भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 732

७२२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

लगातार श्रीराधापर श्वेत चँवर डुला रही थीं और असंख्य गोपियाँ विविध भाँतिसे उनकी सेवामें व्यस्त थीं। उनको इस अवस्थामें पहुँची हुई देखकर उद्धव डरे हुएकी भाँति पुनः विनयपूर्वक कानोंको अमृतके समान लगनेवाले परम प्रिय वचन बोले।

उद्धवने कहा— देवि! मैं समझ गया। तुम देवाङ्गनाओंकी अधीश्वरी, परम कोमल, सिद्धयोगिनी, सर्वशक्तिस्वरूपा, मूलप्रकृति, ईश्वरी और गोलोककी सुन्दरी हो; श्रीदामके शापसे तुम भूतलपर अवतीर्ण हुई हो। देवि! तुम श्रीकृष्णकी प्राणप्रिया तथा उनके वक्षःस्थलपर निवास करनेवाली हो। देवि! मैं हृदयको स्निग्ध करनेवाली अभीष्ट शुभवार्ताका वर्णन करता हूँ; तुम उसे सखियोंके साथ सुस्थिर चित्तसे श्रवण करो। वह वार्ता दुःखरूपी दावाग्निमें झुलसी हुईके लिये अमृतकी वर्षाके समान तथा विरहव्याधि-ग्रस्ताके लिये उत्तम रसायनके सदृश है। नन्दजी सदा प्रसन्न हैं। उन्हें वसुदेवने निमन्त्रित कर रखा है; अतः वे वहाँ आनन्दपूर्वक श्रीकृष्णके उपनयन-संस्कारतक ठहरेंगे। उस मङ्गल-कार्यके साङ्गोपाङ्ग सम्पन्न हो जानेपर परमानन्द-स्वरूप नन्दजी बलराम और श्रीकृष्णको साथ लेकर हर्षपूर्वक गोकुलको लौटेंगे। उस समय श्रीकृष्ण आकर प्रसन्नताके साथ पुनः माताको प्रणाम करेंगे और रातमें हर्षपूर्वक इस पुण्यमय वृन्दावनमें पधारेंगे। सती राधिके! तुम शीघ्र ही श्रीकृष्णके मुखकमलका दर्शन करोगी। उस समय तुम्हारा सारा विरह-दुःख दूर हो जायगा। अतः मातः! तुम अपने चित्तको स्थिर करो और इस अत्यन्त दारुण शोकको त्याग दो। पुनः प्रसन्नतापूर्वक अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए रमणीय वस्त्र पहनकर अमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषणोंको धारण कर लो। कस्तूरी और कुंकुमसे युक्त चिकने चन्दनको शरीरपर लगा लो और मालतीकी मालाओंसे विभूषित करके केशोंका श्रृङ्गार करो। कल्याणि! इस प्रकार सुन्दर वेष बनाकर कपोलोंपर पत्र-भंगी (सौन्दर्यवर्धक विचित्र पत्रावली) कर लो। माँगमें कस्तूरी-चन्दनयुक्त सिन्दूर भर लो और बेंदी लगा लो। पैरोंमें मेंहदी लगाकर उसे महावरसे रँग लो। सति! शोकके साथ-साथ इस कीचड़युक्त कमल-पुष्पोंकी शय्याको त्याग दो और उठो। इस उत्तम रत्नसिंहासनपर बैठो। मन-ही-मन श्रीकृष्णके साथ विशुद्ध एवं मधुर मधुमय पदार्थ खाओ, संस्कारयुक्त स्वच्छ जल पीओ और सुवासित पानका बीड़ा चबाओ। देवेशि! तत्पश्चात् जिसपर अग्नि-शुद्ध वस्त्र बिछा है; जो मालतीकी मालाओंसे सुशोभित, कस्तूरी, जाती, चम्पा और चन्दनकी सुगन्धसे सुवासित, चारों ओरसे मालतीकी मालाओं और हीरोंके हारोंसे विभूषित एवं सुन्दर-सुन्दर मणियों, मोतियों और माणिक्योंसे परिष्कृत है; जिसके उपधान (तकिया)-में पुष्पोंकी मालाएँ लटक रही हैं और जो सब तरहसे मङ्गलके योग्य है; उस अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित परम मनोहर पलंगपर सदा गोपियोंद्वारा सेवित होती हुई हर्षपूर्वक शयन करो। मनोहरे! तुम्हारी प्रिय सखी एवं भक्त गोपी निरन्तर तुमपर श्वेत चँवर डुलाती रहती है और तुम्हारे चरणकमलोंकी सेवा करती है।

मुने! इतना कहकर तथा ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा वन्दित उनके चरणकमलोंको प्रणाम करके उद्धव चुप हो गये। उद्धवके मधुर वचनोंको सुनते ही सती राधिकाके मुखपर मुस्कराहट छा गयी और उन्होंने उद्धवको अमूल्य दिव्य वस्त्राभूषण, रत्न, हार, भोजन, जल, ताम्बूल आदि देकर आशीर्वाद दिया। फिर, श्रीकृष्णवर्णित ज्ञानका उपदेश किया तथा लक्ष्मी, विद्या, कीर्ति, सिद्धिके साथ ही श्रीहरिके दास्य, श्रीहरिके चरणोंमें निश्चला भक्ति और श्रेष्ठतम पार्षद-पदकी प्राप्तिका वरदान दिया। इस प्रकार