भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 738
७२८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

आयुको रात-दिनके व्याजसे क्षीण करते रहते हैं; परंतु जो श्रीहरिके शुद्ध भक्त हैं, उन पुण्यवान् संतोंपर उनका वश नहीं चलता। उदाहरणस्वरूप ब्रह्माके चारों मानस-पुत्र भगवद्भक्त सनकादिकोंपर दृष्टिपात करो। उनकी आयु सदा सुस्थिर रहती है। वे उपनयन-संस्काररहित पाँच वर्षके शिशुओंकी भाँति सदा बालरूप ही रहते हैं और उसी अवस्थासे वे एकादश रुद्रों, द्वादश आदित्यों और ज्ञानियोंके गुरुके भी गुरु हैं। उनके हृदय विशाल हैं, मुखोंपर प्रसन्नता छायी रहती है, वेष दिगम्बर है, शरीर श्रीकृष्णके ध्यानसे पवित्र हो गये हैं। वे विष्णुभक्तिपरायण और तीर्थोंको भी पावन करनेवाले हैं। उन्हें वेद-वेदाङ्ग और शास्त्रोंकी चिन्ता नहीं रहती, उनका मन प्रफुल्लित रहता है और वे रात-दिन लगातार भक्तिपूर्वक श्रीहरिके ध्यानमें तत्पर रहते हैं। उनके नाम सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन और चौथे सनत्कुमार हैं। जो लोग इनका सब तरहसे स्मरण करते हैं, उन्हें तीर्थस्नानजनित फलकी प्राप्ति होती है, वे किये हुए पापोंसे मुक्त हो जाते हैं, उनके हृदयमें हरिभक्ति उत्पन्न हो जाती है और वे हरिकी दासताके भागी हो जाते हैं। इसके बाद मृकण्डुके पुत्र द्विजवर मार्कण्डेयको देखो, जो अपने कर्मवश लाखों वर्षोंतक ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित होते रहे; तत्पश्चात् श्रीहरिकी सेवासे उन्हें सात कल्पोंतककी आयु प्राप्त हुई। फिर वोढु, पञ्चशिख, लोमश और आसुरिको देखो। ये सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करके श्रीहरिकी सेवामें तत्पर और सदा श्रीहरिके चरणका ध्यान करते रहते हैं। इनकी आयु सौ कल्पोंकी है। पुनः जमदग्निनन्दन चिरजीवी परशुराम, हनुमान्, बलि, व्यास, अश्वत्थामा, विभीषण, विप्रवर कृपाचार्य और ऋक्षराज जाम्बवान्‌को देखो। ये सभी श्रीहरिका ध्यान करनेसे शुद्ध और चिरजीवी हैं। उद्धव ! इनके अतिरिक्त सिद्धेन्द्रों, नरेन्द्रों तथा अन्य मनुष्योंमें जो श्रीहरिकी भावना करनेसे शुद्ध हो गये हैं; वे सभी चिरजीवी हैं। दैत्योंमें श्रीहरिसे द्वेष करनेवाले दुराचारी हिरण्यकशिपुके पुत्र प्रह्लादको देखो। वे श्रीहरिके ध्यानमें तल्लीन रहते हैं, जिससे चिरजीवी एवं कालजित् हो गये हैं। अनेक जन्मोंकी तपस्याके फलस्वरूप भारतमें जन्म पाकर जो लोग उन श्रीहरिकी सेवा नहीं करते, वे मूर्ख और पापी हैं। जो मनुष्य वासुदेवका परित्याग करके विषयमें लवलीन रहता है, वह महान् मूर्ख है और स्वेच्छानुसार अमृतका त्याग करके विष-पान करता है। इस भूतलपर किसकी स्त्री, किसका पुत्र और किसके भाई-बन्धु हैं ? अर्थात् कोई किसीका नहीं है; क्योंकि विपत्तिकालमें श्रीकृष्णके अतिरिक्त कोई किसीका बन्धु—सहायक नहीं होता*। इसीलिये संतलोग रात-दिन निरन्तर श्रीकृष्णका ही भजन करते हैं; क्योंकि श्रीकृष्ण जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोगके विनाशक, सर्वदुःखहारी परमेश्वर हैं। उन आनन्दको भी आनन्दित करनेवाले परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णका भजन कालपर विजय पानेका उपाय है। इसके बाद श्रीराधाजीने मनुष्य, पितर, देवता, नाग, राक्षस और अन्यान्य लोकों तथा युगों आदिकी कालगroundगतिका वर्णन करके फिर कहा—‘वत्स ! अब तुम श्रीहरिके नगरको जाओ।’ (अध्याय ९५-९६)


* अनेकजन्मतपसा लब्ध्वा जन्म च भारते ॥
ये हरिं तं न सेवन्ते ते मूढाः कृतपापिनः । वासुदेवं परित्यज्य विषये निरतो जनः ॥
त्यक्त्वामृतं महामूढो विषं भुङ्क्ते निजेच्छया । कस्य स्त्री कस्य वा पुत्रः कस्य वा बान्धवस्तथा ॥
कः कस्य बन्धुर्विपदि श्रीकृष्णेन विना भुवि।
(९६। ३९–४२)