ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७३९
एकमात्र स्वामी, भक्तोंके इष्टदेव, भक्तानुग्रहमूर्ति और भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये कल्पतरु हो। ब्रह्मा, शिव और शेष तुम्हारी वन्दना करते हैं। तुम पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये इस भूतलपर मायावश बालरूपमें अवतीर्ण हुए हो और मायासे ही भूपाल बने हो। योगीलोग जिसे सनातन ब्रह्मज्योति जानते हैं, भक्तगण अपने हृदयमें जिस ज्योतिका हर्षपूर्वक ध्यान करते हैं, जिनके दो भुजाएँ हैं, हाथमें मुरली सुशोभित है, सर्वाङ्गमें चन्दनका अनुलेप लगा हुआ है, जिनका सुन्दर श्याम रूप है, जो मन्द मुस्कानयुक्त, भक्तवत्सल, पीताम्बरधारी, वनमाला-विभूषित और लीला-कटाक्षोंसे कामदेवको उपहासास्पद एवं मूर्च्छित कर देनेवाले हैं, जिनका चरणकमल अलक्तकके उत्पत्तिस्थानकी भाँति अत्यन्त शोभायमान है और शरीर कौस्तुभमणिसे उद्भासित हो रहा है, जिनकी मनोहर दिव्य मूर्ति है, जो हर्षवश मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं, जिनका सुन्दर वेश है, देवगण जिनकी स्तुति करते हैं, जो देवोंके देव, जगदीश्वर, त्रिलोकीको मोहित करनेवाले, सर्वश्रेष्ठ, करोड़ों कामदेवोंकी-सी कान्तिवाले, कमनीय, ईश्वररहित (स्वयं ईश्वर), अमूल्य रत्नोंके बने हुए भूषणोंसे विभूषित, श्रेष्ठ, सर्वोत्तम, वरदाता, वरदाताओंके इष्टदेव और चारों वेदों तथा कारणोंके भी कारण हैं; वही तुम लीलावश पढ़नेके लिये मेरे प्रिय स्थानपर आये हो। तुम तो स्वात्मामें रमण करनेवाले, सर्वव्यापी एवं परिपूर्णतम हो; अतः तुम्हारे विद्याध्ययन, रमण, गमन और युद्ध आदि सभी कार्य लोक-शिक्षाके लिये हैं।
तत्पश्चात् गुरुपत्नी बोलीं—प्रभो! आज मेरा जन्म, जीवन, पातिव्रत्य तथा तपोवनका वास सफल हो गया। मैंने जिस हाथसे तुम्हें इच्छित अन्न प्रदान किया है, वह मेरा दाहिना हाथ सफल हो गया। जो आश्रम तीर्थपाद भगवान्के चरणसे चिह्नित है; वह तीर्थसे भी बढ़कर है। उनकी चरणरजसे गृह पावन और आँगन उत्तम हो जाते हैं। तुम्हारा चरणकमल हम दोनोंके जन्म-मरणका निवारक है; क्योंकि दुःख, शोक, भोग, रोग, जन्म, कर्म, भूख-प्यास आदि तभीतक कष्टप्रद होते हैं, जबतक तुम्हारे चरण-कमलका दर्शन और भजन नहीं होता*। हे भगवन्! तुम कालके भी काल, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा और संहारकारक शिवके भी ईश्वर तथा माया-मोहके विनाशक हो। कृपानाथ! मुझपर कृपा करो। इतना कहते-कहते गुरुपत्नीके नेत्रोंमें आँसू छलक आये। वे पुनः श्रीकृष्णको अपनी गोदमें लेकर प्रेमपूर्वक देवकीकी तरह अपना स्तन पिलाने लगीं।
तब श्रीकृष्णने कहा—माता! तुम मुझ बालककी स्तुति कैसे कर रही हो; क्योंकि मैं तो तुम्हारा दुधमुँहा बच्चा हूँ। अच्छा, अब तुम इस प्राकृतिक मिथ्या नश्वर शरीरको त्यागकर और जन्म, मृत्यु एवं बुढ़ापेका हरण करनेवाले निर्मल देहको धारण करके अपने पतिदेवके साथ अभीष्ट गोलोकको जाओ।
यों कहकर श्रीकृष्णने एक ही महीनेमें परम भक्तिके साथ मुनिवर सांदीपनिसे चारों वेदोंका अध्ययन करके पूर्वकालमें मरे हुए उनके पुत्रको वापस लाकर उन्हें समर्पित कर दिया। फिर लाखों-लाखों मणि, रत्न, हीरे, मोती, माणिक्य, त्रैलोक्यदुर्लभ वस्त्र, हार, अँगूठियाँ और सोनेकी मुहरें दक्षिणामें दीं। तत्पश्चात् स्त्रीके सर्वाङ्गमें पहननेयोग्य अमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण और अग्निशुद्ध श्रेष्ठ वस्त्र गुरुपत्नीको प्रदान किये।
* तावद् दुःखं च शोकश्च तावद् भोगश्च रोगकः।
तावज्जन्मानि कर्माणि क्षुत्पिपासादिकानि च। यावत्त्वत्पादपद्मस्य भजनं नास्ति दर्शनम्॥
(१०२।१९-२०)