ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 735, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७२५
शोक छोड़ दो और यत्नपूर्वक अपनी रक्षा करो; क्योंकि अपने आत्मासे बढ़कर प्रिय दूसरा कुछ भी नहीं है।
इसपर पद्मावतीने, फिर चन्द्रमुखीने श्रीराधाके कृष्णप्रेमकी प्रशंसा करते हुए कहा—देखो, मेरी सखीने आहारका त्याग कर दिया है; अतः केवल साँस चलनेसे ये जीवित प्रतीत होती हैं। इसलिये अब तुम अपने मुखसे श्रीकृष्णकी प्रशंसा करो; क्योंकि श्रीकृष्णके नाम-स्मरणसे, उनकी गुणगाथाके श्रवणसे और उनके शुभ समाचारके सुननेसे इनमें सहसा चेतना लौट आती है।
तदनन्तर शशिकलाने कहा—माधवि ! ब्रह्मा आदि देवता तथा चारों वेद जिनके ध्यानमें मग्न रहते हैं, जिनके देवताओंद्वारा अभीप्सित चरणकमलका संतलोग सदा ध्यान करते हैं; पद्मा, सरस्वती, दुर्गा, अनन्त, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र, मनुगण और महेश्वर भी जिन्हें नहीं जान पाते; उन परमात्मा श्रीकृष्णको तुम क्या जानती हो? जो सर्वात्मा हैं, उनका कैसा रूप ? और जो निर्गुण हैं, उनके कैसे गुण ? सत्यस्वरूप भगवान्के जिस सत्य स्वरूपका वर्णन किया गया है, जो सुखदायक, आह्लादजनक, रमणीय, भक्तानुग्रह-मूर्ति, लीलाधाम और मङ्गलोंका आश्रयस्थान है, जिसकी लावण्यता करोड़ों कामदेवोंसे बढ़कर है, जिस जनमनोहर रूपसे बढ़कर अनिर्वचनीय कोई भी रूप नहीं है; उसी मनोहर रूपको श्रीकृष्ण पृथ्वीका भार उतारनेके समय धारण करते हैं। मन्दाकिनीका मीठा जल जिनके मधुर पादपद्मोंका धोवन है, जिसे परात्पर सर्वेश्वर शंकर भक्तिपूर्वक अपने सिरपर धारण करते हैं, विरक्त होकर सदा उन तीर्थकीर्ति श्रीकृष्णका कीर्तन करते रहते हैं तथा आहार, भूषण और वस्त्रका परित्याग करके दिगम्बर हो भक्तिके आवेशमें क्षणभरमें नाचने लगते हैं और क्षणभरमें गाने लगते हैं। ब्रह्मा,
शेष, सनत्कुमार और योगवेत्ता सिद्धोंके समुदाय उनके परम निर्मल शुभ्र ब्रह्मज्योतिःस्वरूपका ध्यान करके तपस्या एवं सेवाद्वारा जीवन-यापन करते हैं; उन श्रीकृष्णकी महिमा कौन जान सकता है?
फिर सुशीलाने श्रीकृष्णकी प्रशंसा करते हुए कहा—सखि ! ब्रह्मा, जो वेदोंके उत्पादक एवं ईश्वर हैं; जिन श्रीकृष्णकी स्तोत्रद्वारा स्तुति करते हैं, यह माधवी उन्हीं सत्य नित्य परमेश्वरकी निन्दा कर रही है; अतः यह सभा अपावन हो गयी और गोपियोंका जीवन तो व्यर्थ ही हो गया। इन गोपियोंमें केवल राधा ही पुण्यवती हैं; क्योंकि ये रात-दिन उन श्रीकृष्णका ध्यान करती रहती हैं; जिनके नामस्मरणमात्रसे करोड़ों जन्मोंमें एकत्र किये हुए पापका भय और शोक पूर्णतया नष्ट हो जाता है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है।
तदनन्तर रत्नमाला और पारिजाता श्रीकृष्णकी महिमा बखानती हुई बोलीं—प्रिये ! ब्रह्माने जिस विश्वब्रह्माण्डकी रचना की है, वह महाविष्णुके रोमकूपमें अणुके सदृश स्थित है; क्योंकि उन विष्णुके शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने ही विश्व उनमें वर्तमान हैं और वे महाविष्णु इन परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंश हैं। तब भला, श्रीकृष्णके यश, शौर्य और अनुपम महिमाका क्या बखान किया जा सकता है? अथवा यह गोपकन्या माधवी उसे क्या जान सकती है?
इसपर माधवीने अपने कथनका तात्पर्य समझाया। उनके उस वचनको सुनकर उद्धवके सारे शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे भक्तिविह्वल हो रुदन करते हुए मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। तत्पश्चात् परमेश्वर श्रीकृष्णका ध्यान करके वे अपनेको तुच्छ मानने लगे और भक्तिपूर्वक उस गोपीसे बोले।
उद्धवने कहा—सातों द्वीपोंमें मनोहर जम्बूद्वीप धन्य एवं प्रशंसनीय है। उसमें श्रेष्ठ भारतवर्ष—जो