भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७४०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

तदनन्तर मुनि वह सब सामान अपने पुत्रको देकर स्वयं पत्नीके साथ अमूल्य रत्न-निर्मित रथपर सवार हो उत्तम गोलोकको चले गये। उस अद्भुत दृश्यको देखकर श्रीकृष्ण हर्षपूर्वक अपने गृहको लौट गये। नारद! इस प्रकार ब्रह्मण्यदेव भगवान् श्रीकृष्णके चरित्रको श्रवण करो। यह स्तोत्र महान् पुण्यदायक है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, उसकी निःसंदेह श्रीकृष्णमें निश्चल भक्ति हो जाती है। इसके प्रभावसे कीर्तिहीन परम यशस्वी और मूर्ख पण्डित हो जाता है। वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके पदको प्राप्त होता है। वहाँ उसे नित्य श्रीहरिकी दासता सुलभ रहती है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है।

(अध्याय १०२)


द्वारकापुरीका निर्माण, उसे देखनेके लिये देवताओं और मुनियोंका आना और उग्रसेनका राज्याभिषेक

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर सर्वव्यापी श्रीहरिने बलरामके साथ मथुरापुरीमें आकर पिताको प्रणाम किया और वटवृक्षके नीचे बैठकर आदरसहित गरुड़, क्षारसागर और विश्वकर्माका स्मरण किया। वहाँ उन्होंने गोपवेषका परित्याग करके राजसी वेष धारण कर लिया। इसी बीच करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान श्रेष्ठ सुदर्शनचक्र स्वयं ही श्रीकृष्णके पास आया। वह उत्तम अस्त्र श्रीहरिके सदृश तेजस्वी, शत्रुनाशक, अमोघ, अस्त्रोंमें श्रेष्ठ और परमोत्कृष्ट था। इसके बाद रत्ननिर्मित विमानको आगे करके गरुड़, शिष्यसहित विश्वकर्मा तथा काँपता हुआ समुद्र श्रीहरिके संनिकट आये। उन सब लोगोंने भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर श्रीहरिको प्रणाम किया। तब सर्वव्यापी भगवान् क्रमशः उससे आदरसहित मुस्कराते हुए बोले।

श्रीकृष्णने कहा— हे महाभाग समुद्र! मैं नगर-निर्माण करना चाहता हूँ; अतः उसके लिये तुम मुझे सौ योजन विस्तृत भूमि दो। पीछे वह भूमि मैं तुम्हें अवश्य ही लौटा दूँगा। हे विश्वकर्मा! उस स्थानपर तुम एक ऐसा नगर-निर्माण करो; जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ हो, सबके लिये रमणीय हो, स्त्रियोंके मनको हरण करनेवाला हो, भक्तोंके लिये वाञ्छनीय हो, वैकुण्ठके समान परमोत्कृष्ट हो, समस्त स्वर्गोंसे परे और सबके लिये अभीष्ट हो। आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ महाभाग गरुड़! जबतक विश्वकर्मा द्वारकापुरीका निर्माण करते हैं, तबतक तुम रात-दिन इनके पास स्थित रहो। चक्रश्रेष्ठ सुदर्शन! तुम दिन-रात मेरे पार्श्वमें वर्तमान रहो। मुने! तब चक्रके अतिरिक्त और सभी लोग 'ॐ—बहुत अच्छा' यों कहकर चले गये। महाभाग! इधर श्रीकृष्णने नगरमें आकर कंसके पिता महाबली एवं सर्वोत्तम उग्रसेनको क्षत्रियों तथा सत्पुरुषोंका भी राजा बना दिया। फिर युक्तिपूर्वक जरासंधको जीतकर कालयवनको