दुःख, शोक और मङ्गल आदि हैं; उन सबका कर्ता काल ही है। मैंने जो तत्त्व पिताजीको बतलाया है, वह योगियोंके लिये भी दुर्लभ है। वे आनन्दपूर्वक वह सारा रहस्य तुम्हें बतलायेंगे। इतना कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण वसुदेवजीकी सभामें चले गये और क्षणभर वहाँ ठहरकर पिताकी आज्ञासे महर्षि सांदीपतिके आश्रमको प्रस्थित हुए।
तदनन्तर यशोदासहित नन्दजी विनयपूर्वक वसुदेव-देवकीसे वार्तालाप करके दुःखी हृदयसे जानेको उद्यत हुए। उस समय देवकीने नन्दजीको मुक्तामणि, सुवर्ण, माणिक्य, हीरा, रत्न और अग्निशुद्ध वस्त्र भेंट किये। वसुदेवजी और श्रीकृष्णने उन्हें आदरपूर्वक श्वेत अश्व, गजराज, सुवर्ण और उत्तम रथ प्रदान किये। फिर नन्द-यशोदाके चलनेपर बहुत-से ब्राह्मण, देवकी आदि प्रमुख महिलाएँ, वसुदेव, अक्रूर और उद्धव भी हर्षपूर्वक उनके पीछे-पीछे चले। यमुनाके निकट पहुँचकर वे सभी शोकके कारण रोने लगे। फिर परस्पर वार्तालाप करके वे सब-के-सब अपने-अपने घरको चले गये। मुने ! तदनन्तर विधवा कुन्ती तरह-तरहके रत्नों और मणियोंकी भेंट पाकर वसुदेवजीकी आज्ञासे पुत्रोंसहित आनन्दपूर्वक अपने गृहको प्रस्थित हुईं। इधर वसुदेव और देवकीने पुत्रके कल्याणके लिये अनेक प्रकारके रत्न, मणि, वस्त्र, सोना, चाँदी, मोतियों और हीरोंके हार और अमृत-तुल्य मिष्टान्न भृष्ट ब्राह्मणोंको आदरपूर्वक हर्षपूर्ण मनसे समर्पित किये। फिर यत्नपूर्वक महोत्सव मनाया गया; जिसमें वेद-पाठ, हरिनाम-संकीर्तन और ब्राह्मणोंको भोजन कराया गया। इसके बाद जाति-भाइयोंको यथोचित रूपसे मनोहर मणि, माणिक्य, मोती और वस्त्र पुरस्काररूपमें दिये।
(अध्याय १००-१०१)
बलरामसहित श्रीकृष्णका विद्या पढ़नेके लिये महर्षि सांदीपतिके निकट जाना, गुरु और गुरुपत्नीद्वारा उनका स्वागत और विद्याध्ययनके पश्चात् गुरुदक्षिणारूपमें गुरुके मृतक पुत्रको उन्हें वापस देकर घर लौटना
श्रीनारायण कहते हैं—नारद ! श्रीकृष्णने बलरामके साथ हर्षपूर्वक सांदीपतिके गृह जाकर अपने उन गुरुदेव तथा पतिव्रता गुरुपत्नीको नमस्कार किया और उन्हें भेंटरूपमें रत्न एवं मणि समर्पित की। तत्पश्चात् उनसे शुभाशीर्वाद लेकर वे श्रीहरि उन गुरुदेवसे यथोचित वचन बोले।
**श्रीकृष्णने कहा—**विप्रवर ! आपसे अपनी अभीष्ट विद्या प्राप्त करूँगा—ऐसी मेरी लालसा है; अतः शुभ मुहूर्त निश्चय करके मुझे यथोचितरूपसे विद्याध्ययन कराइये। तब 'ॐ—बहुत अच्छा'—यों कहकर मुनिवर सांदीपनिने हर्षपूर्वक मधुपर्कप्राशन, गौ, वस्त्र और चन्दनद्वारा उनका आदर-सत्कार किया, मिष्टान्न भोजन कराया, सुवासित पानका बीड़ा दिया, मधुर वार्तालाप किया और उन परमेश्वरका स्तवन करते हुए कहा।
**सांदीपनि बोले—**भक्तोंके प्राणवल्लभ ! तुम परब्रह्म, परमधाम, परमेश्वर, परात्पर, स्वेच्छामय, स्वयंज्योति, निर्लिप्त, अद्वितीय, निरङ्कुश, भक्तोंके
७९- रुक्मी आदिका यादवोंके साथ युद्ध, शाल्वका वध, रुक्मीकी सेनाका पलायन, बारातका पुरीमें प्रवेश और स्वागत-सत्कार, शुभ-लग्नमें श्रीकृष्णका बारातियों तथा देवोंके साथ राजाके आँगनमें जाना, भीष्मकद्वारा सबका सत्कार करके श्रीकृष्णका पूजन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७३९
एकमात्र स्वामी, भक्तोंके इष्टदेव, भक्तानुग्रहमूर्ति और भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये कल्पतरु हो। ब्रह्मा, शिव और शेष तुम्हारी वन्दना करते हैं। तुम पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये इस भूतलपर मायावश बालरूपमें अवतीर्ण हुए हो और मायासे ही भूपाल बने हो। योगीलोग जिसे सनातन ब्रह्मज्योति जानते हैं, भक्तगण अपने हृदयमें जिस ज्योतिका हर्षपूर्वक ध्यान करते हैं, जिनके दो भुजाएँ हैं, हाथमें मुरली सुशोभित है, सर्वाङ्गमें चन्दनका अनुलेप लगा हुआ है, जिनका सुन्दर श्याम रूप है, जो मन्द मुस्कानयुक्त, भक्तवत्सल, पीताम्बरधारी, वनमाला-विभूषित और लीला-कटाक्षोंसे कामदेवको उपहासास्पद एवं मूर्च्छित कर देनेवाले हैं, जिनका चरणकमल अलक्तकके उत्पत्तिस्थानकी भाँति अत्यन्त शोभायमान है और शरीर कौस्तुभमणिसे उद्भासित हो रहा है, जिनकी मनोहर दिव्य मूर्ति है, जो हर्षवश मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं, जिनका सुन्दर वेश है, देवगण जिनकी स्तुति करते हैं, जो देवोंके देव, जगदीश्वर, त्रिलोकीको मोहित करनेवाले, सर्वश्रेष्ठ, करोड़ों कामदेवोंकी-सी कान्तिवाले, कमनीय, ईश्वररहित (स्वयं ईश्वर), अमूल्य रत्नोंके बने हुए भूषणोंसे विभूषित, श्रेष्ठ, सर्वोत्तम, वरदाता, वरदाताओंके इष्टदेव और चारों वेदों तथा कारणोंके भी कारण हैं; वही तुम लीलावश पढ़नेके लिये मेरे प्रिय स्थानपर आये हो। तुम तो स्वात्मामें रमण करनेवाले, सर्वव्यापी एवं परिपूर्णतम हो; अतः तुम्हारे विद्याध्ययन, रमण, गमन और युद्ध आदि सभी कार्य लोक-शिक्षाके लिये हैं।
