ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७४३
सौ हाथ लंबी और दस हाथ गहरी खाई प्रशस्त मानी जाती है। उस खाईका दरवाजा भी ऐसा संकेतयुक्त होना चाहिये, जो शत्रुके लिये अगम्य हो; परंतु मित्र सुखपूर्वक आ-जा सकें। भवन-निर्माणमें सेमल, इमली, हिंताल (एक प्रकारका जंगली खजूर), नीम, सिन्धुवार (निर्गुण्डी), गूलर, धतूरा, बरगद और रेंड—इनके अतिरिक्त अन्य वृक्षोंकी ही लकड़ी काममें लानी चाहिये। वस्तुतस्तु बुद्धिमान्को लकड़ी, वज्रहस्त तथा शिला आदिका उपयोग न करना ही उचित है; क्योंकि ये स्त्री, पुत्र और धनके नाशक होते हैं—ऐसा कमलजन्मा ब्रह्माका कथन है। वत्स! यह सब मैंने लोक-शिक्षाके लिये कहा है। अब तुम सुखपूर्वक जाओ और बिना काष्ठके ही पुरीका निर्माण करो; क्योंकि उसके लिये यही शुभ मुहूर्त है।
तब विश्वकर्मा गरुड़के साथ श्रीहरिको नमस्कार करके वहाँसे चल दिये और समुद्र-तटपर मनोहर वटवृक्षके नीचे आकर उन्होंने गरुड़के साथ वहाँ रात्रिमें शयन किया। मुने! स्वप्नमें गरुड़को वह रमणीय द्वारकापुरी दिखायी पड़ी। परमात्मा श्रीकृष्णने विश्वकर्मासे जो कुछ कहा था, वे सारे-के-सारे लक्षण उन्हें उस नगरमें दृष्टिगोचर हुए। स्वप्नमें वे सभी कारीगर विश्वकर्माकी और दूसरे बलवान् गरुड़ पक्षी गरुड़की हँसी उड़ा रहे थे। जागनेपर उस पुरीको देखकर गरुड़ और विश्वकर्मा लज्जित हो गये। वह द्वारकापुरी अत्यन्त रमणीय थी और सौ योजनमें उसका विस्तार था। वह ब्रह्मा आदि देवताओंकी पुरियोंको पराभूत करके सुशोभित हो रही थी; उसमें रत्नोंकी कारीगरी की गयी थी, जिसके कारण उसके तेजसे सूर्य ढक गये थे।
श्रीनारायणजी कहते हैं—नारद! इसी समय ब्रह्मा, हर, पार्वती, अनन्त, धर्म, सूर्य, अग्नि, कुबेर, वरुण, वायु, यम, महेन्द्र, चन्द्र, रुद्र, आदित्य, वसु, दैत्य, गन्धर्व, किंनर आदि सब द्वारकापुरी देखने आये। आकाश दर्शनार्थियोंके विमानोंसे छा गया। सबने मनोहर रत्नमयी शोभायुक्त दिव्य द्वारकाको देखा। वहाँ भगवान्के स्मरण करते ही वसुदेव, देवकी, उग्रसेन, पाण्डवगण, नन्द, यशोदा, गोप-गोपी, विभिन्न देशोंके राजा, संन्यासी, यति, अवधूत और ब्रह्मचारी आ गये। पञ्चवर्षीय दिगम्बर चारों सनकादि मुनि, दुर्वासा, कश्यप, वाल्मीकि, गौतम, बृहस्पति, शुक्र, भरद्वाज, अङ्गिरा, प्रचेता, पुलस्त्य, अगस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, मरीचि, शतानन्द, ऋष्यशृंग, विभाण्डक, पाणिनि, कात्यायन, याज्ञवल्क्य, शुक, पराशर, च्यवन, गर्ग, सौभरि, गालव, लोमश, मार्कण्डेय, वामदेव, जैगीषव्य, सांदीपनि, वोढु, पञ्चशिख, मैं (नारायण), नर, विश्वामित्र, जरत्कारु, आस्तीक, परशुराम, वात्स्य, संवर्त, उतथ्य, जैमिनि, पैल, सुमन्त, व्यास, कपिल, शृंगी, उपमन्यु, गौरमुख, कच, द्रोण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य आदि अपने असंख्य शिष्योंसहित पधारे; तथा भीष्म, कर्ण, शकुनि, भ्राताओंसहित दुर्योधन आदि सब आये। उग्रसेन आदिने उन सबका स्वागत-सत्कार किया।
देवताओं और मुनियोंका स्वागत-सत्कार करनेपर उन लोगोंने उग्रसेन आदिको विविध उपहार दिये। तदनन्तर ब्राह्मणोंको मणि, रत्न और वस्त्र आदि दान किये गये। उग्रसेनका राज्याभिषेक हुआ और सब लोग परमानन्दित होकर अपने-अपने घर लौटे। (अध्याय १०३-१०४)