ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७४८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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श्याम थी, वे पीताम्बरसे सुशोभित थे, उनके सर्वाङ्गमें चन्दनका अनुलेप किया गया था, वे वनमालासे विभूषित तथा रत्नोंके बाजूबंद, कङ्कण और हिलते हुए हारसे प्रकाशित हो रहे थे, उनके कपोल रत्ननिर्मित दोनों कुण्डलोंसे उद्भासित हो रहे थे, कटिभागमें अमूल्य रत्नोंके सारभागसे बनी हुई करधनीकी मधुर झंकार हो रही थी, जिससे उनकी शोभा और बढ़ गयी थी, उनके एक हाथमें मुरली सुशोभित थी, वे मुस्कराते हुए रत्नजटित दर्पणकी ओर देख रहे थे, सात गोप-पार्षद श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रहे थे, उनका शरीर नवयौवनके उमंगसे सम्पन्न था, नेत्र शरत्कालीन कमलके-से सुन्दर थे, मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी निन्दा कर रहा था, वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर हो रहे थे और उनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंका मान हर रहा था। वे सत्य, नित्य, सनातन, तीर्थोंको पावन करनेवाले, पवित्रकीर्ति तथा ब्रह्मा, शिव और शेषनागद्वारा वन्दित हैं। उनका रूप परम आह्लादजनक था तथा उनकी प्रभा करोड़ों चन्द्रमाओंके सदृश थी। वे ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, परमोत्कृष्ट तथा प्रकृतिसे परे हैं। वे दूर्वासहित रेशमी सूत्र, अमूल्य रत्नजटित दर्पण और कंघी करके ठीक की हुई कदलीकी खिली हुई मञ्जरी धारण किये हुए थे। उनकी शिखा मालतीकी मालाओंसे विभूषित त्रिविक्रमके-से आकारवाली थी। उनका मस्तक नारियोंद्वारा दिये गये पुष्पमय मुकुटसे उद्दीप्त हो रहा था। ऐसे ऐश्वर्यशाली वरको देखकर युवतियाँ प्रेमवश मूर्च्छित हो गयीं और कहने लगीं कि ‘रुक्मिणीका जीवन धन्य एवं परम श्लाघनीय है।' जब महारानी भीष्मक-पत्नीकी दृष्टि अपने जामातापर पड़ी तब वे परम प्रसन्न हुईं। उनके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। वे निर्निमेष दृष्टिसे उनकी ओर निहारने लगीं। राजा भीष्मक भी अपने पुरोहित तथा मन्त्रियोंसहित परम हर्षित हुए। उन्होंने वहाँ आकर देवताओं, ब्राह्मणों तथा समस्त प्राणियोंको प्रणाम किया और उन सबको अमृतोपम भक्ष्यसामग्रियोंसे परिपूर्ण यथायोग्य वासस्थान दिया। वहाँ रात-दिन 'दीयताम्, दीयताम्—देते रहो, देते जाओ'—यही शब्द गूँज रहे थे।
उधर वसुदेवजीने देवताओं तथा भाई-बन्धुओंके साथ सुखपूर्वक वह रात व्यतीत की। प्रातःकाल उठकर उन्होंने शौच आदि प्रातःकृत्य समास किया। फिर स्नान करके शुद्ध धुली हुई धोती और चद्दर धारण करके संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म सम्पन्न किया। तत्पश्चात् वेदमन्त्रद्वारा श्रीहरिका शुभ अधिवासन (मूर्ति-प्रतिष्ठा) किया। फिर साक्षात् सम्पूर्ण देवताओं तथा सारी मातृकाओंका भलीभाँति पूजन और वसुधारा प्रदान करके वृद्धिश्राद्ध आदि मङ्गलकृत्य किये और देवताओं, ब्राह्मणों तथा जाति-भाइयोंको भोजन कराया, बाजा बजवाया, मङ्गल-कार्य कराये और अप्रतिम सौन्दर्यशाली वरका उत्तम शृङ्गार करवाया। फिर वरकी सवारीको अत्यन्त सुन्दर ढंगसे सजवाया।
इसी प्रकार राजा भीष्मकने भी पुरोहितोंके साथ वेद-मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारे वैवाहिक मङ्गल-कार्य सम्पन्न किये। हर्षमग्न हो भटों, ब्राह्मणों और भिक्षुकोंको भी मणि, रत्न, धन, मोती, माणिक्य, हीरे, भोजन-सामग्री, वस्त्र और अनुपम उपहार दिये, बाजा बजवाया, मङ्गल-कार्य कराया और रानियों तथा मुनि-पत्नियोंद्वारा यथोचित विधि-विधानके साथ रुक्मिणीको मनोहर सुन्दर साज-सज्जासे विभूषित कराया। तदनन्तर जब परमोदय माहेन्द्र नामक शुभ मुहूर्त, जो लग्नाधिपतिसे संयुक्त, शुद्ध शुभ ग्रहोंसे दृष्ट तथा असद् ग्रहोंकी दृष्टिसे रहित था। ऐसा विवाहोचित लग्न आया जिसमें नक्षत्र और क्षण शुभ थे, चन्द्र-बल और तारा-बल विशुद्ध था तथा शलाका आदि वेधदोष नहीं था। ऐसे परिणाममें सुखदायक