तत्पश्चात् गुरुपत्नी बोलीं—प्रभो! आज मेरा जन्म, जीवन, पातिव्रत्य तथा तपोवनका वास सफल हो गया। मैंने जिस हाथसे तुम्हें इच्छित अन्न प्रदान किया है, वह मेरा दाहिना हाथ सफल हो गया। जो आश्रम तीर्थपाद भगवान्के चरणसे चिह्नित है; वह तीर्थसे भी बढ़कर है। उनकी चरणरजसे गृह पावन और आँगन उत्तम हो जाते हैं। तुम्हारा चरणकमल हम दोनोंके जन्म-मरणका निवारक है; क्योंकि दुःख, शोक, भोग, रोग, जन्म, कर्म, भूख-प्यास आदि तभीतक कष्टप्रद होते हैं, जबतक तुम्हारे चरण-कमलका दर्शन और भजन नहीं होता*। हे भगवन्! तुम कालके भी काल, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा और संहारकारक शिवके भी ईश्वर तथा माया-मोहके विनाशक हो। कृपानाथ! मुझपर कृपा करो। इतना कहते-कहते गुरुपत्नीके नेत्रोंमें आँसू छलक आये। वे पुनः श्रीकृष्णको अपनी गोदमें लेकर प्रेमपूर्वक देवकीकी तरह अपना स्तन पिलाने लगीं।
तब श्रीकृष्णने कहा—माता! तुम मुझ बालककी स्तुति कैसे कर रही हो; क्योंकि मैं तो तुम्हारा दुधमुँहा बच्चा हूँ। अच्छा, अब तुम इस प्राकृतिक मिथ्या नश्वर शरीरको त्यागकर और जन्म, मृत्यु एवं बुढ़ापेका हरण करनेवाले निर्मल देहको धारण करके अपने पतिदेवके साथ अभीष्ट गोलोकको जाओ।
यों कहकर श्रीकृष्णने एक ही महीनेमें परम भक्तिके साथ मुनिवर सांदीपनिसे चारों वेदोंका अध्ययन करके पूर्वकालमें मरे हुए उनके पुत्रको वापस लाकर उन्हें समर्पित कर दिया। फिर लाखों-लाखों मणि, रत्न, हीरे, मोती, माणिक्य, त्रैलोक्यदुर्लभ वस्त्र, हार, अँगूठियाँ और सोनेकी मुहरें दक्षिणामें दीं। तत्पश्चात् स्त्रीके सर्वाङ्गमें पहननेयोग्य अमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण और अग्निशुद्ध श्रेष्ठ वस्त्र गुरुपत्नीको प्रदान किये।
* तावद् दुःखं च शोकश्च तावद् भोगश्च रोगकः।
तावज्जन्मानि कर्माणि क्षुत्पिपासादिकानि च। यावत्त्वत्पादपद्मस्य भजनं नास्ति दर्शनम्॥
(१०२।१९-२०)
| ७४० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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तदनन्तर मुनि वह सब सामान अपने पुत्रको देकर स्वयं पत्नीके साथ अमूल्य रत्न-निर्मित रथपर सवार हो उत्तम गोलोकको चले गये। उस अद्भुत दृश्यको देखकर श्रीकृष्ण हर्षपूर्वक अपने गृहको लौट गये। नारद! इस प्रकार ब्रह्मण्यदेव भगवान् श्रीकृष्णके चरित्रको श्रवण करो। यह स्तोत्र महान् पुण्यदायक है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, उसकी निःसंदेह श्रीकृष्णमें निश्चल भक्ति हो जाती है। इसके प्रभावसे कीर्तिहीन परम यशस्वी और मूर्ख पण्डित हो जाता है। वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके पदको प्राप्त होता है। वहाँ उसे नित्य श्रीहरिकी दासता सुलभ रहती है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है।
(अध्याय १०२)
द्वारकापुरीका निर्माण, उसे देखनेके लिये देवताओं और मुनियोंका आना और उग्रसेनका राज्याभिषेक
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर सर्वव्यापी श्रीहरिने बलरामके साथ मथुरापुरीमें आकर पिताको प्रणाम किया और वटवृक्षके नीचे बैठकर आदरसहित गरुड़, क्षारसागर और विश्वकर्माका स्मरण किया। वहाँ उन्होंने गोपवेषका परित्याग करके राजसी वेष धारण कर लिया। इसी बीच करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान श्रेष्ठ सुदर्शनचक्र स्वयं ही श्रीकृष्णके पास आया। वह उत्तम अस्त्र श्रीहरिके सदृश तेजस्वी, शत्रुनाशक, अमोघ, अस्त्रोंमें श्रेष्ठ और परमोत्कृष्ट था। इसके बाद रत्ननिर्मित विमानको आगे करके गरुड़, शिष्यसहित विश्वकर्मा तथा काँपता हुआ समुद्र श्रीहरिके संनिकट आये। उन सब लोगोंने भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर श्रीहरिको प्रणाम किया। तब सर्वव्यापी भगवान् क्रमशः उससे आदरसहित मुस्कराते हुए बोले।
श्रीकृष्णने कहा— हे महाभाग समुद्र! मैं नगर-निर्माण करना चाहता हूँ; अतः उसके लिये तुम मुझे सौ योजन विस्तृत भूमि दो। पीछे वह भूमि मैं तुम्हें अवश्य ही लौटा दूँगा। हे विश्वकर्मा! उस स्थानपर तुम एक ऐसा नगर-निर्माण करो; जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ हो, सबके लिये रमणीय हो, स्त्रियोंके मनको हरण करनेवाला हो, भक्तोंके लिये वाञ्छनीय हो, वैकुण्ठके समान परमोत्कृष्ट हो, समस्त स्वर्गोंसे परे और सबके लिये अभीष्ट हो। आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ महाभाग गरुड़! जबतक विश्वकर्मा द्वारकापुरीका निर्माण करते हैं, तबतक तुम रात-दिन इनके पास स्थित रहो। चक्रश्रेष्ठ सुदर्शन! तुम दिन-रात मेरे पार्श्वमें वर्तमान रहो। मुने! तब चक्रके अतिरिक्त और सभी लोग 'ॐ—बहुत अच्छा' यों कहकर चले गये। महाभाग! इधर श्रीकृष्णने नगरमें आकर कंसके पिता महाबली एवं सर्वोत्तम उग्रसेनको क्षत्रियों तथा सत्पुरुषोंका भी राजा बना दिया। फिर युक्तिपूर्वक जरासंधको जीतकर कालयवनको
· श्रीकृष्णजन्मखण्ड · ७४१
मरवा डाला। इसके बाद नगर-निर्माणका क्रम चालू किया।
