भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७३८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

पोषण करनेवाली माता हो। अब तुमलोग आनन्दपूर्वक शीघ्र ही व्रजको लौट जाओ। पिताजी ! इस समय मैं बलरामजीके साथ वेदाध्ययन करनेके लिये मुनिवर सांदीपतिके निवासस्थान अवन्तिनगरको जाऊँगा। चिरकालके बाद वहाँसे लौटनेपर पुनः आपके दर्शन होंगे। माताजी ! काल ही ग्रहण करता है और वही भेद उत्पन्न करता है। यहाँतक कि मनुष्योंके जो वियोग, मिलन, सुख, दुःख, शोक और मङ्गल आदि हैं; उन सबका कर्ता काल ही है। मैंने जो तत्त्व पिताजीको बतलाया है, वह योगियोंके लिये भी दुर्लभ है। वे आनन्दपूर्वक वह सारा रहस्य तुम्हें बतलायेंगे। इतना कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण वसुदेवजीकी सभामें चले गये और क्षणभर वहाँ ठहरकर पिताकी आज्ञासे महर्षि सांदीपतिके आश्रमको प्रस्थित हुए।

तदनन्तर यशोदासहित नन्दजी विनयपूर्वक वसुदेव-देवकीसे वार्तालाप करके दुःखी हृदयसे जानेको उद्यत हुए। उस समय देवकीने नन्दजीको मुक्तामणि, सुवर्ण, माणिक्य, हीरा, रत्न और अग्निशुद्ध वस्त्र भेंट किये। वसुदेवजी और श्रीकृष्णने उन्हें आदरपूर्वक श्वेत अश्व, गजराज, सुवर्ण और उत्तम रथ प्रदान किये। फिर नन्द-यशोदाके चलनेपर बहुत-से ब्राह्मण, देवकी आदि प्रमुख महिलाएँ, वसुदेव, अक्रूर और उद्धव भी हर्षपूर्वक उनके पीछे-पीछे चले। यमुनाके निकट पहुँचकर वे सभी शोकके कारण रोने लगे। फिर परस्पर वार्तालाप करके वे सब-के-सब अपने-अपने घरको चले गये। मुने ! तदनन्तर विधवा कुन्ती तरह-तरहके रत्नों और मणियोंकी भेंट पाकर वसुदेवजीकी आज्ञासे पुत्रोंसहित आनन्दपूर्वक अपने गृहको प्रस्थित हुईं। इधर वसुदेव और देवकीने पुत्रके कल्याणके लिये अनेक प्रकारके रत्न, मणि, वस्त्र, सोना, चाँदी, मोतियों और हीरोंके हार और अमृत-तुल्य मिष्टान्न भृष्ट ब्राह्मणोंको आदरपूर्वक हर्षपूर्ण मनसे समर्पित किये। फिर यत्नपूर्वक महोत्सव मनाया गया; जिसमें वेद-पाठ, हरिनाम-संकीर्तन और ब्राह्मणोंको भोजन कराया गया। इसके बाद जाति-भाइयोंको यथोचित रूपसे मनोहर मणि, माणिक्य, मोती और वस्त्र पुरस्काररूपमें दिये।

(अध्याय १००-१०१)


बलरामसहित श्रीकृष्णका विद्या पढ़नेके लिये महर्षि सांदीपतिके निकट जाना, गुरु और गुरुपत्नीद्वारा उनका स्वागत और विद्याध्ययनके पश्चात् गुरुदक्षिणारूपमें गुरुके मृतक पुत्रको उन्हें वापस देकर घर लौटना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद ! श्रीकृष्णने बलरामके साथ हर्षपूर्वक सांदीपतिके गृह जाकर अपने उन गुरुदेव तथा पतिव्रता गुरुपत्नीको नमस्कार किया और उन्हें भेंटरूपमें रत्न एवं मणि समर्पित की। तत्पश्चात् उनसे शुभाशीर्वाद लेकर वे श्रीहरि उन गुरुदेवसे यथोचित वचन बोले।

**श्रीकृष्णने कहा—**विप्रवर ! आपसे अपनी अभीष्ट विद्या प्राप्त करूँगा—ऐसी मेरी लालसा है; अतः शुभ मुहूर्त निश्चय करके मुझे यथोचितरूपसे विद्याध्ययन कराइये। तब 'ॐ—बहुत अच्छा'—यों कहकर मुनिवर सांदीपनिने हर्षपूर्वक मधुपर्कप्राशन, गौ, वस्त्र और चन्दनद्वारा उनका आदर-सत्कार किया, मिष्टान्न भोजन कराया, सुवासित पानका बीड़ा दिया, मधुर वार्तालाप किया और उन परमेश्वरका स्तवन करते हुए कहा।

**सांदीपनि बोले—**भक्तोंके प्राणवल्लभ ! तुम परब्रह्म, परमधाम, परमेश्वर, परात्पर, स्वेच्छामय, स्वयंज्योति, निर्लिप्त, अद्वितीय, निरङ्कुश, भक्तोंके