भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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७५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शरीरधारी बतलाते हैं। आप ज्योतिके मध्य सनातन अविनाशी देहरूप हैं; क्योंकि साकार ईश्वरके बिना भला यह तेज कहाँसे उत्पन्न हो सकता है?

नारद! यों स्तुति करके राजा भीष्मकने विष्णुका स्मरण करते हुए हर्षपूर्वक श्रीकृष्णके पद्मद्वारा समर्चित चरणकमलमें पाद्य निवेदित किया। फिर दूर्वा और जलसमन्वित अर्घ्य प्रदान करके मधुपर्क और गौ समर्पित की तथा उनके सारे शरीरमें सुगन्धित चन्दन लगाया। उस शुभ कर्ममें महेन्द्रने जो पारिजात-पुष्पोंकी माला दहेजरूपमें प्रदान की थी, उसे राजाने अपने जामाताके गलेमें डाल दिया। कुबेरने जो अमूल्य रत्नाभरण दिया था, उसके द्वारा राजाने भक्तिपूर्वक श्रीकृष्णका वरण किया। पूर्वकालमें अग्निद्वारा जो अग्निशुद्ध युग्म वस्त्र दिये गये थे, उनको भीष्मकने परिपूर्णतम श्रीकृष्णको समर्पित कर दिया। विश्वकर्माने जो चमकीला रत्नमुकुट दिया था, उसे राजाने परमात्मा श्रीकृष्णके मस्तकपर रख दिया। इसके बाद रत्ननिर्मित सिंहासन, नाना प्रकारके पुष्प, धूप, रत्नप्रदीप तथा अत्यन्त मनोहर नैवेद्य प्रदान किये। पुनः सात तीर्थोंके जलसे आचमन कराया। फिर कर्पूर आदिसे सुवासित उत्तम रमणीय पानबीड़ा, मनोहर रतिकरी शय्या और पीनेके लिये सुवासित जल दिया। इस प्रकार वरण करके राजाने उस पूजनको सम्पन्न किया और अञ्जलिको सम्पुटित करके श्रीकृष्णको पुष्पाञ्जलि समर्पित की। (अध्याय १०७)


रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह, बारातकी बिदाई, भीष्मकद्वारा दहेज-दान और द्वारकामें मङ्गलोत्सव

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! इसी समय महालक्ष्मी-स्वरूपा रुक्मिणीदेवी मुनियों और देवताओंके साथ सभामें आयीं और रत्नसिंहासनपर विराजमान हुईं। वे रत्नाभरणोंसे विभूषित थीं और उनके शरीरपर अग्निशुद्ध साड़ी शोभा पा रही थी। उनकी वेणी सुन्दररूपसे गूँथी गयी थी। वे मुस्कराती हुई अमूल्य रत्नजटित दर्पणमें अपना मुख निहार रही थीं, कस्तूरीके बिन्दुओंसे युक्त एवं सुकोमल चन्दनसे चर्चित थीं तथा उनके ललाटका मध्य भाग सिन्दूरकी बेंदीसे उद्भासित हो रहा था। उनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णकी-सी और प्रभा सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान थी, उनके सर्वाङ्गमें चन्दनका अनुलेप हुआ था, मालतीकी माला उनकी शोभा बढ़ा रही थी और सात बालक राजकुमारोंद्वारा वे वहाँ लायी गयी थीं। ऐसी महालक्ष्मीस्वरूपा पतिव्रता रुक्मिणीदेवीको देवेन्द्रों, मुनीन्द्रों, सिद्धेन्द्रों तथा नृपश्रेष्ठोंने देखा।

तदनन्तर सती रुक्मिणीने अपने पति श्रीकृष्णकी सात प्रदक्षिणा करके उन्हें नमस्कार किया और चन्दनके सुकोमल पल्लवोंद्वारा शीतल जलसे सींचा। तत्पश्चात् जगत्पति श्रीकृष्णने शान्तरूपिणी एवं मन्द मुस्कानयुक्त अपनी प्रियतमा रुक्मिणीपर जल छिड़का। फिर शुभ मुहूर्तमें पतिने पत्नीका और पत्नीने पतिका अवलोकन किया। इसके बाद सुमुखी रुक्मिणीदेवी पिताकी गोदमें जा बैठीं; उस समय वे अपने तेजसे उद्दीप्त हो रही थीं और उनका मुख लज्जावश झुक गया था। नारद! तब राजा भीष्मकने वेदमन्त्रोच्चारणपूर्वक दानकी विधिसे देवेश्वरी रुक्मिणीको परिपूर्णतम श्रीकृष्णके हाथों सौंप दिया। उस समय हर्षपूर्वक बैठे हुए श्रीकृष्णने वसुदेवजीकी आज्ञासे 'स्वस्ति' ऐसा कहकर रुक्मिणीदेवीको उसी प्रकार ग्रहण कर