**श्रीभगवान्ने कहा—**विश्वकर्मन्! तुम पद्मराग, मरकत, सर्वश्रेष्ठ इन्द्रनील, मनोहर पारिभद्र, पलंक, स्यमन्तक, गन्धक, गालिम, चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, स्फटिककी रची हुई पुतलियों, पीली-श्याम-श्वेत और नीली मणियों, दाडिमी-बीजके सदृश पीली गोरोचना, पद्म-बीजके सदृश, नीले कमलके-से रंगवाली, कज्जलके-से आकारवाली, उज्ज्वल, परिष्कृत, श्वेत चम्पकके सदृश कान्तिमती, तपाये हुए स्वर्णकी-सी चमकीली, स्वर्णके मूल्यसे सौगुनी अधिक मूल्यवाली, थोड़ी-थोड़ी लाल, परम सुन्दर, वजनदार, सर्वोत्तम और पूजनीय उत्तम मणियोंद्वारा वास्तु-शास्त्रके विधानानुसार यथायोग्य घटा-बढ़ाकर एक ऐसे मनोवाञ्छित परम मनोहर नगरकी रचना करो, जो सौ योजनके विस्तारवाला हो। जबतक तुम नगरका निर्माण करोगे, तबतक यक्षगण हिमालयसे रात-दिन मणियोंको लाते रहेंगे। कुबेरकी प्रेरणासे आये हुए सात लाख यक्ष, शंकरद्वारा भेजे हुए एक लाख बेताल और एक लाख कूष्माण्ड तथा गिरिराजनन्दिनीद्वारा नियुक्त किये हुए दानव और ब्रह्मराक्षस तुम्हारे सहायक बने रहेंगे। मेरी सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियोंके लिये ऐसे दिव्य शिविर तैयार करो, जो खाइयोंसे युक्त तथा ऊँची-ऊँची चहारदीवारियोंसे परिवेष्टित हों। जिनमें प्रत्येकमें बारह कमरे और सिंहद्वार लगे हों, जो चित्र-विचित्र कृत्रिम किवाड़ोंसे युक्त हों; निषिद्ध वृक्षोंसे रहित और प्रसिद्ध वृक्षोंसे सम्पन्न हों और जिनके आँगन शुभ लक्षणयुक्त और चन्द्रवेध हों। इसी प्रकार यदुवंशियों और नौकरोंके लिये भी दिव्य आश्रम बनाओ। भूपाल उग्रसेनका भवन सर्वप्रसिद्ध तथा मेरे पिता वसुदेवजीका आश्रम सर्वतोभद्र होना चाहिये।
**तब विश्वकर्मा बोले—**जगद्गुरो! वे प्रशस्त वृक्ष कौन-कौन हैं और कौन निषिद्ध हैं तथा शुभ-अशुभ प्रदान करनेवाले कौन हैं? उन सबका परिचय दीजिये। प्रभो! साथ ही यह भी बतलाइये कि किनकी अस्थि पड़नेसे शिविर शुभ और किनकी अस्थिसे अशुभ होता है? शिविरकी किस दिशामें जल मङ्गलकारक और किस दिशामें अमाङ्गलिक होता है? और कौन वृक्ष किस दिशामें कल्याणप्रद होता है? सुरेश्वर! गृहों तथा अँगनोंका विस्तार कितना होना चाहिये? किस दिशामें पुष्पोद्यान मङ्गलप्रद होता है? सुरेश्वर! परकोटों, खाइयों, दरवाजों, गृहों और चहारदीवारियोंका क्या प्रमाण है? प्रभो! शिविर-निर्माणमें किस-किस वृक्षकी लकड़ी प्रशस्त मानी गयी है और किन वृक्षोंके काष्ठ अमङ्गलजनक होते हैं? यह सब मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।
**श्रीभगवान्ने कहा—**देवशिल्पिन्! गृहस्थोंके आश्रममें नारियलका वृक्ष धन प्रदान करनेवाला होता है। वही वृक्ष यदि शिविरके ईशानकोण अथवा पूर्व दिशामें हो तो पुत्रप्रद होता है। वह मनोहर वृक्षराज सर्वत्र मङ्गलका दाता होता है। यदि पूर्व दिशामें आमका वृक्ष हो तो वह मनुष्योंको सम्पत्ति प्रदान करता है और सर्वत्र शुभदायक होता है। बेल, कटहल, जम्बीरी नींबू तथा बेरके वृक्ष पूर्व दिशामें संतानदायक, दक्षिणमें धनदाता तथा सर्वत्र सम्पत्तिप्रद होते हैं। इनसे गृहस्थकी उन्नति होती है। जामुन, अनार, केला तथा आमलाके वृक्ष पूर्वमें बन्धुप्रद तथा दक्षिणमें मित्रकी वृद्धि करनेवाले होते हैं और सर्वत्र शुभदायक होते हैं। सुवाक दक्षिणमें धन-पुत्र-शुभप्रद, पश्चिममें हर्षदायक और ईशानकोणमें तथा सर्वत्र सुखद होता है। भूतलपर चम्पाका वृक्ष शुद्ध तथा सर्वत्र मङ्गलकारक होता है। लौकी, कुम्हड़ा, आयाम्बु, पलाश, खजूर और कर्कटीके वृक्ष शिविरमें मङ्गलप्रद होते हैं। विश्वकर्मन्! बेल और बैंगनके पौधे भी शुभदायक
८०- रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह, बारातकी बिदाई, भीष्मकद्वारा दहेज-दान और द्वारकामें मङ्गलोत्सव
| ७४२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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होते हैं। सारी फलवती लताएँ निश्चय ही सर्वत्र शुभदायिनी होती हैं। शिल्पिन्! इस प्रकार प्रशस्त वृक्षोंका वर्णन कर दिया गया; अब निषिद्धका वर्णन सुनो।
नगर अथवा शिविरमें वन्यवृक्षका रहना निषिद्ध है। शिविरमें वटवृक्षका रहना ठीक नहीं है; क्योंकि उससे सदा चोरका भय लगा रहता है, किंतु नगरोंमें उसका रहना उत्तम है; क्योंकि उसके दर्शनसे पुण्य होता है। नगर, गाँव और शिविरमें सेमलके वृक्षका रहना सर्वथा निषिद्ध है। वह सदा राजाओंको दुःख देता रहता है। हे देवशिल्पी! इमलीका वृक्ष नगरों और गाँवोंमें तो प्रशस्त है; परंतु शिविरमें उसका रहना ठीक नहीं है। वह विद्या-बुद्धिका विनाशक तथा सदा दुःखदायक होता है। उससे निश्चय ही प्रजा और धनकी हानि होती है; अतः विद्वान्को उचित है कि यत्नपूर्वक उसका परित्याग कर दे। खजूर और काँटेदार वृक्ष भी शिविरमें नहीं रहने चाहिये; क्योंकि वे विद्या और बुद्धिको नष्ट कर देनेवाले होते हैं; अतः उनसे दूर रहना ही ठीक है। गाँवों और नगरोंमें चना आदि अन्नोंके पेड़ मङ्गलप्रद होते हैं। गाँव, नगर तथा शिविरमें गन्नेका वृक्ष सदा शुभदायक होता है। अशोक, सिरिस और कदम्ब शुभप्रद होते हैं। हल्दी, अदरक, हरीतकी और आमलकी—ये गाँवों तथा नगरोंमें सदा शुभदायिनी तथा कल्याणकारिणी होती हैं।
