भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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तथा वर-वधूके लिये कल्याणकारी समयके आनेपर श्रीहरि महाराज भीष्मकके प्राङ्गणमें पधारे। उस समय उनके साथ देवता, मुनि, ब्राह्मण, पुरोहित, जाति-भाई, बन्धु-बान्धव, पिता, माता, नरेशगण, ग्वाले, मनोहर वेश-भूषासे सुसज्जित समवयस्क पार्षद, भट्ट और ज्योतिः-शास्त्रविशारद गणक भी थे। उस स्थानकी मङ्गलमयता, माङ्गलिक वस्तुओंसे सुशोभित मनोहर विचित्र शिल्पकलाके द्वारा निर्मित सभाको देखकर सब मुग्ध हो गये। तब ब्रह्मा आदि देवता, राजेन्द्र, दानवेन्द्र, सनकादि मुनि और श्रेष्ठ पार्षदोंके साथ भगवान् श्रीकृष्ण हर्षपूर्वक शीघ्र ही रथसे उतरकर आँगनमें खड़े हो गये। उन देवों, मुनीन्द्रों तथा नरेशोंको आये हुए देखकर राजा भीष्मक उतावलीके साथ सहसा उठ खड़े हुए और सिर झुकाकर उन सबकी वन्दना की; फिर उन्होंने आदरपूर्वक क्रमशः पृथक्-पृथक् सबका भलीभाँति पूजन करके उन्हें परम रमणीय रत्नसिंहासनोंपर बैठाया। उस समय राजाके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये थे। वे अञ्जलि बाँधकर भक्तिपूर्वक उन सबकी तथा वसुदेव और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए बोले।

भीष्मकने कहा—प्रभो! आज मेरा जन्म सफल, जीवन सुजीवन और करोड़ों जन्मोंके कर्मोंका मूलोच्छेद हो गया; क्योंकि जो लोकोंके विधाता, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता और तपस्याओंके फलदाता हैं; स्वप्नमें भी जिनके चरणकमलका दर्शन होना दुर्लभ है; वे सृष्टिकर्ता स्वयं ब्रह्मा मेरे आँगनमें विराजमान हैं। योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र, सुरेन्द्र और मुनीन्द्र ध्यानमें भी जिनका दर्शन नहीं कर पाते, वे देवाधिदेव शंकर मेरे आँगनमें पधारे हैं, जो कालके काल, मृत्युकी मृत्यु, मृत्युञ्जय और सर्वेश्वर हैं; वे भगवान् विष्णु मनुष्योंके दृष्टिगोचर हुए हैं। जिनके हजारों फणोंके मध्य एक फणपर सारा चराचर विश्व स्थित है और सम्पूर्ण वेदोंमें जिनकी महिमाका अन्त नहीं है; वे ये भगवान् अनन्त मेरे आँगनमें वर्तमान हैं। जो सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, सर्वप्रथम जिनकी पूजा होती है और जो देवगणोंमें श्रेष्ठ हैं; वे गणेश मेरे आँगनमें उपस्थित हैं। जो मुनियों और वैष्णवोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा ज्ञानियोंके गुरु हैं; वे भगवान् सनत्कुमार प्रत्यक्ष-रूपसे मेरे आँगनमें विद्यमान हैं। ब्रह्माके जितने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र और वंशज हैं; वे सभी ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित होते हुए आज मेरे घर अतिथि हुए हैं। अहो! मेरा यह वासस्थान कल्पान्तपर्यन्त तीर्थतुल्य हो गया। जिनके चरणोदकसे तीर्थ पावन हो जाते हैं, उन्हीं चरणोंके स्पर्शसे आज मेरा गृह विशुद्ध हो गया है, क्योंकि भूतलपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी सागरमें हैं और जितने सागरमें तीर्थ हैं, वे सभी ब्राह्मणके चरणोंमें वास करते हैं। जो प्रभु प्रकृतिसे परे हैं; ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवोंके लिये ध्यानद्वारा असाध्य हैं; योगियोंके लिये भी दुराराध्य, निर्गुण, निराकार तथा भक्तानुग्रहमूर्ति हैं; ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवगण जिनके चरणकमलका ध्यान करते हैं; जो कुबेर, गणेश और सूर्यके लिये भी दुर्लभ हैं; वे ही भगवान् साक्षात्-रूपसे मेरे घर पधारकर मनुष्योंके नयन-गोचर हुए हैं। यों कहकर भीष्मक स्वयं श्रीकृष्णको सामने लाकर सामवेदोक्त स्तोत्रद्वारा उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे।

भीष्मक बोले—भगवन्! आप समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा, सबके साक्षी, निर्लिप्त, कर्मियोंके कर्मों तथा कारणोंके कारण हैं। कोई-कोई आपका एकमात्र सनातन ज्योतिरूप बतलाते हैं। कोई, जीव जिनका प्रतिबिम्ब है, उन परमात्माका स्वरूप कहते हैं। कुछ भ्रान्तबुद्धि पुरुष आपको प्राकृतिक सगुण जीव उद्घोषित करते हैं। कुछ सूक्ष्मबुद्धिवाले ज्ञानी आपको नित्य