भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 737

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७२७

समय तुम जाकर परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्णसे मेरी सारी बात कह सुनाओ और शीघ्र ही मेरे स्वामीको यहाँ ले आओ। भला, जगत्की युवतियोंमें किसको ऐसा दुःख है? श्रीकृष्णके वियोगजन्य दुःखको मेरे अतिरिक्त और कौन जानती है? सीताको भी वियोग-दुःख कुछ-कुछ ज्ञात है। त्रिलोकीमें नारियोंमें मुझसे बढ़कर दुःखिया कोई नहीं है। बेटा उद्धव! किस युवतीको मेरे समान दुःख है? भला, कौन नारी मेरी मानसिक व्यथाको सुनकर विश्वास करेगी? स्त्रियोंमें राधाके समान दुःखिया, विरह-संतप्त और सुख-सौभाग्यसे हीन नारी न हुई है और न आगे होगी। वत्स! जिनके नाम-श्रवणमात्रसे पाँचों प्राण प्रहृष्ट हो जाते हैं तथा जिनके स्मरणमात्रसे वे प्रफुल्ल हो उठते हैं और आत्मा परम स्निग्ध हो जाता है; जिन्होंने मेरा स्पर्श किया, इतने मात्रसे ही जिससे तीनों भुवनोंमें मुझे यशकी प्राप्ति हुई, उन परमेश्वरका किस समृद्धिको पाकर मैं विस्मरण कर सकती हूँ? तात! जो तीनों लोकोंपर विजय पानेवाला रूप और गुण धारण करते हैं; जिन्हें ब्रह्माने नहीं रचा है बल्कि जो स्वयं ही ब्रह्माके रचयिता हैं; जो कल्पवृक्षसे भी बढ़कर सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता, शान्त, लक्ष्मीपति, मनको हरण करनेवाले, सर्वेश्वर, सबके कारणस्वरूप, ऐश्वर्यशाली परमात्मा हैं; उन ब्रह्माके भी विधाता अपने स्वामी श्रीकृष्णको किस समृद्धिके प्रलोभनमें पड़कर मैं भूल सकती हूँ? तात! ब्रह्मा, शिव और शेष आदि जिनके चरणकमलका ध्यान करते रहते हैं; उन प्रभुको मैं किस सुखके लोभसे विस्मृत कर सकती हूँ। पुत्र! जिन्हें स्वप्नमें भी उनके अनुपम मनोहर रूपका दर्शन हो जाता है; वे सब कुछ त्यागकर रात-दिन उन्हींके ध्यानमें मग्न हो जाते हैं। जिनके गुणसे पर्वत पिघलकर पानी-पानी हो जाता है, शुष्क काष्ठ गीला हो जाता है, सूखे वृक्षमें नयी कोंपलें निकल आती हैं, वायुका वेग रुक जाता है तथा सूर्य और सागर स्थगित हो जाते हैं; उन प्रियतमको मैं किस समृद्धिकी प्राप्तिसे भुला सकती हूँ? भक्तवर! जो कालके काल हैं; प्रलयकालीन मेघ, संहारकर्ता शिव और सृष्टिकर्ता ब्रह्माके स्वामी हैं; जो स्वाधीन, स्वतन्त्र और स्वयं ही आत्मा नामवाले हैं; उन प्रभुको मैं कौन-सी सम्पत्ति पाकर भूल सकती हूँ? उन श्रीकृष्णसे वियुक्त होनेपर (उस वियोगजन्य दुःखकी शान्तिके लिये) कोई यथार्थ ज्ञान है ही नहीं; जिसके द्वारा कोई विद्वान् मुझे सान्त्वना दे सके। सावित्री और सरस्वती भी मुझे समझानेमें समर्थ नहीं हैं। वेद और वेदाङ्ग भी मुझे ढाढ़स नहीं बँधा सकते; फिर संतों और देवताओंकी तो बात ही क्या है? सहस्र मुखवाले शेषनाग, वेदोंके उत्पादक ब्रह्मा, योगीन्द्रोंके गुरुके गुरु शम्भु और गणेश भी मुझे प्रबुद्ध नहीं कर सकते; क्योंकि जिसकी स्थिति है उसीकी गतिका विचार किया जा सकता है। जिसका कोई मार्ग ही नहीं है, उसकी गति कहाँ? सुख-दुःख, शुभ-अशुभ सभी कालद्वारा साध्य है, यहाँतक कि जगत्में सभी पदार्थ कालके वशीभूत हैं और वह काल दुर्निवार है। वत्स! यदि तुम ब्रजवासका परित्याग करके जानेके लिये उत्सुक ही हो तो उठो और सुखपूर्वक उस रमणीय मथुरापुरीको जाओ; क्योंकि चिरकालतक श्रीकृष्णसे विलग रहना दुःखका ही कारण होता है; उससे सुख नहीं मिलता। वहाँ जाकर तुम उनके जन्म, मृत्यु और बुढ़ापेका विनाश करनेवाले चन्द्रमुखके दर्शन करो। राधिकाके ऐसे वचन सुनकर तथा बन्धु-वियोगसे कातर हुई राधिकाको रोती देखकर उद्धव फूट-फूटकर रोने लगे।

तदनन्तर माधवीकी प्रेरणासे उद्धवके पूछनेपर श्रीराधाने उनको उपदेश दिया—'वत्स! जो लोकोंके स्वामी, कालके काल, जगद्गुरु, निर्गुण, इच्छारहित और ईश्वर हैं; उन परमात्माका पण्डितलोग भजन करते हैं। बेटा! सूर्य सभी प्राणियोंकी