ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 734, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७२४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
न निर्जन स्थानमें समागम ही होगा। उद्धव ! अब मैं उनके साथ वृन्दावनमें नहीं जाऊँगी, नन्दनन्दनके वक्षःस्थलपर चन्दन नहीं लगाऊँगी, न उन्हें माला पहनाऊँगी, न उनके मुखकमलकी ओर निहारूँगी। न पुनः मालती, केतकी और चम्पकके काननोंमें तथा सुन्दर रासमण्डलमें ही जाऊँगी, न हरिके साथ रमणीय चन्दनकाननमें विचरूँगी। न पुनः मलयकी सुगन्धसे युक्त रत्नमन्दिरमें ही जाऊँगी और न हरिके साथ पुनः-पुनः रमणीय माधवीवन, रहस्यमय मधुकानन, मनोहर श्रीखण्डकानन, स्वच्छ चन्द्र-सरोवर, विस्पन्दक, देववन, नन्दनवन, पुष्पभद्रक और भद्रकवनको ही जाऊँगी। वसन्त-ऋतुमें खिली हुई वह सुन्दर माधवी लता कहाँ है? वह वसन्तकी रात्रि कहाँ चली गयी? वसन्त-ऋतु कहाँ चला गया? और हाय! वे माधव— श्रीकृष्ण भी कहाँ चले गये? इतना कहकर राधाजी श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करने लगीं। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे रोती हुई पुनः मूर्च्छित हो गयीं।
(अध्याय ९३)
सखियोंद्वारा श्रीकृष्णकी निन्दा एवं प्रशंसा और उद्धवका मूर्च्छित हुई राधाको सान्त्वना प्रदान करना
श्रीनारायण कहते हैं— मुने! राधिकाको मूर्च्छित देखकर उद्धवको महान् विस्मय और भय प्राप्त हुआ। वे राधाकी सच्ची भक्ति और अपनेको कहनेमात्रका भक्त जानकर तथा भाग्यवती सती राधाकी ओर देखकर सारे जगत्को तुच्छ समझने लगे। तदनन्तर मृतक-तुल्य पड़ी हुई राधाको होशमें लाते हुए उनसे बोले।
उद्धवने कहा— कल्याणि! होशमें आ जाओ। जगन्मातः! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं पूर्वजन्मकृत समस्त कर्म हो। अब तुम्हें श्रीकृष्णके दर्शन प्राप्त होंगे। तुम्हारे दर्शनसे विश्व पवित्र हो गया और तुम्हारी चरणरजसे पृथ्वी पावन हो गयी। तुम्हारा मुख परम पवित्र है और (तुम्हारे स्पर्शसे) गोपिकाएँ पुण्यवती हो गयीं। लोग गीत तथा मङ्गल-स्तोत्रोंद्वारा तुम्हारा ही गान करते हैं। वेद तथा सनकादि महर्षि तुम्हारी उत्तम कीर्तिका— जो किये हुए पापोंको नष्ट करनेवाली, पुण्यमयी, तीर्थपूजास्वरूपा, निर्मल, हरिभक्तिप्रदायिनी, कल्याणकारिणी और सम्पूर्ण विघ्नोंका विनाश करनेवाली है— सदा बखान करते हैं। तुम्हीं राधा हो; तुम्हीं श्रीकृष्ण हो। तुम्हीं पुरुष हो; तुम्हीं परा प्रकृति हो। पुराणों तथा श्रुतियोंमें कहीं भी राधा और माधवमें भिन्नता नहीं पायी जाती। तदनन्तर राधिकाको मूर्च्छित देखकर उन उद्धवको पीछे करके और स्वयं राधाके आगे खड़ी हो माधवी गोपी बोली।
माधवीने कहा— कल्याणि! श्रीकृष्ण तो चोर हैं, उनका कौन-सा उत्तम रूप और वेष है? उनके सुख और वैभव ही क्या हैं? कोई अनुपम गौरव भी तो नहीं है? उनका कौन-सा पराक्रम, ऐश्वर्य अथवा दुर्लङ्घ्य शौर्य है? उनमें कौन-सी सिद्धता एवं प्रसिद्धि है? तुम्हारे-सदृश उनमें कौन-सा उत्तम गुण है? वे यहाँ कहींसे आ गये और पुनः कहीं चले गये। वे गोपवेषधारी बालक ही तो हैं न? कोई राजपुत्र अथवा विशिष्ट पुरुष थोड़े ही हैं। फिर तुम व्यर्थ उन नन्दनन्दन गोपालकी चिन्तामें क्यों पड़ी हो? अरे! यत्नपूर्वक तुम अपने आत्माकी रक्षा करो; क्योंकि आत्मासे बढ़कर प्रिय दूसरा कुछ नहीं है।
तदनन्तर मालतीने श्रीकृष्णकी निन्दा करते हुए अन्तमें राधासे कहा— मूढ़े! तुम व्यर्थ किसकी चिन्तामें पड़ी हो? यह अत्यन्त दारुण