ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कोई नहीं है$^१$। ब्रह्मा मेरे मनस्वरूप, महेश्वर मेरे ज्ञानरूप और मूलप्रकृति ईश्वरी भगवती दुर्गा मेरी बुद्धिरूपा हैं। निद्रा आदि जो-जो शक्तियाँ हैं, वे सब-की-सब प्रकृतिकी कलाएँ हैं। साक्षात् सरस्वती मेरी वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं। कल्याणके अधिदेवता गणेशजी मेरे हर्ष हैं। स्वयं धर्म परमार्थ है तथा अग्निदेव मेरे भक्त हैं; गोलोकके सम्पूर्ण निवासी मेरे समस्त ऐश्वर्यके अधिदेवता हैं। तुम सदा मेरे प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी एवं प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो। गोपाङ्गनाएँ तुम्हारी कलाएँ हैं; अतएव मुझे प्यारी हैं। गोलोकनिवासी समस्त गोप मेरे रोमकूपसे उत्पन्न हुए हैं$^२$। सूर्य मेरे तेज और वायु मेरे प्राण हैं। वरुण जलके अधिदेवता तथा पृथ्वी मेरे मलसे प्रकट हुई है। मेरे शरीरका शून्यभाग ही महाकाश कहा गया है। कामकी उत्पत्ति मेरे मनसे हुई है। इन्द्र आदि सब देवता मेरी कलाके अंशांशसे प्रकट हुए हैं। सृष्टिके बीजरूप जो महत् आदि तत्त्व हैं, उन सबका बीजरूप आश्रयहीन आत्मा मैं स्वयं ही हूँ। कर्मभोगका अधिकारी जीव मेरा प्रतिबिम्ब है। मैं साक्षी और निरीह हूँ। किसी कर्मका भोगी नहीं हूँ। मुझ स्वेच्छामय परमेश्वरका यह शरीर भक्तोंके ध्यानके लिये है। एकमात्र परात्पर परमेश्वर मैं ही प्रकृति हूँ और मैं ही पुरुष हूँ।
श्रीराधिकाने पूछा—भगवन्! आप सब तत्त्वोंके ज्ञाता, सबके बीज और सनातन पुरुष हैं। समस्त संदेहोंका निवारण करनेवाले प्रभो! मेरे अभीष्ट प्रश्नका समाधान कीजिये। भगवान् शंकर सम्पूर्ण ज्ञानोंके अधिदेवता, समस्त तत्त्वोंके ज्ञाता, मृत्युञ्जय, कालके भी काल तथा आपके ही तुल्य महान् हैं। फिर वे अपने सारे अङ्गोंमें विभूति क्यों लगाते हैं? पञ्चमुख और त्रिलोचन क्यों कहलाते हैं? दिगम्बर और जटाधारी क्यों हैं? सर्प-समुदायसे क्यों विभूषित होते हैं? वे देवेन्द्र श्रेष्ठ वाहन छोड़कर वृषभके द्वारा क्यों भ्रमण करते हैं? रत्नसारनिर्मित आभूषण क्यों नहीं धारण करते हैं? अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रको त्यागकर व्याघ्रचर्म क्यों पहनते हैं? पारिजात छोड़कर धतूरेके फूल क्यों धारण करते हैं? उन्हें मस्तकपर रत्नमय किरीट धारण करनेकी इच्छा क्यों नहीं होती? जटापर ही उनकी अधिक प्रीति क्यों है? दिव्यलोक छोड़कर उन प्रभुको श्मशानमें रहनेकी अभिलाषा क्यों होती है? चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा सुगन्धित पुष्पोंको छोड़कर वे बिल्वपत्र तथा बिल्व-काष्ठके अनुलेपनकी स्पृहा क्यों रखते हैं? मैं यह सब जानना चाहती हूँ। प्रभो! आप विस्तारके साथ इसका वर्णन करें। नाथ! इसे सुननेके लिये मेरे मनमें कौतूहल बढ़ रहा है। इच्छा जाग उठी है।
राधिकाकी यह बात सुनकर मधुसूदनने हँसते हुए उन्हें अपने समीप बिठा लिया और कथा कहना आरम्भ किया।
श्रीकृष्ण बोले—प्रिये! पूर्णतम महेश्वरने साठ हजार युगोंतक तप करते हुए मनके द्वारा सानन्द मेरा ध्यान किया। तत्पश्चात् वे तपस्यासे विरत हो गये। इसी बीच उन्होंने मुझे अपने सामने खड़ा देखा। अत्यन्त कमनीय अङ्ग, किशोर अवस्था और परम उत्तम श्यामसुन्दर रूप—सब कुछ अनिर्वचनीय था। मेरे उस रूपको देखकर त्रिलोचनके लोचन तृप्त न हो सके। वे एकटक नेत्रोंसे देखते रहे तथा भक्तिके उद्रेकसे
१. ततोऽहं वृषरूपेण वहामि तेन तं प्रियम्। मम प्रियतमो नास्ति त्रैलोक्येषु शिवात्परः॥
(३६। ५७)
२. गोपाङ्गनास्तव कला अतएव मम प्रियाः। मल्लोमकूपजा गोपाः सर्वे गोलोकवासिनः॥
(३६। ६२)