ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७२९
राधाका उद्धवको बिदा करना, बिदा होते समय उद्धवद्वारा राधा-महत्त्व-वर्णन तथा उद्धवके यशोदाके पास चले जानेपर राधाका मूर्च्छित होना
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! उद्धवको जानेके लिये उद्यत देखकर श्रीहरिकी प्रिया महासती राधिका गोपियोंसहित तुरंत ही संत्रस्त एवं समुद्विग्न हो उठीं। उनका हृदय दुःखसे भर आया। तब उन्होंने शीघ्र ही आसनसे उठकर उद्धवके मस्तकपर हाथ रखा और उन्हें शुभाशीर्वाद दिया। फिर कोमल दूर्वाङ्कुर, अक्षत, श्वेत धान्य, पुष्प, मङ्गल-द्रव्य, लाजा, फल, पत्ता तथा दधि लानेकी आज्ञा दी। तत्पश्चात् गन्ध, सिन्दूर, कस्तूरी और चन्दनसे युक्त तथा फल-पल्लवसे सुशोभित जलपूर्ण कलश, दर्पण, पुष्पमाला, जलता हुआ दीपक, लाल चन्दन, पति-पुत्रवती साध्वी स्त्री, सुवर्ण और चाँदीके दर्शन कराये। तदनन्तर दुःखी हृदयवाली महासाध्वी राधिका नेत्रोंमें आँसू भरकर चरणोंमें पड़े हुए उद्धवसे हितकारक, सत्य, गोपनीय, मङ्गल-वचन बोलीं।
राधिकाने कहा—वत्स! तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो; तुम्हें सदा कल्याणकी प्राप्ति होती रहे; तुम श्रीहरिसे ज्ञान-लाभ करो और श्रीकृष्णके परम प्रिय हो जाओ। श्रीकृष्णकी भक्ति और उनकी दासता सभी वरदानोंमें उत्तम वरदान है; क्योंकि हरिभक्ति (सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और एकत्व—इन) पाँच प्रकारकी मुक्तियोंसे भी श्रेष्ठ एवं महत्त्वपूर्ण है तथा श्रीहरिकी दासता ब्रह्मत्व, देवत्व, इन्द्रत्व, अमरत्व, अमृत और सिद्धिलाभसे भी बढ़कर परम दुर्लभ है। अनेक जन्मोंकी तपस्याके फलस्वरूप भारतवर्षमें जन्म लेकर यदि हरिभक्तिकी प्राप्ति हो जाय तो उसका वह जन्म परम दुर्लभ है। कर्मका क्षय करनेवाले उस व्यक्तिका तथा उसके सहस्रों पितरों, माता, मातामहों, सैकड़ों पूर्वजों, सहोदर भाई, बान्धव, पत्नी, गुरुजन, शिष्य और भृत्यका भी जीवन निश्चय ही सफल हो जाता है*। वत्स! जो कर्म श्रीकृष्णको समर्पण कर दिया जाय; वही उत्तम कर्म है। जिस कर्मसे श्रीकृष्णको संतुष्ट किया जा सके; वही कर्म शुद्ध एवं शोभन है। संकल्पको सिद्ध करनेवाला जो कर्म प्रीति एवं विधिपूर्वक किया जाता है; वही मङ्गलकारक, धन्य और परिणाममें सुखदायक होता है। श्रीकृष्णके उद्देश्यसे किया हुआ व्रत, उपवास, तपस्या, सत्यभाषण, भक्ति तथा पूजन, केवल उनकी दासता-प्राप्तिका कारण होता है। समस्त पृथ्वीका दान, भूमिकी प्रदक्षिणा, समस्त तीर्थोंमें स्नान, समस्त व्रत, तप, समस्त यज्ञोंका अनुष्ठान, सम्पूर्ण दानोंका फल, समस्त वेद-वेदाङ्गोंका पठन-पाठन, भयभीतका रक्षण, परम दुर्लभ ज्ञान-दान, अतिथियोंका पूजन, शरणागतकी रक्षा, सम्पूर्ण देवताओंका अर्चन-वन्दन, मनोजय, पुरश्चरणपूर्वक ब्राह्मणों और देवताओंको भोजन देना, गुरुकी शुश्रूषा करना, माता-पिताकी भक्ति और उनका पालन-पोषण—ये सभी श्रीकृष्णकी दासताकी सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते। इसलिये उद्धव! तुम यत्नपूर्वक उन परात्पर श्रीकृष्णका भजन करो। वे निर्गुण,
* कृष्णे भक्तिः कृष्णदास्यं वरेषु च वरं वरम्। श्रेष्ठा पञ्चविधा मुक्तेर्हरिभक्तिर्गरीयसी ॥
ब्रह्मत्वादपि देवत्वादिन्द्रत्वादमरादपि। अमृतात् सिद्धिलाभाच्च हरिदास्यं सुदुर्लभम् ॥
अनेकजन्मतपसा सम्भूय भारते द्विज। हरिभक्तिं यदि लभेत् तस्य जन्म सुदुर्लभम् ॥
सफलं जीवनं तस्य कुर्वतः कर्मणः क्षयम्। पितॄणां च सहस्राणां स्वस्य मातुश्च निश्चितम् ॥
मातामहानां पुंसां च शतानां सोदरस्य च। बान्धवस्यापि पत्याश्च गुरूणां शिष्यभृत्ययोः ॥
(९७।८—१२)