भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 752
७४२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

होते हैं। सारी फलवती लताएँ निश्चय ही सर्वत्र शुभदायिनी होती हैं। शिल्पिन्! इस प्रकार प्रशस्त वृक्षोंका वर्णन कर दिया गया; अब निषिद्धका वर्णन सुनो।

नगर अथवा शिविरमें वन्यवृक्षका रहना निषिद्ध है। शिविरमें वटवृक्षका रहना ठीक नहीं है; क्योंकि उससे सदा चोरका भय लगा रहता है, किंतु नगरोंमें उसका रहना उत्तम है; क्योंकि उसके दर्शनसे पुण्य होता है। नगर, गाँव और शिविरमें सेमलके वृक्षका रहना सर्वथा निषिद्ध है। वह सदा राजाओंको दुःख देता रहता है। हे देवशिल्पी! इमलीका वृक्ष नगरों और गाँवोंमें तो प्रशस्त है; परंतु शिविरमें उसका रहना ठीक नहीं है। वह विद्या-बुद्धिका विनाशक तथा सदा दुःखदायक होता है। उससे निश्चय ही प्रजा और धनकी हानि होती है; अतः विद्वान्‌को उचित है कि यत्नपूर्वक उसका परित्याग कर दे। खजूर और काँटेदार वृक्ष भी शिविरमें नहीं रहने चाहिये; क्योंकि वे विद्या और बुद्धिको नष्ट कर देनेवाले होते हैं; अतः उनसे दूर रहना ही ठीक है। गाँवों और नगरोंमें चना आदि अन्नोंके पेड़ मङ्गलप्रद होते हैं। गाँव, नगर तथा शिविरमें गन्नेका वृक्ष सदा शुभदायक होता है। अशोक, सिरिस और कदम्ब शुभप्रद होते हैं। हल्दी, अदरक, हरीतकी और आमलकी—ये गाँवों तथा नगरोंमें सदा शुभदायिनी तथा कल्याणकारिणी होती हैं।

वास्तुभूमिमें स्थापन करनेवालोंके लिये गजकी अस्थि शुभदायिनी और उच्चैःश्रवाके वंशज घोड़ोंकी हड्डी कल्याणकारिणी होती है। इनके अतिरिक्त अन्य पशुओंकी अस्थि शुभकारक नहीं होती; वह विनाशका कारण होती है। वानरों, मनुष्यों, गदहों, गौओं, कुत्तों, सियारों और बिलावोंकी हड्डी अमङ्गलकारिणी होती है। शिविरके पूर्व, पश्चिम, उत्तर और ईशानकोणमें जलका रहना उत्तम है। इनके अतिरिक्त अन्य दिशाओंमें अशुभ होता है। शिल्पिन्! बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि जिसकी लंबाई-चौड़ाई समान हो, ऐसा घर न बनावें; क्योंकि चौकोर गृहमें वास करना गृहस्थोंके धनका नाशक होता है। घरकी परिमित लंबाई-चौड़ाईमें पृथक्-पृथक् दोका भाग देनेसे यदि शेष शून्यरहित हो तो शुभ अन्यथा शून्य शेष आनेपर वह घर मनुष्योंके लिये शून्यप्रद होता है। गृहोंकी चौड़ाईमें पश्चिमसे दो हाथ पूर्व और लंबाईमें दक्षिणसे तीन हाथ हटकर घरका तथा परकोटेका द्वार रखना शुभदायक होता है। मध्यभागमें दरवाजा नहीं बनाना चाहिये; क्योंकि वह कुछ कम-बेशमें ही रखनेपर शुभकारक होता है। चौकोर घर चन्द्रवेध होनेपर मङ्गलप्रद होता है; परंतु मङ्गलप्रद गृह भी सूर्यवेध होनेपर अमङ्गलकारक हो जाता है। उसी प्रकार सूर्यवेध आँगन भी अमङ्गलदायक होता है। घरके भीतर लगायी हुई तुलसी मनुष्योंके लिये कल्याणकारिणी, धन-पुत्र प्रदान करनेवाली, पुण्यदायिनी तथा हरिभक्ति देनेवाली होती है। प्रातःकाल तुलसीका दर्शन करनेसे सुवर्ण-दानका फल प्राप्त होता है। मकानके पूर्व और दक्षिणभागमें मालती, जूही, कुन्द, माधवी, केतकी, नागेश्वर, मल्लिका (मोतिया), काञ्चन (श्याम धतूर), मौलसिरी और शुभदायिनी अपराजिता (विष्णुक्रान्ता)—इन पुष्पोंका उद्यान शुभद होता है; इसमें तनिक भी संशय नहीं है। गृहस्थको सोलह हाथसे ऊँचा गृह नहीं बनवाना चाहिये। इसी तरह बीस हाथसे ऊँचा परकोटा भी शुभप्रद नहीं होता। बुद्धिमान् पुरुषको घरके समीप तथा गाँवके बीचमें बढ़ई, तेली और सोनारको नहीं बसाना चाहिये; किंतु मकानके पास-पड़ोसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सत्‌शूद्र, ज्योतिषी, भाट, वैद्य और पुष्पकार (माली)-को अवश्य रहने देना चाहिये। शिविरके चारों ओर

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