भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 736, कुल 810 में से

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पृष्ठ 736
७२६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

पुण्य और मङ्गलोंका दाता है—गोपियोंके चरणकमलोंकी रजसे पावन और परम निर्मल होकर और भी धन्यवादका पात्र हो गया है। इस भारतवर्षमें नारियोंके मध्य गोपिकाएँ सबसे बढ़कर धन्या और मान्या हैं; क्योंकि वे उत्तम पुण्य प्रदान करनेवाले श्रीराधाके चरणकमलोंका नित्य दर्शन करती रहती हैं¹। इन्हीं राधिकाके चरणकमलोंकी रजको प्राप्त करनेके लिये ब्रह्माने साठ हजार वर्षोंतक तप किया था। ये पराशक्ति राधा गोलोकमें निवास करनेवाली और श्रीकृष्णकी प्राणप्रिया हैं। जो-जो श्रीकृष्णके भक्त हैं, वे राधाके भी भक्त हैं। ब्रह्मा आदि देवता गोपियोंकी सोलहवीं कलाकी भी समानता नहीं कर सकते। श्रीकृष्णकी भक्तिका मर्म पूर्णरूपसे तो योगिराज महेश्वर, राधा तथा गोलोकवासी गोप और गोपियाँ ही जानती हैं। ब्रह्मा और सनत्कुमारको कुछ-कुछ ज्ञात है। सिद्ध और भक्त भी स्वल्प ही जानते हैं। इस गोकुलमें आनेसे मैं धन्य हो गया। यहाँ गुरुस्वरूपा गोपिकाओंसे मुझे अचल हरिभक्ति प्राप्त हुई, जिससे मैं कृतार्थ हो गया। अब मैं मथुरा नहीं जाऊँगा और प्रत्येक जन्ममें यहीं गोपियोंका किंकर होकर तीर्थश्रवा श्रीकृष्णका कीर्तन सुनता रहूँगा; क्योंकि गोपियोंसे बढ़कर परमात्मा श्रीहरिका कोई अन्य भक्त नहीं है। गोपियोंने जैसी भक्ति प्राप्त की है, वैसी भक्ति दूसरोंको नहीं नसीब हुई²।

तदनन्तर कलावती और तुलसीके द्वारा श्रीकृष्णकी महिमा कही जानेके बाद कालिकाने कहा—बुद्धिमान् उद्धव! बाल, युवा और वृद्ध—तीनों प्रकारके मनुष्य तथा जो देवता आदि और सिद्धगण हैं; वे सभी उन परमेश्वर श्रीकृष्णको जानते हैं। इस समय इन मूर्च्छित हुई राधाको जगाना ही युक्त है; अतः इसके लिये जो प्रधान युक्ति हो उसके द्वारा इन्हें चैतन्य करो।

तब उद्धव बोले—कल्याणि! चेत करो। जगन्मातः! मेरी ओर ध्यान दो। मैं कृष्णभक्तके किंकरका भी किंकर उद्धव हूँ। माँ! मुझपर कृपा करो। मैं पुनः मथुरा जाऊँगा; क्योंकि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ; बल्कि कठपुतलीकी भाँति पराधीन हूँ तथा जैसे बैल सदा हलवाहेके वशमें रहता है; उसी तरह मैं श्रीकृष्णके अधीन हूँ।

(अध्याय ९४)


उद्धवका कथन सुनकर राधाका चैतन्य होना और अपना दुःख सुनाते हुए उद्धवको उपदेश देकर मथुरा जानेकी आज्ञा देना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! उद्धवके वचन सुनकर राधिकाकी चेतना लौट आयी। वे उठकर उत्तम रत्नसिंहासनपर जा विराजीं। उस समय सात गोपियाँ भक्तिपूर्वक श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रही थीं। तब देवी राधिका दुःखित हृदयसे उद्धवसे मधुर वचन बोलीं।

श्रीराधिकाने कहा—वत्स! तुम मथुरा जाओ, परंतु वहाँ सुखमें पड़कर मुझे भूल मत जाना। (यदि भूल जाओगे तो) इस भवसागरमें तुम्हारे लिये इससे बढ़कर दूसरा अधर्म नहीं है। इस


१-धन्यं भारतवर्षं च पुण्यदं शुभदं वरम्। गोपीपादाब्जरजसा पूतं परमनिर्मलम्॥
ततोऽपि गोपिका धन्या मान्या योषित्सु भारते। नित्यं पश्यन्ति राधायाः पादपद्मं सुपुण्यदम्॥
(९४। ७७-७८)
२-न गोपीभ्यः परो भक्तो हरेश्च परमात्मनः। यादृशीं लेभिरे गोप्यो भक्तिं नान्ये च तादृशीम्॥
(९४। ८६)

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