वास्तुभूमिमें स्थापन करनेवालोंके लिये गजकी अस्थि शुभदायिनी और उच्चैःश्रवाके वंशज घोड़ोंकी हड्डी कल्याणकारिणी होती है। इनके अतिरिक्त अन्य पशुओंकी अस्थि शुभकारक नहीं होती; वह विनाशका कारण होती है। वानरों, मनुष्यों, गदहों, गौओं, कुत्तों, सियारों और बिलावोंकी हड्डी अमङ्गलकारिणी होती है। शिविरके पूर्व, पश्चिम, उत्तर और ईशानकोणमें जलका रहना उत्तम है। इनके अतिरिक्त अन्य दिशाओंमें अशुभ होता है। शिल्पिन्! बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि जिसकी लंबाई-चौड़ाई समान हो, ऐसा घर न बनावें; क्योंकि चौकोर गृहमें वास करना गृहस्थोंके धनका नाशक होता है। घरकी परिमित लंबाई-चौड़ाईमें पृथक्-पृथक् दोका भाग देनेसे यदि शेष शून्यरहित हो तो शुभ अन्यथा शून्य शेष आनेपर वह घर मनुष्योंके लिये शून्यप्रद होता है। गृहोंकी चौड़ाईमें पश्चिमसे दो हाथ पूर्व और लंबाईमें दक्षिणसे तीन हाथ हटकर घरका तथा परकोटेका द्वार रखना शुभदायक होता है। मध्यभागमें दरवाजा नहीं बनाना चाहिये; क्योंकि वह कुछ कम-बेशमें ही रखनेपर शुभकारक होता है। चौकोर घर चन्द्रवेध होनेपर मङ्गलप्रद होता है; परंतु मङ्गलप्रद गृह भी सूर्यवेध होनेपर अमङ्गलकारक हो जाता है। उसी प्रकार सूर्यवेध आँगन भी अमङ्गलदायक होता है। घरके भीतर लगायी हुई तुलसी मनुष्योंके लिये कल्याणकारिणी, धन-पुत्र प्रदान करनेवाली, पुण्यदायिनी तथा हरिभक्ति देनेवाली होती है। प्रातःकाल तुलसीका दर्शन करनेसे सुवर्ण-दानका फल प्राप्त होता है। मकानके पूर्व और दक्षिणभागमें मालती, जूही, कुन्द, माधवी, केतकी, नागेश्वर, मल्लिका (मोतिया), काञ्चन (श्याम धतूर), मौलसिरी और शुभदायिनी अपराजिता (विष्णुक्रान्ता)—इन पुष्पोंका उद्यान शुभद होता है; इसमें तनिक भी संशय नहीं है। गृहस्थको सोलह हाथसे ऊँचा गृह नहीं बनवाना चाहिये। इसी तरह बीस हाथसे ऊँचा परकोटा भी शुभप्रद नहीं होता। बुद्धिमान् पुरुषको घरके समीप तथा गाँवके बीचमें बढ़ई, तेली और सोनारको नहीं बसाना चाहिये; किंतु मकानके पास-पड़ोसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सत्शूद्र, ज्योतिषी, भाट, वैद्य और पुष्पकार (माली)-को अवश्य रहने देना चाहिये। शिविरके चारों ओर
१०९- रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७४३
सौ हाथ लंबी और दस हाथ गहरी खाई प्रशस्त मानी जाती है। उस खाईका दरवाजा भी ऐसा संकेतयुक्त होना चाहिये, जो शत्रुके लिये अगम्य हो; परंतु मित्र सुखपूर्वक आ-जा सकें। भवन-निर्माणमें सेमल, इमली, हिंताल (एक प्रकारका जंगली खजूर), नीम, सिन्धुवार (निर्गुण्डी), गूलर, धतूरा, बरगद और रेंड—इनके अतिरिक्त अन्य वृक्षोंकी ही लकड़ी काममें लानी चाहिये। वस्तुतस्तु बुद्धिमान्को लकड़ी, वज्रहस्त तथा शिला आदिका उपयोग न करना ही उचित है; क्योंकि ये स्त्री, पुत्र और धनके नाशक होते हैं—ऐसा कमलजन्मा ब्रह्माका कथन है। वत्स! यह सब मैंने लोक-शिक्षाके लिये कहा है। अब तुम सुखपूर्वक जाओ और बिना काष्ठके ही पुरीका निर्माण करो; क्योंकि उसके लिये यही शुभ मुहूर्त है।
तब विश्वकर्मा गरुड़के साथ श्रीहरिको नमस्कार करके वहाँसे चल दिये और समुद्र-तटपर मनोहर वटवृक्षके नीचे आकर उन्होंने गरुड़के साथ वहाँ रात्रिमें शयन किया। मुने! स्वप्नमें गरुड़को वह रमणीय द्वारकापुरी दिखायी पड़ी। परमात्मा श्रीकृष्णने विश्वकर्मासे जो कुछ कहा था, वे सारे-के-सारे लक्षण उन्हें उस नगरमें दृष्टिगोचर हुए। स्वप्नमें वे सभी कारीगर विश्वकर्माकी और दूसरे बलवान् गरुड़ पक्षी गरुड़की हँसी उड़ा रहे थे। जागनेपर उस पुरीको देखकर गरुड़ और विश्वकर्मा लज्जित हो गये। वह द्वारकापुरी अत्यन्त रमणीय थी और सौ योजनमें उसका विस्तार था। वह ब्रह्मा आदि देवताओंकी पुरियोंको पराभूत करके सुशोभित हो रही थी; उसमें रत्नोंकी कारीगरी की गयी थी, जिसके कारण उसके तेजसे सूर्य ढक गये थे।
श्रीनारायणजी कहते हैं—नारद! इसी समय ब्रह्मा, हर, पार्वती, अनन्त, धर्म, सूर्य, अग्नि, कुबेर, वरुण, वायु, यम, महेन्द्र, चन्द्र, रुद्र, आदित्य, वसु, दैत्य, गन्धर्व, किंनर आदि सब द्वारकापुरी देखने आये। आकाश दर्शनार्थियोंके विमानोंसे छा गया। सबने मनोहर रत्नमयी शोभायुक्त दिव्य द्वारकाको देखा। वहाँ भगवान्के स्मरण करते ही वसुदेव, देवकी, उग्रसेन, पाण्डवगण, नन्द, यशोदा, गोप-गोपी, विभिन्न देशोंके राजा, संन्यासी, यति, अवधूत और ब्रह्मचारी आ गये। पञ्चवर्षीय दिगम्बर चारों सनकादि मुनि, दुर्वासा, कश्यप, वाल्मीकि, गौतम, बृहस्पति, शुक्र, भरद्वाज, अङ्गिरा, प्रचेता, पुलस्त्य, अगस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, मरीचि, शतानन्द, ऋष्यशृंग, विभाण्डक, पाणिनि, कात्यायन, याज्ञवल्क्य, शुक, पराशर, च्यवन, गर्ग, सौभरि, गालव, लोमश, मार्कण्डेय, वामदेव, जैगीषव्य, सांदीपनि, वोढु, पञ्चशिख, मैं (नारायण), नर, विश्वामित्र, जरत्कारु, आस्तीक, परशुराम, वात्स्य, संवर्त, उतथ्य, जैमिनि, पैल, सुमन्त, व्यास, कपिल, शृंगी, उपमन्यु, गौरमुख, कच, द्रोण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य आदि अपने असंख्य शिष्योंसहित पधारे; तथा भीष्म, कर्ण, शकुनि, भ्राताओंसहित दुर्योधन आदि सब आये। उग्रसेन आदिने उन सबका स्वागत-सत्कार किया।
देवताओं और मुनियोंका स्वागत-सत्कार करनेपर उन लोगोंने उग्रसेन आदिको विविध उपहार दिये। तदनन्तर ब्राह्मणोंको मणि, रत्न और वस्त्र आदि दान किये गये। उग्रसेनका राज्याभिषेक हुआ और सब लोग परमानन्दित होकर अपने-अपने घर लौटे। (अध्याय १०३-१०४)
