भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 743

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७३३

रासेश्वरी राधा हैं; उनके भी मैंने दर्शन किये हैं। वे कदलीवनके मध्य एकान्तमें चन्दनचर्चित एवं जलयुक्त पङ्किल भूमिपर बिछे हुए कमलदलकी शय्यापर अत्यन्त खिन्न होकर पड़ी थीं। उन्होंने रत्नाभरणोंको उतार फेंका है। उनका शरीर श्वेत वस्त्रसे आच्छादित है। वे अत्यन्त मलिन एवं दुर्बल हो गयी हैं। आहार छोड़ देनेके कारण उनका उदर शीर्ण हो गया है। वे क्षण-क्षणपर साँस लेती हैं। वहाँ सखियाँ निरन्तर श्वेत चँवरसे उनकी सेवा कर रही हैं। हरे! यों विरह-तापसे पीड़िता श्रीराधा क्या क्षणभर जीवित रह सकती हैं? अरे! उन्हें तो इसका भी भान नहीं रह गया है कि क्या जल है और क्या स्थल है, क्या रात है और क्या दिन है, कौन मनुष्य है और कौन पशु है तथा कौन अपना है और कौन पराया है? वे बाह्यज्ञानशून्य होकर तुम्हारे चरणके ध्यानमें मग्न हैं। वे त्रिलोकीमें अपने उज्ज्वल यशसे प्रकाशित हो रही हैं। उनकी मृत्यु भी कीर्तिदायिनी है। परंतु जगन्नाथ! अज्ञानी चोर-डाकू भी इस प्रकार स्त्री-हत्या करना नहीं चाहते; अतः तुम शीघ्र ही अभीष्ट कदलीवनको जाओ; क्योंकि राधासे बढ़कर भक्त न कोई हुआ है और न होगा। वे सब तरहसे पीड़ित होकर अनाथ हो गयी हैं। वसन्त-ऋतु, किरणधारी चन्द्रमा और सुगन्धित वायु उनके लिये दाहकारक हो गये हैं। तपाये हुए सुवर्णके समान उनकी चमकीली कान्ति इस समय कज्जलकी तरह श्याम हो गयी है और उनके केश सुवर्णके-से भूरे हो गये हैं।

उन्होंने उत्तम वस्त्र और शृङ्गारका त्याग कर दिया है। श्रीकृष्ण! स्वयं भगवान् ब्रह्मा—जो देवताओंमें सर्वश्रेष्ठ हैं—तुम्हारे भक्त हैं। योगीन्द्रोंके गुरुके गुरु भगवान् शंकर तुम्हारे भक्त हैं। ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ गणेश और सनत्कुमार भी तुम्हारा भजन करते हैं। भूतलपर कितने मुनीन्द्र तुम्हारे भजनमें लगे रहते हैं; परंतु राधा तुम्हारी जैसी भक्ति करती हैं, वैसा भक्त कोई भी कहीं भी दूसरा नहीं है। राधा जिस प्रकार तुम्हारे ध्यानमें तल्लीन रहती हैं वैसा तो स्वयं लक्ष्मी भी नहीं कर सकतीं। महाभाग! मैंने राधाके सामने ‘श्रीहरि आयेंगे’ यों स्वीकार कर लिया है; अतः तुम शीघ्र ही वहाँ जाओ और मेरा वचन सार्थक करो। उद्धवकी बात सुनकर माधव ठठाकर हँस पड़े और वेदोक्त हितकारक एवं उत्तम सत्यव्रतका वर्णन करते हुए बोले।

श्रीभगवान्‌ने कहा— उद्धव! मैं तुम्हारे द्वारा अङ्गीकार किये गये वचनको अवश्य सफल करूँगा। मैं स्वप्नमें माता यशोदाके तथा गोपियोंके निकट जाऊँगा। यह सुनकर महायशस्वी उद्धव अपने घर चले गये और श्रीकृष्ण स्वप्नमें विरहाकुल गोकुलमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने स्वप्नमें राधाको भलीभाँति आश्वासन देकर परम दुर्लभ ज्ञान प्रदान किया। क्रीड़ा करके उन गोपिकाओंको यथोचितरूपसे संतुष्ट किया; नींदमें पड़ी हुई माता यशोदाका स्तन-पान करके उन्हें ढाढ़स बँधाया तथा गोपों और ग्वालबालोंको समझा-बुझाकर वे पुनः वहाँसे चल दिये।

(अध्याय ९८)


गर्गजीका आगमन और वसुदेवजीसे पुत्रोंके उपनयनके लिये कहना, उसी प्रसङ्गमें मुनियों और देवताओंका आना, वसुदेवजीद्वारा उनका सत्कार और गणेशका अग्र-पूजन

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! इसी समय तपस्वी गर्गजी, जो सदा संयममें तत्पर रहनेवाले

और यदुवंशियोंके कुल-पुरोहित थे, वसुदेवजीके आश्रमपर पधारे। उनके सिरपर जटा थी तथा