ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण इच्छारहित, परमात्मा, ईश्वर, अविनाशी, सत्य, परब्रह्म, प्रकृतिसे परे, परमेश्वर, परिपूर्णतम, शुद्ध, भक्तानुग्रहमूर्ति, कर्मियोंके कर्मोंके साक्षी, निर्लिप्त, ज्योतिःस्वरूप, कारणोंके भी परम कारण, सर्वस्वरूप, सर्वेश्वर, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता, शुभदायक, अपने भक्तोंको भक्ति, दास्य और अपनी सम्पत्ति प्रदान करनेवाले हैं; अतः अशुभकारक मात्सर्य तथा ज्ञाति-बुद्धिको छोड़कर आनन्दपूर्वक उन परमानन्दस्वरूप नन्दनन्दनका भजन करो। वेदकी कौथुमि-शाखामें उनका सहस्रनाम नन्दनन्दन नामसे वर्णित है। नारद ! यह सब सुनकर उद्धव परम विस्मित हुए और उस सम्पूर्ण ज्ञानको पाकर ज्ञानसे परिपूर्ण हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने अपने वस्त्रको गलेमें लपेट लिया और दण्डकी भाँति भूतलपर लेटकर मस्तकके बालोंसे राधिकाके चरणका स्पर्श करते हुए वे बारंबार उन्हें प्रणाम करने लगे। उस समय भक्तिके कारण उनके सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया था और नेत्रोंमें आँसू छलक आये थे। वे प्रेमवश तथा राधाके वियोगजन्य शोकसे व्यथित होकर उच्चस्वरसे रुदन करने लगे। तब उद्धवके प्रति प्रेम होनेके कारण राधा और गोपियाँ भी रोने लगीं। फिर उन्होंने उद्धवका गला पकड़कर बैठाया; परंतु उद्धवकी चेतना लुप्त हो गयी थी; अतः वे जँभाई लेते हुए मूर्च्छित हो गये। उनकी यह दशा देखकर राधिकाने शीघ्र ही उन कृष्णगतप्राण उद्धवको उठाकर बैठाया और उनके मुखकमलपर जलके छींटे देकर उन्हें चैतन्य कराया। नारद ! तत्पश्चात् उन्होंने 'वत्स ! चिरञ्जीव'—यों शुभाशीर्वाद दिया। तब उद्धव होशमें आकर उस उत्तम सभाके मध्य रोती हुई गोपियोंके सामने राधासे परमार्थप्रद वचन बोले। उद्धवने कहा—परम दुर्लभ जम्बूद्वीप सभी द्वीपोंमें धन्य और प्रशंसनीय है; क्योंकि उसमें श्रेष्ठ भारतवर्ष है, जिसकी सभी लोग कामना करते हैं। अहो ! उस भारतवर्षमें वृन्दावन नामक पुण्यवन है; जो श्रीराधाके चरणकमलके स्पर्शसे गिरी हुई रजसे पावन है और जिसके लिये देवगण भी लालायित रहते हैं। तीर्थपावनी राधाके चरणकमलकी रजसे पावन हुई वहाँकी भूमि तीनों लोकोंमें धन्य, मान्य, श्रेष्ठ और पूजनीय मानी जाती है। पूर्वकालमें ब्रह्माने गोलोकमें राधिका और श्रीकृष्णके दर्शनकी लालसासे पुष्करक्षेत्रमें वेदोक्त विधिके अनुसार भक्तिपूर्वक साठ हजार दिव्य वर्षोंतक तप किया; परंतु उस समय स्वप्नमें भी उन्हें गोलोकमें राधिका और श्रीकृष्णके दर्शन नहीं प्राप्त हुए। तदनन्तर उन्हें लीलापूर्वक सत्यरूपा आकाशवाणी सुनायी पड़ी, जो इस प्रकार थी— 'ब्रह्मन् ! वाराहकल्पके आनेपर भारतवर्षमें पुण्य वृन्दावनके मध्य जब परम रमणीय रासोत्सव प्रारम्भ होगा, तब वहीं रासमण्डलमें देवताओंके बीच बैठे हुए तुम्हें राधिका और श्रीकृष्णके दर्शन होंगे; इसमें संदेह नहीं है।' उस आकाशवाणीको सुनकर ब्रह्मा तपस्यासे विरत हो अपने लोकको लौट गये। समय आनेपर उन्हें श्रीकृष्णके दर्शन प्राप्त हुए, जिससे उनका हृदय प्रसन्न और चिरकालीन मनोरथ परिपूर्ण हो गया। अतः इन गोपों और गोपिकाओंका जन्म एवं जीवन सफल हो गया; क्योंकि ये नित्य श्रीराधाके चरणकमलको—जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये दुर्लभ है—देखती रहती हैं। योगीन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्धेन्द्र तथा वैष्णव संत सती राधिकाकी—जो मानिनी, पुण्यमयी, तीर्थोंको पावन बनानेवाली स्वतः शुद्ध और अत्यन्त दुर्लभ हैं—नित्य निरन्तर सेवा करते रहते हैं। जिससे उनको राधाका वह चरणकमल सुलभ हो जाता है, जिसका मिलना ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। सर्वेश्वरेश्वर परमात्मा श्रीकृष्णने जिनके चरणकमलोंके नखोंको महावरसे सुशोभित किया था; गोलोकमें स्थित शतशृङ्ग पर्वतपर रासमण्डलमें