८१- श्रीकृष्णके कहनेसे नन्द-यशोदाका ज्ञानप्राप्तिके लिये कदलीवनमें राधिकाके पास जाना, वहाँ अचेतनावस्थामें पड़ी हुई राधाको श्रीकृष्णके सन्देशद्वारा चैतन्य करना और राधाका उपदेश देनेके लिये उद्यत होना
७४४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण भीष्मकद्वारा रुक्मिणीके विवाहका प्रस्ताव, शतानन्दका उन्हें श्रीकृष्णके साथ विवाह करनेकी सम्मति देना, रुक्मीद्वारा उसका विरोध और शिशुपालके साथ विवाह करनेका अनुरोध, भीष्मकका श्रीकृष्ण तथा अन्यान्य राजाओंको निमन्त्रित करना श्रीनारायणजी कहते हैं - नारद ! विदर्भ देशमें भीष्मक नामके एक राजा राज्य करते थे, जो नारायणके अंशसे उत्पन्न हुए थे। वे विदर्भदेशीय नरेशोंके सम्राट्, महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, पुण्यात्मा, सत्यवादी, समस्त सम्पत्तियोंके दाता, धर्मिष्ठ, अत्यन्त महिमाशाली, सर्वश्रेष्ठ और समादृत थे। उनके एक कन्या थी, जिसका नाम रुक्मिणी था। वह महालक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न थी तथा नारियोंमें श्रेष्ठ, अत्यन्त सौन्दर्यशालिनी, मनोहारिणी और सुन्दरी स्त्रियोंमें पूजनीया थी। उसमें नयी जवानीका उमंग था। वह रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके शरीरकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति उद्दीप्त थी। वह अपने तेजसे प्रकाशित हो रही थी तथा शुद्धसत्त्वस्वरूपा, सत्यशीला, पतिव्रता, शान्त, दमपरायणा और अनन्त गुणोंकी भण्डार थी। वह शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके सदृश शोभाशालिनी थी। उसके नेत्र शरत्कालीन कमलके-से थे और उसका मुख लज्जासे अवनत रहता था। अपनी उस सुन्दरी युवती कन्याको सहसा विवाहके योग्य देखकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, धर्मस्वरूप एवं धर्मात्मा राजा भीष्मक चिन्तित हो उठे। तब वे अपने पुत्रों, ब्राह्मणों तथा पुरोहितोंसे विचार- विमर्श करने लगे। भीष्मक बोले - सभासदो ! मेरी यह सुन्दरी कन्या बढ़कर विवाहके योग्य हो गयी है; अतः मैं इसके लिये मुनिपुत्र, देवपुत्र अथवा राजपुत्र - इनमेंसे किसी अभीष्ट उत्तम वरका वरण करना चाहता हूँ। अतः आपलोग किसी ऐसे योग्य वरकी तलाश करो, जो नवयुवक, धर्मात्मा, सत्यसंध, नारायणपरायण, वेद-वेदाङ्गका विशेषज्ञ, पण्डित, सुन्दर, शुभाचारी, शान्त, जितेन्द्रिय, क्षमाशील, गुणी, दीर्घायु, महान् कुलमें उत्पन्न और सर्वत्र प्रतिष्ठित हो । राजाधिराज भीष्मककी बात सुनकर महर्षि गौतमके पुत्र शतानन्द, जो वेद-वेदाङ्गके पारगामी विद्वान्, यथार्थज्ञानी, प्रवचनकुशल, विद्वान्, धर्मात्मा, कुलपुरोहित, भूतलपर सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता और समस्त कर्मोंमें निष्णात थे, राजासे बोले। शतानन्दने कहा - राजेन्द्र ! तुम तो स्वयं ही धर्मके ज्ञाता तथा धर्मशास्त्रमें निपुण हो; तथापि मैं वेदोक्त प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ, सुनो। जो परिपूर्णतम परमेश्वर ब्रह्माके भी विधाता हैं; ब्रह्मा, शिव और शेषद्वारा वन्दित, परमज्योतिःस्वरूप, भक्तानुग्रहमूर्ति, समस्त प्राणियोंके परमात्मा, प्रकृतिसे परे, निर्लिप्त, इच्छारहित और
११०- श्रीकृष्णके कहनेसे नन्द-यशोदाका ज्ञानप्राप्तिके लिये कदलीवनमें राधाके पास जाना और अचेतन अवस्थामें पड़ी राधाको चैतन्य करना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७४५
सबके कर्मोंके साक्षी हैं; वे स्वयं श्रीमान् नारायण पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूतलपर वसुदेवनन्दनके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। राजेन्द्र! उन परिपूर्णतमको कन्या-दान करके तुम अपनी सौ पीढ़ियोंके साथ गोलोकमें जाओगे। अतः उन्हें कन्या देकर परलोकमें सारूप्य-मुक्ति प्राप्त कर लो और इस लोकमें सर्वपूज्य तथा विश्वके गुरुके गुरु हो जाओ। विभो! सर्वस्व दक्षिणामें देकर महालक्ष्मी-स्वरूपा रुक्मिणीको उन्हें समर्पित कर दो और अपने जन्म-मरणके चक्करको नष्ट कर डालो। राजन्! ब्रह्माने यही सम्बन्ध लिख रखा है और यह सर्वसम्मत भी है; अतः शीघ्र ही द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णके पास ब्राह्मण भेजो और जल्दी-से-जल्दी जो सभीको सम्मत हो, ऐसा शुभ मुहूर्त निश्चित करके परमात्मा श्रीकृष्णको—जो भक्तानुग्रह-मूर्ति, ध्यानानुरोधके कारण, नित्यविग्रहधारी और सर्वोत्तम हैं—यहाँ बुलाओ। नरेश! इस प्रकार उनके दर्शन करके अपना आवागमन मिटा डालो। महाराज! जिन्हें चारों वेद, संत, देवगण, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र तथा ब्रह्मा आदि देवता नहीं जान पाते; ध्यानपूत योगीलोग जिनका ध्यान करते हैं; परंतु साक्षात्कार नहीं कर पाते; चारों वेद, छहों शास्त्र और सरस्वती जिनका गुणगान करनेमें जड हो जाती है; हजार मुखवाले शेषनाग, पाँच मुखधारी महेश्वर, चार मुखवाले जगत्स्रष्टा ब्रह्मा, कुमार कार्तिकेय, ऋषि, मुनि तथा परम वैष्णव भक्तगण जिनका स्तवन करके पार नहीं पाते; जो योगियोंके लिये ध्यानद्वारा साध्य हैं; उन श्रीकृष्णका गुण मैं बालक होकर किस प्रकार वर्णन कर सकता हूँ?
