भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 755

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७४५


सबके कर्मोंके साक्षी हैं; वे स्वयं श्रीमान् नारायण पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूतलपर वसुदेवनन्दनके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। राजेन्द्र! उन परिपूर्णतमको कन्या-दान करके तुम अपनी सौ पीढ़ियोंके साथ गोलोकमें जाओगे। अतः उन्हें कन्या देकर परलोकमें सारूप्य-मुक्ति प्राप्त कर लो और इस लोकमें सर्वपूज्य तथा विश्वके गुरुके गुरु हो जाओ। विभो! सर्वस्व दक्षिणामें देकर महालक्ष्मी-स्वरूपा रुक्मिणीको उन्हें समर्पित कर दो और अपने जन्म-मरणके चक्करको नष्ट कर डालो। राजन्! ब्रह्माने यही सम्बन्ध लिख रखा है और यह सर्वसम्मत भी है; अतः शीघ्र ही द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णके पास ब्राह्मण भेजो और जल्दी-से-जल्दी जो सभीको सम्मत हो, ऐसा शुभ मुहूर्त निश्चित करके परमात्मा श्रीकृष्णको—जो भक्तानुग्रह-मूर्ति, ध्यानानुरोधके कारण, नित्यविग्रहधारी और सर्वोत्तम हैं—यहाँ बुलाओ। नरेश! इस प्रकार उनके दर्शन करके अपना आवागमन मिटा डालो। महाराज! जिन्हें चारों वेद, संत, देवगण, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र तथा ब्रह्मा आदि देवता नहीं जान पाते; ध्यानपूत योगीलोग जिनका ध्यान करते हैं; परंतु साक्षात्कार नहीं कर पाते; चारों वेद, छहों शास्त्र और सरस्वती जिनका गुणगान करनेमें जड हो जाती है; हजार मुखवाले शेषनाग, पाँच मुखधारी महेश्वर, चार मुखवाले जगत्स्रष्टा ब्रह्मा, कुमार कार्तिकेय, ऋषि, मुनि तथा परम वैष्णव भक्तगण जिनका स्तवन करके पार नहीं पाते; जो योगियोंके लिये ध्यानद्वारा साध्य हैं; उन श्रीकृष्णका गुण मैं बालक होकर किस प्रकार वर्णन कर सकता हूँ?

शतानन्दजीका वचन सुनकर राजाका मुख प्रफुल्लित हो उठा। उन्होंने वेगपूर्वक उठकर शतानन्दजीका आलिङ्गन किया। उस समय राजाके मुखपर प्रसन्नता खेल रही थी; उन्होंने शतानन्दजीको नाना प्रकारके रत्न, सुवर्ण, वस्त्र, रत्ननिर्मित आभूषण, गजराज, श्रेष्ठ अश्व, मणिनिर्मित रथ, रमणीय रत्नसिंहासन, बहुत-सा धन, सम्पूर्ण अन्नोंसे भरी हुई ऐसी उत्तम भूमि, जो बिना जोते अन्न उपजानेवाली तथा सदा वृष्टि करनेवाली थी और सबके द्वारा प्रशंसित गाँव दिये। इसी बीच राजकुमार रुक्मि—जो चञ्चल स्वभाववाला तथा अधर्मी था—कुपित हो उठा। क्रोधावेशमें उसके मुख और नेत्र लाल हो गये तथा उसका शरीर काँपने लगा। वह सभामें उठकर सभी सभासदोंके समक्ष खड़ा हो गया और पिता भीष्मक तथा विप्रवर शतानन्दजीसे बोला।

रुक्मिने कहा—राजेन्द्र! इन भिक्षुकों, लोभियों और क्रोधियोंकी बात छोड़िये तथा मेरा हितकारक, तथ्य एवं प्रशंसनीय वचन सुनिये। महाबाहो! कृष्णने भयवश युक्तिका आश्रय लेकर राजेन्द्र मुचुकुन्दके सामने कालयवनका वध करके उसका सारा धन हड़प लिया है। उसी कालयवनका धन पाकर ही कृष्ण द्वारकामें धनी हो गये हैं। उन्होंने एक जरासंधके भयसे डरकर समुद्रके भीतर घर बनाया है। परंतु ऐसे सैकड़ों जरासंधोंको मैं अकेले ही क्षणभरमें खेल-ही-खेलमें मार सकता हूँ; फिर किसी अन्य राजाकी तो बात ही क्या है? भीष्मक! मैं दुर्वासाका शिष्य हूँ और रणशास्त्रमें निपुण हूँ। अपने उसी ज्ञानके बलसे मैं निश्चय ही विश्वका संहार करनेमें समर्थ हूँ। मेरे समान बलवान् या तो परशुरामजी हैं या शिशुपाल ही मेरी समता कर सकता है। वह शिशुपाल मेरा सखा, बलवान्, शूरवीर और स्वर्गको भी जीत लेनेकी शक्ति रखता है। मैं भी क्षणभरमें गणसहित महेन्द्रको जीतनेमें समर्थ हूँ। नरेश्वर! दुर्बल एवं योगी जरासंधको युद्धमें जीतकर श्रीकृष्णको अहंकार हो गया है। वे अपने मन अपनेको वीर मानने लगे हैं; परंतु यदि वे विवाह करनेकी इच्छासे मेरे नगरमें आयेंगे तो मैं क्षणभरमें निश्चय ही उन्हें यमलोक पहुँचा दूँगा।