ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड
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उद्धवको वर-प्रसाद प्रदान करके राधिकाजीने उठकर अग्नि-शुद्ध साड़ी और कञ्चुकी धारण की तथा अमूल्य रत्नोंके आभूषण, हीरोंके हार, मनोहर रत्नमाला, सिन्दूर, कज्जल, पुष्पमाला और सुस्निग्ध चन्दनसे शरीरका शृङ्गार किया। उस समय उनके शरीरका रंग तपाये हुए सुवर्णके समान चमकीला था और कान्ति सैकड़ों चन्द्रमाओंके सदृश उद्दीप्त थी। असंख्य गोपियाँ उन्हें घेरे हुए थीं। तत्पश्चात् वे हर्षपूर्वक रत्नसिंहासनपर विराजमान हर्षमग्न उद्धवकी पूजा करके बोलीं।
श्रीराधिकाने पूछा—उद्धव! कपटरहित हो सच-सच बतलाओ, क्या सचमुच श्रीहरि आयेंगे? तुम भय छोड़कर ठीक-ठीक कहना और इस उत्तम सभामें सत्य ही बोलना। सौ कुएँसे एक बावली श्रेष्ठ है, सौ बावलियोंसे एक यज्ञ श्रेष्ठ है, सौ यज्ञोंसे एक पुत्र श्रेष्ठ है और सौ पुत्रोंसे बढ़कर सत्य है। सत्यसे बढ़कर दूसरा धर्म नहीं है और झूठसे बढ़कर दूसरा पाप नहीं है*।
उद्धवने कहा—सुन्दरि! सचमुच ही श्रीहरि आयेंगे और तुम उनका दर्शन करोगी—यह भी सत्य है। उस समय श्रीहरिके चन्द्रमुखका अवलोकन करके निश्चय ही तुम्हारा संताप दूर हो जायगा। महाभागे! तुम्हारा विरह-ताप तो मेरे दर्शनसे ही नष्ट हो गया; अब तुम इस दुस्तर चिन्ताको छोड़ो और नाना प्रकारके भोगजनित सुखका उपभोग करो। मैं मथुरा जाकर श्रीहरिको समझा-बुझाकर यहाँ भेजूँगा। वे अन्य सभी कार्य पूर्ण करेंगे। मातः! अब मुझे बिदा दो। मैं श्रीहरिके संनिकट जाऊँगा और यह सारा वृत्तान्त यथोचितरूपसे उन्हें सुनाऊँगा।
तब श्रीराधिकाजी बोलीं—वत्स! जब तुम परम मनोहर मथुरापुरीको जा रहे हो; तो कुछ समय और ठहरो और स्थिरतापूर्वक मेरे पास बैठो। जरा, मेरी कुछ दुःख-कहानी तो सुनते जाओ। बेटा! विरह-तापसे कातर हुई मुझको तुम भूल न जाना। तुम निश्चय ही मेरे प्रियतमको भेजोगे, इसीसे मैं तुमसे कुछ कह रही हूँ; अन्यथा स्त्रियोंके मनकी बात भला, कौन विद्वान् जानता है? विद्वान् तो शास्त्रानुसार कुछ-कुछ ही निरूपण कर सकता है। जब वेद उसका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं तब शास्त्र बेचारे क्या कह सकते हैं? परंतु पुत्र! तुम जाकर श्रीकृष्णसे मेरी बात कहोगे; मैं तुम्हें सब कुछ बतला रही हूँ। उद्धव! मुझे घर और वनमें कोई भेद नहीं प्रतीत होता। मेरे लिये जैसे पशु आदि हैं, वैसे ही मनुष्य भी हैं। क्या जल है और क्या स्थल है, मैं यह भी नहीं समझ पाती। मुझे रात-दिनका ज्ञान नहीं रहता और न मैं अपने-आपको तथा सूर्य-चन्द्रमाके उदयको ही जान पाती हूँ। इस समय श्रीहरिका समाचार पाकर क्षणभरके लिये मुझे चेतनता आ गयी है। अब मैं श्रीकृष्णके स्वरूपका दर्शन कर रही हूँ, मुरलीकी ध्वनि सुन रही हूँ तथा कुल, लज्जा और भयका त्याग करके श्रीहरिके चरणका ध्यान कर रही हूँ। जो समस्त लोकोंके ईश्वर तथा प्रकृतिसे परे हैं, उन श्रीहरिको पाकर भी मायाके वशीभूत होनेके कारण उनको गोपपति समझकर मैं उन्हें यथार्थरूपसे जान न सकी। वेद और ब्रह्मा आदि देवता जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते रहते हैं; उन्हींकी मैंने क्रोधमें भरकर भर्त्सना कर दी थी—यह मेरा बर्ताव मेरे हृदयमें काँटेकी तरह चुभ रहा है। उद्धव! उनके चरणकमलोंकी सेवाओंमें, गुण-कीर्तनमें, उनकी भक्तिमें, ध्यान अथवा पूजामें जो क्षण व्यतीत होता है; उसीमें सारा मङ्गल, आनन्द और जीवन स्थित है। उसके विच्छेद हो जानेपर सदा हृदयमें संताप और विघ्न होता है। अब मेरी पुनः उस प्रकारकी अभीष्ट क्रीड़ा-प्रीति नहीं होगी, न वैसा प्रेम-सौभाग्य होगा और
* न हि सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम्॥ (९३।७५)