शतानन्दजीका वचन सुनकर राजाका मुख प्रफुल्लित हो उठा। उन्होंने वेगपूर्वक उठकर शतानन्दजीका आलिङ्गन किया। उस समय राजाके मुखपर प्रसन्नता खेल रही थी; उन्होंने शतानन्दजीको नाना प्रकारके रत्न, सुवर्ण, वस्त्र, रत्ननिर्मित आभूषण, गजराज, श्रेष्ठ अश्व, मणिनिर्मित रथ, रमणीय रत्नसिंहासन, बहुत-सा धन, सम्पूर्ण अन्नोंसे भरी हुई ऐसी उत्तम भूमि, जो बिना जोते अन्न उपजानेवाली तथा सदा वृष्टि करनेवाली थी और सबके द्वारा प्रशंसित गाँव दिये। इसी बीच राजकुमार रुक्मि—जो चञ्चल स्वभाववाला तथा अधर्मी था—कुपित हो उठा। क्रोधावेशमें उसके मुख और नेत्र लाल हो गये तथा उसका शरीर काँपने लगा। वह सभामें उठकर सभी सभासदोंके समक्ष खड़ा हो गया और पिता भीष्मक तथा विप्रवर शतानन्दजीसे बोला।
रुक्मिने कहा—राजेन्द्र! इन भिक्षुकों, लोभियों और क्रोधियोंकी बात छोड़िये तथा मेरा हितकारक, तथ्य एवं प्रशंसनीय वचन सुनिये। महाबाहो! कृष्णने भयवश युक्तिका आश्रय लेकर राजेन्द्र मुचुकुन्दके सामने कालयवनका वध करके उसका सारा धन हड़प लिया है। उसी कालयवनका धन पाकर ही कृष्ण द्वारकामें धनी हो गये हैं। उन्होंने एक जरासंधके भयसे डरकर समुद्रके भीतर घर बनाया है। परंतु ऐसे सैकड़ों जरासंधोंको मैं अकेले ही क्षणभरमें खेल-ही-खेलमें मार सकता हूँ; फिर किसी अन्य राजाकी तो बात ही क्या है? भीष्मक! मैं दुर्वासाका शिष्य हूँ और रणशास्त्रमें निपुण हूँ। अपने उसी ज्ञानके बलसे मैं निश्चय ही विश्वका संहार करनेमें समर्थ हूँ। मेरे समान बलवान् या तो परशुरामजी हैं या शिशुपाल ही मेरी समता कर सकता है। वह शिशुपाल मेरा सखा, बलवान्, शूरवीर और स्वर्गको भी जीत लेनेकी शक्ति रखता है। मैं भी क्षणभरमें गणसहित महेन्द्रको जीतनेमें समर्थ हूँ। नरेश्वर! दुर्बल एवं योगी जरासंधको युद्धमें जीतकर श्रीकृष्णको अहंकार हो गया है। वे अपने मन अपनेको वीर मानने लगे हैं; परंतु यदि वे विवाह करनेकी इच्छासे मेरे नगरमें आयेंगे तो मैं क्षणभरमें निश्चय ही उन्हें यमलोक पहुँचा दूँगा।
८२- राधिकाद्वारा 'राम' आदि भगवन्नामोंकी व्युत्पत्ति और उनकी प्रशंसा तथा यशोदाके पूछनेपर अपने 'राधा' नामकी व्याख्या करना.
७४६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जो वैश्यजातीय नन्दका पुत्र, गौओंका चरवाहा, गोपाङ्गनाओंका लम्पट और ग्वालोंकी जूठन खानेवाला है, उसे आप कन्या देना स्वीकार करते हैं। यह महान् आश्चर्यकी बात है! राजेन्द्र! इस बकवादीके वचनसे आपकी बुद्धि मारी गयी है; इसी कारण इस भिक्षुक ब्राह्मणके कहनेसे आप देवयोग्या रुक्मिणीको श्रीकृष्णके हाथों सौंपना चाहते हैं। अरे! वह तो न राजपुत्र है, न शूरवीर है, न कुलीन है, न पवित्र आचरणवाला है, न दाता है, न धनी है, न योग्य है और न जितेन्द्रिय ही है। इसलिये भूपाल! आप शिशुपालको कन्या दीजिये; क्योंकि वह सुपूत एवं राजाधिराजका पुत्र है तथा अपने बलसे रुद्रको भी संतुष्ट कर चुका है। राजन्! अब शीघ्र ही पत्र भेजकर विभिन्न देशोंमें उत्पन्न हुए नरेशों, भाई-बन्धुओं तथा मुनिवरोंको निमन्त्रित कीजिये।
तदनन्तर रुक्मीकी बात सुनकर पुरोहितसहित राजेन्द्र भीष्मकने एकान्त स्थानमें मन्त्रीके साथ पूर्णरूपसे सलाह की। तत्पश्चात् जो सबको अभीष्ट था, ऐसा शुभ लग्न निश्चित करके एक योग्य एवं अन्तरङ्ग ब्राह्मणको द्वारका भेजनेकी व्यवस्था की। इधर राजा तुरंत ही हर्षपूर्वक सामग्री जुटानेमें लग गये और पुत्रके कहनेसे उन्होंने चारों ओर निमन्त्रण-पत्र भेज दिये। उधर उस ब्राह्मणने सुधर्मा-सभामें, जो राजाओं तथा देवताओंसे परिवेष्टित थी; पहुँचकर राजा उग्रसेनको वह मङ्गल-पत्रिका दी। उस परम माङ्गलिक पत्रको सुनकर राजा उग्रसेनका मुख प्रफुल्लित हो उठा। उन्होंने हर्षमें भरकर ब्राह्मणोंको हजारों स्वर्णमुद्राएँ दान कीं और द्वारकामें चारों ओर दुन्दुभिका शब्द कराकर घोषणा करा दी। श्रीकृष्णकी उस बारातमें बड़े-बड़े देवता, मुनि, राजागण, यादवगण, कौरव, पाण्डव, विद्वान् ब्राह्मण, माली, शिल्पी, गायक, गन्धर्व आदि सम्मिलित हुए। उस समय उपबर्हण नामक गन्धर्वके रूपमें तुम नारद भी बारातके साथ थे। (अध्याय १०५)
रेवती और बलरामके विवाहका वर्णन तथा रुक्मी, शाल्व, शिशुपाल और दन्तवक्रका श्रीकृष्णको कटुवचन कहना
श्रीनारायण कहते हैं— नारद! इसी समय महाबली राजा ककुद्मी अपनी कन्याके लिये वरकी तलाशमें ब्रह्मलोकसे भूतलपर आये। उनकी कन्याका नाम रेवती था। वह निरन्तर स्थिर यौवनवाली, अमूल्य रत्नोंसे विभूषित और तीनों लोकोंमें दुर्लभ थी। उसकी आयुके सत्ताईस युग बीत चुके थे। राजाने कौतुकवश अपनी उस कन्याको महाबली बलदेवको ब्याह दिया। इस प्रकार मुनियों तथा देवेन्द्रोंकी सभामें विधानपूर्वक कन्यादान करके राजाने लाखों-लाखों हाथी, घोड़े, रथ, रत्नाभूषण, मणि-रत्न, करोड़ों स्वर्णमुद्राएँ जामाताको दहेजमें दीं तथा सुन्दर दिव्य वस्त्रादि दिये। यों बलशाली बलदेवको कन्या देकर राजेन्द्र ककुद्मी अमूल्य रत्नोंके सारसे निर्मित रथद्वारा कुण्डिन-नगरको गये। तदनन्तर उस वैवाहिक मङ्गल-कार्यके समाप्त होनेपर देवकी, रोहिणी, नन्दपत्नी यशोदा, अदिति, दिति और शान्तिने जय-जयकार करके रेवतीको, जो नारियोंमें श्रेष्ठ तथा लक्ष्मीकी कलास्वरूपा थीं, महलमें प्रवेश कराया। तत्पश्चात् वसुदेवजीकी प्रियतमा पत्नी देवकीने हर्षपूर्वक सारा मङ्गल-कार्य सम्पन्न कराया और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें धन दान दिया।
तदनन्तर देवताओं और मुनियोंका समुदाय तथा देश-देशान्तरके नरेश आनन्दमग्न हो अपनी-अपनी सेनाओंके साथ सहसा कुण्डिन-नगरमें
