ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७३१ स्वयं श्रीकृष्णने सुदुर्लभ स्तोत्रराजद्वारा जिनकी पूजा की थी तथा जिनके चरणकमलोंमें कोमल दूर्वाङ्कुर, अक्षत, गन्ध और चन्दन निवेदित करके पारिजात-पुष्पोंकी पुष्पाञ्जलि समर्पित की थी; जो छत्तीस सखियोंकी स्वामिनी और तीस हजार करोड़ गोपियोंकी अधीश्वरी हैं; जिनका राधिका नाम है, जो श्रीकृष्णकी प्राणप्रिया और देवताओंकी भी पूजनीया हैं; उन सर्वश्रेष्ठ राधिकासे जो पापी द्वेष करते हैं अथवा उनकी निन्दा और हँसी उड़ाते हैं, उन्हें सौ ब्रह्महत्याका पाप लगता है; इसमें तनिक भी संशय नहीं है। उस पापके फलस्वरूप वे तप्त तैल, महाभयंकर अन्धकार, कीट और पीड़ा-यन्त्रोंसे युक्त कुम्भीपाक और रौरवनरकमें अपनी सात पीढ़ियोंके साथ चौदह इन्द्रोंकी आयुपर्यन्त यातना भोगते हैं। तत्पश्चात् लोकजन्मानुसार वे एक जन्ममें उस पापके कारण एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक विष्ठाके कीट होकर उत्पन्न होते हैं। इसके बाद उतने ही वर्षोंतक कुलटाओंकी योनिके रक्त और मलको खानेवाले योनि-कीट तथा मवाद चाटनेवाले मलकीट होते हैं। यों कहकर जब उद्धव रोने लगे और जानेके लिये उद्यत हुए, तब उनसे श्रीकृष्णके वियोगसे कातर हुई राधिका आँसू बहाती हुई पुनः बोलीं। श्रीराधिकाजीने कहा - वत्स! अब तुम मथुरापुरीको जाओ और यह सब माधवको बतलाओ। बेटा! मैं जिस प्रकार गोविन्दके शीघ्र दर्शन कर सकूँ, तुम्हें प्रयत्नपूर्वक वैसा ही करना चाहिये। अच्छा अब जाओ, मेरा जन्म तो मिथ्या दुराशासे निष्फल ही बीत गया; क्योंकि आशा ही परम दुःख है और निराशा परम सुख है। तत्पश्चात् गोविन्दका ध्यान करके राधिका जीवन्मुक्त हो गयीं। तदनन्तर राधिका पुनः वहाँ डाह मारकर रोने लगीं। तब रोती हुई राधाको प्रणाम करके उद्धव यशोदाके भवनकी ओर चले गये। नारद ! उद्धवके चले जानेपर राधा मूच्छित हो गयीं। उनकी चेतना लुप्त हो गयी और वे निरन्तर ध्यानमें तत्पर हो गयीं। मुने! तब श्रेष्ठ गोपियोंने कमल-सदृश नेत्रोंमें आँसू भरकर राधिकाको गीली भूमिपर बिछे हुए जलयुक्त कमलदलकी शय्यापर लिटाया; परंतु राधाके गात्रस्पर्शमात्रसे ही वह शय्या भस्म हो गयी। तब सखियोंने विरह-तापसे संतप्त हुई राधाको पुनः एक ऐसे कोमल स्थानपर सुलाया, जिसपर मुलायम चद्दर बिछी हुई थी और चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया था; परंतु वह सुगन्धित चन्दनयुक्त जल भी सहसा सूख गया। उस समय उद्धवके बिना राधाको एक निमेष सौ युगके समान प्रतीत होने लगा। वे कहने लगीं- 'हा उद्धव ! हा उद्धव ! तुम जल्दी जाकर श्रीहरिको मेरी दशा बतलाओ और जो मेरे प्राणेश्वर हैं उन श्रीहरिको शीघ्र यहाँ ले आओ।' तब संतापके कारण जिनकी चेतना नष्ट हो गयी थी; उन राधाको ऐसे दीन वचन कहते देखकर सभी गोपियाँ उन्हें अपनी छातीसे लगाकर रुदन करने लगीं; फिर राधाको होशमें लाकर उन्हें ढाढ़स बँधाने लगीं। (अध्याय ९७) श्रीकृष्णद्वारा गोकुलका वृत्तान्त पूछे जानेपर उद्धवका उसे कहते हुए राधाकी दशाका विशेषरूपसे वर्णन करना श्रीनारायण कहते हैं - नारद ! तदनन्तर उद्धव यशोदाको प्रणामकर उतावलीके साथ हर्षपूर्वक खर्जूर-काननको बाँयें करके यमुना- तटपर गये। वहीं स्नान-भोजन करके वे पुनः मथुराको चल पड़े। वहाँ पहुँचकर एकान्तमें वटकी छायामें बैठे हुए गोविन्दको देखा। उस