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७४७
आ पहुँचे। उन सब लोगोंने उस परम मनोहर नगरका अवलोकन किया। बारातियोंने उस नगरके बाहरी दरवाजेको देखा; चार महारथी सैनिकोंके साथ उसकी रक्षा कर रहे थे। उनके नाम थे—रुक्मी, शिशुपाल, महाबली दन्तवक्र और मायावियोंमें श्रेष्ठ एवं युद्ध-शास्त्रमें निपुण शाल्व। उस समय राजकुमार रुक्मि, जो युद्धके लिये उद्यत हो नाना शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित रथपर सवार था, श्रीकृष्णकी सेनाका अवलोकन करके कुपित हो उठा और
ऐसे निष्ठुर वचन कहने लगा जो कर्णकटु, अत्यन्त दुष्कर तथा मुनीन्द्रों, देवगणों और मुनिवरोंके लिये उपहासास्पद थे।
रुक्मिने कहा—अहो! कालकृत कर्म और दैवको कौन हटा सकता है? भला, मैं देवेन्द्रोंकी सभामें क्या कहूँगा; क्योंकि जो नन्दके पशुओंका रखवाला, गोपियोंका साक्षात् लम्पट और ग्वालोंकी जूठन खानेवाला है तथा जिसकी जाति, खान-पान और उत्पत्तिका कोई निर्णय ही नहीं है; यह भी पता नहीं कि क्या वह राजकुमार है अथवा किसी मुनिका पुत्र है; जिसके पिता वसुदेव क्षत्रिय हैं, परंतु जिसका भरण-पोषण वैश्यके घर हुआ है; जिस दुष्टने अभी हालमें ही मथुरामें धर्मात्मा राजा कंसको मार डाला है, अतः उस राजेन्द्रके वधसे जिसे निश्चय ही ब्रह्महत्या लगी है; वह कृष्ण देवताओं और मुनियोंके साथ देवयोग्य मनोहारिणी कन्या रुक्मिणीको ग्रहण करनेके लिये आ रहा है। फिर शाल्व, शिशुपाल और दन्तवक्रने भी कुवाक्य कहे। इन सबके दुर्वचनोंको सुनकर बारातमें आये हुए देवता, मुनि, राजागण और बलदेवजीसहित यादवोंको क्रोध आ गया। (अध्याय १०६)
रुक्मी आदिका यादवोंके साथ युद्ध, शाल्वका वध, रुक्मीकी सेनाका पलायन, बारातका पुरीमें प्रवेश और स्वागत-सत्कार, शुभलग्नमें श्रीकृष्णका बारातियों तथा देवोंके साथ राजाके आँगनमें जाना, भीष्मकद्वारा सबका सत्कार करके श्रीकृष्णका पूजन
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर बलदेवजीने हलके द्वारा रुक्मिका रथ भङ्ग कर दिया। फिर तो घोर युद्ध आरम्भ हो गया। शाल्व मारा गया। बलदेवजी शिशुपालको मार रहे थे; परंतु उसे श्रीकृष्णके द्वारा मारे जानेवाला समझकर शिवजीने बलदेवजीको रोक दिया। बलदेवजीके विक्रमको देखकर सब इधर-उधर भाग गये।
तब महामुनि शतानन्दजीने आकर अभ्यर्थना की। बारातने पुरीमें प्रवेश किया। बड़ा भारी स्वागत-सत्कार किया गया। उस समयकी वर-रूपमें सुसज्जित श्रीकृष्णकी शोभा अवर्णनीय थी। उनके शरीरकी कान्ति नूतन जलधरके समान
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श्याम थी, वे पीताम्बरसे सुशोभित थे, उनके सर्वाङ्गमें चन्दनका अनुलेप किया गया था, वे वनमालासे विभूषित तथा रत्नोंके बाजूबंद, कङ्कण और हिलते हुए हारसे प्रकाशित हो रहे थे, उनके कपोल रत्ननिर्मित दोनों कुण्डलोंसे उद्भासित हो रहे थे, कटिभागमें अमूल्य रत्नोंके सारभागसे बनी हुई करधनीकी मधुर झंकार हो रही थी, जिससे उनकी शोभा और बढ़ गयी थी, उनके एक हाथमें मुरली सुशोभित थी, वे मुस्कराते हुए रत्नजटित दर्पणकी ओर देख रहे थे, सात गोप-पार्षद श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रहे थे, उनका शरीर नवयौवनके उमंगसे सम्पन्न था, नेत्र शरत्कालीन कमलके-से सुन्दर थे, मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी निन्दा कर रहा था, वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर हो रहे थे और उनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंका मान हर रहा था। वे सत्य, नित्य, सनातन, तीर्थोंको पावन करनेवाले, पवित्रकीर्ति तथा ब्रह्मा, शिव और शेषनागद्वारा वन्दित हैं। उनका रूप परम आह्लादजनक था तथा उनकी प्रभा करोड़ों चन्द्रमाओंके सदृश थी। वे ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, परमोत्कृष्ट तथा प्रकृतिसे परे हैं। वे दूर्वासहित रेशमी सूत्र, अमूल्य रत्नजटित दर्पण और कंघी करके ठीक की हुई कदलीकी खिली हुई मञ्जरी धारण किये हुए थे। उनकी शिखा मालतीकी मालाओंसे विभूषित त्रिविक्रमके-से आकारवाली थी। उनका मस्तक नारियोंद्वारा दिये गये पुष्पमय मुकुटसे उद्दीप्त हो रहा था। ऐसे ऐश्वर्यशाली वरको देखकर युवतियाँ प्रेमवश मूर्च्छित हो गयीं और कहने लगीं कि ‘रुक्मिणीका जीवन धन्य एवं परम श्लाघनीय है।' जब महारानी भीष्मक-पत्नीकी दृष्टि अपने जामातापर पड़ी तब वे परम प्रसन्न हुईं। उनके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। वे निर्निमेष दृष्टिसे उनकी ओर निहारने लगीं। राजा भीष्मक भी अपने पुरोहित तथा मन्त्रियोंसहित परम हर्षित हुए। उन्होंने वहाँ आकर देवताओं, ब्राह्मणों तथा समस्त प्राणियोंको प्रणाम किया और उन सबको अमृतोपम भक्ष्यसामग्रियोंसे परिपूर्ण यथायोग्य वासस्थान दिया। वहाँ रात-दिन 'दीयताम्, दीयताम्—देते रहो, देते जाओ'—यही शब्द गूँज रहे थे।
उधर वसुदेवजीने देवताओं तथा भाई-बन्धुओंके साथ सुखपूर्वक वह रात व्यतीत की। प्रातःकाल उठकर उन्होंने शौच आदि प्रातःकृत्य समास किया। फिर स्नान करके शुद्ध धुली हुई धोती और चद्दर धारण करके संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म सम्पन्न किया। तत्पश्चात् वेदमन्त्रद्वारा श्रीहरिका शुभ अधिवासन (मूर्ति-प्रतिष्ठा) किया। फिर साक्षात् सम्पूर्ण देवताओं तथा सारी मातृकाओंका भलीभाँति पूजन और वसुधारा प्रदान करके वृद्धिश्राद्ध आदि मङ्गलकृत्य किये और देवताओं, ब्राह्मणों तथा जाति-भाइयोंको भोजन कराया, बाजा बजवाया, मङ्गल-कार्य कराये और अप्रतिम सौन्दर्यशाली वरका उत्तम शृङ्गार करवाया। फिर वरकी सवारीको अत्यन्त सुन्दर ढंगसे सजवाया।
इसी प्रकार राजा भीष्मकने भी पुरोहितोंके साथ वेद-मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारे वैवाहिक मङ्गल-कार्य सम्पन्न किये। हर्षमग्न हो भटों, ब्राह्मणों और भिक्षुकोंको भी मणि, रत्न, धन, मोती, माणिक्य, हीरे, भोजन-सामग्री, वस्त्र और अनुपम उपहार दिये, बाजा बजवाया, मङ्गल-कार्य कराया और रानियों तथा मुनि-पत्नियोंद्वारा यथोचित विधि-विधानके साथ रुक्मिणीको मनोहर सुन्दर साज-सज्जासे विभूषित कराया। तदनन्तर जब परमोदय माहेन्द्र नामक शुभ मुहूर्त, जो लग्नाधिपतिसे संयुक्त, शुद्ध शुभ ग्रहोंसे दृष्ट तथा असद् ग्रहोंकी दृष्टिसे रहित था। ऐसा विवाहोचित लग्न आया जिसमें नक्षत्र और क्षण शुभ थे, चन्द्र-बल और तारा-बल विशुद्ध था तथा शलाका आदि वेधदोष नहीं था। ऐसे परिणाममें सुखदायक
८३- प्रद्युम्नाख्यान-वर्णन, श्रीकृष्णका सोलह हजार आठ रानियोंके साथ विवाह और उनसे संतानोत्पत्तिका कथन, दुर्वासाका द्वारकामें आगमन और वसुदेव-कन्या एकानंशाके साथ विवाह, श्रीकृष्णके अद्भुत चरित्रको देखकर दुर्वासाका भयभीत होना, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और दुर्वासाका पत्नीको छोड़कर तपके लिये जाना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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तथा वर-वधूके लिये कल्याणकारी समयके आनेपर श्रीहरि महाराज भीष्मकके प्राङ्गणमें पधारे। उस समय उनके साथ देवता, मुनि, ब्राह्मण, पुरोहित, जाति-भाई, बन्धु-बान्धव, पिता, माता, नरेशगण, ग्वाले, मनोहर वेश-भूषासे सुसज्जित समवयस्क पार्षद, भट्ट और ज्योतिः-शास्त्रविशारद गणक भी थे। उस स्थानकी मङ्गलमयता, माङ्गलिक वस्तुओंसे सुशोभित मनोहर विचित्र शिल्पकलाके द्वारा निर्मित सभाको देखकर सब मुग्ध हो गये। तब ब्रह्मा आदि देवता, राजेन्द्र, दानवेन्द्र, सनकादि मुनि और श्रेष्ठ पार्षदोंके साथ भगवान् श्रीकृष्ण हर्षपूर्वक शीघ्र ही रथसे उतरकर आँगनमें खड़े हो गये। उन देवों, मुनीन्द्रों तथा नरेशोंको आये हुए देखकर राजा भीष्मक उतावलीके साथ सहसा उठ खड़े हुए और सिर झुकाकर उन सबकी वन्दना की; फिर उन्होंने आदरपूर्वक क्रमशः पृथक्-पृथक् सबका भलीभाँति पूजन करके उन्हें परम रमणीय रत्नसिंहासनोंपर बैठाया। उस समय राजाके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये थे। वे अञ्जलि बाँधकर भक्तिपूर्वक उन सबकी तथा वसुदेव और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए बोले।
भीष्मकने कहा—प्रभो! आज मेरा जन्म सफल, जीवन सुजीवन और करोड़ों जन्मोंके कर्मोंका मूलोच्छेद हो गया; क्योंकि जो लोकोंके विधाता, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता और तपस्याओंके फलदाता हैं; स्वप्नमें भी जिनके चरणकमलका दर्शन होना दुर्लभ है; वे सृष्टिकर्ता स्वयं ब्रह्मा मेरे आँगनमें विराजमान हैं। योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र, सुरेन्द्र और मुनीन्द्र ध्यानमें भी जिनका दर्शन नहीं कर पाते, वे देवाधिदेव शंकर मेरे आँगनमें पधारे हैं, जो कालके काल, मृत्युकी मृत्यु, मृत्युञ्जय और सर्वेश्वर हैं; वे भगवान् विष्णु मनुष्योंके दृष्टिगोचर हुए हैं। जिनके हजारों फणोंके मध्य एक फणपर सारा चराचर विश्व स्थित है और सम्पूर्ण वेदोंमें जिनकी महिमाका अन्त नहीं है; वे ये भगवान् अनन्त मेरे आँगनमें वर्तमान हैं। जो सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, सर्वप्रथम जिनकी पूजा होती है और जो देवगणोंमें श्रेष्ठ हैं; वे गणेश मेरे आँगनमें उपस्थित हैं। जो मुनियों और वैष्णवोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा ज्ञानियोंके गुरु हैं; वे भगवान् सनत्कुमार प्रत्यक्ष-रूपसे मेरे आँगनमें विद्यमान हैं। ब्रह्माके जितने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र और वंशज हैं; वे सभी ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित होते हुए आज मेरे घर अतिथि हुए हैं। अहो! मेरा यह वासस्थान कल्पान्तपर्यन्त तीर्थतुल्य हो गया। जिनके चरणोदकसे तीर्थ पावन हो जाते हैं, उन्हीं चरणोंके स्पर्शसे आज मेरा गृह विशुद्ध हो गया है, क्योंकि भूतलपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी सागरमें हैं और जितने सागरमें तीर्थ हैं, वे सभी ब्राह्मणके चरणोंमें वास करते हैं। जो प्रभु प्रकृतिसे परे हैं; ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवोंके लिये ध्यानद्वारा असाध्य हैं; योगियोंके लिये भी दुराराध्य, निर्गुण, निराकार तथा भक्तानुग्रहमूर्ति हैं; ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवगण जिनके चरणकमलका ध्यान करते हैं; जो कुबेर, गणेश और सूर्यके लिये भी दुर्लभ हैं; वे ही भगवान् साक्षात्-रूपसे मेरे घर पधारकर मनुष्योंके नयन-गोचर हुए हैं। यों कहकर भीष्मक स्वयं श्रीकृष्णको सामने लाकर सामवेदोक्त स्तोत्रद्वारा उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे।
भीष्मक बोले—भगवन्! आप समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा, सबके साक्षी, निर्लिप्त, कर्मियोंके कर्मों तथा कारणोंके कारण हैं। कोई-कोई आपका एकमात्र सनातन ज्योतिरूप बतलाते हैं। कोई, जीव जिनका प्रतिबिम्ब है, उन परमात्माका स्वरूप कहते हैं। कुछ भ्रान्तबुद्धि पुरुष आपको प्राकृतिक सगुण जीव उद्घोषित करते हैं। कुछ सूक्ष्मबुद्धिवाले ज्ञानी आपको नित्य