ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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राधिकाका यह वचन सुन भगवान् मधुसूदनने हँसकर युगान्तरकी कथाको कहना आरम्भ किया।
श्रीकृष्ण बोले— प्रिये! सुनो। मैं इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास बता रहा हूँ, जिसके सुनने और कहनेसे समस्त पापोंका नाश हो जाता है। प्रलयकालमें जब तीनों लोक एकार्णवके जलमें मग्न थे, तब मेरे ही अंशभूत महाविष्णुके नाभिकमलसे मेरी ही कलाद्वारा जगत्-विधाता ब्रह्माका प्रादुर्भाव हुआ। ब्रह्माजीके हृदयसे पहले चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब नारायणपरायण तथा ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान थे। वे ज्ञानहीन बालकोंकी भाँति सदा नग्न रहते हैं और पाँच वर्षकी ही अवस्थासे युक्त दिखायी देते हैं। उन्हें बाह्यज्ञान नहीं होता; परंतु ब्रह्मतत्त्वकी व्याख्यामें वे बड़े निपुण हैं। सनक, सनन्दन, सनातन और भगवान् सनत्कुमार—ये ही क्रमशः उन चारोंके नाम हैं। एक दिन ब्रह्माजीने उनसे कहा—'पुत्रो! तुम जगत्की सृष्टि करो।' परंतु उन्होंने पिताकी बात नहीं मानी और मेरी प्रसन्नताके लिये वे तपस्या करनेको वनमें चले गये। उन पुत्रोंके चले जानेपर विधाताका मन उदास हो गया। यदि पुत्र आज्ञाका पालन न करे तो पिताको बड़ा दुःख होता है। उन्होंने ज्ञानद्वारा अपने विभिन्न अङ्गोंसे कई पुत्र उत्पन्न किये, जो तपस्याके धनी, वेद-वेदाङ्गोंके विद्वान् तथा ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, क्रतु, वसिष्ठ, वोढु, कपिल^१, आसुरि, कवि^२, शंकु, शङ्ख, पञ्चशिख और प्रचेता। उन तपोधनोंने ब्रह्माजीकी आज्ञासे दीर्घकालतक तप करके सृष्टिका कार्य सम्पन्न किया। वे सभी सपत्नीक थे और संसारकी सृष्टि करनेके लिये उन्मुख रहते थे। उन सभी तपोधनोंके बहुत-से पुत्र और पौत्र हुए। मुनिवंशकी परम्पराका कीर्तन करनेवाली वह मनोहर एवं पुण्यस्वरूपा कथा बहुत बड़ी है; अतः उसे यहीं समास किया जाता है। सुन्दरि राधिके! अब तुम वह कथा सुनो, जो प्रकृत प्रसङ्गके अनुकूल है। प्रचेतामुनिके पुत्र श्रीमान् मुनिवर असित हुए। असितने पुत्रकी कामनासे पत्नीसहित दीर्घकालतक तप किया; परंतु तब भी जब पुत्र नहीं हुआ तो वे अत्यन्त विषादग्रस्त हो गये। उस समय आकाशवाणी हुई—'मुने! तुम भगवान् शंकरके पास जाओ और उनके मुखसे मन्त्रका उपदेश ग्रहण करके उसे सिद्ध करो। उस मन्त्रकी जो अधिष्ठात्री देवी हैं वे शीघ्र ही तुम्हें साक्षात् दर्शन देंगी। उन अभीष्ट देवीके वरसे निश्चय ही तुम्हें पुत्रकी प्राप्ति होगी।' यह बात सुनकर वे ब्राह्मणदेवता शंकरजीके समीप गये। जो योगियोंके लिये भी अगम्य है, उस निरामय शिवलोकमें पहुँचकर पत्नीसहित असित दोनों हाथ जोड़ भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर एक योगीकी भाँति योगियोंके गुरु महादेवजीकी स्तुति करने लगे।
असित बोले— जगद्गुरो! आपको नमस्कार है। आप शिव हैं और शिव (कल्याण)-के दाता हैं। योगीन्द्रोंके भी योगीन्द्र तथा गुरुओंके भी गुरु हैं; आपको प्रणाम है। मृत्युके लिये भी मृत्युरूप होकर जन्म-मृत्युमय संसारका खण्डन करनेवाले देवता! आपको नमस्कार है। मृत्युके ईश्वर! मृत्युके बीज! मृत्युञ्जय! आपको मेरा प्रणाम है। कालगणना करनेवालोंके लक्ष्यभूत कालरूप परमेश्वर! आप कालके भी काल, ईश्वर और कारण हैं तथा कालके लिये भी कालातीत हैं। कालकाल! आपको नमस्कार है। गुणातीत! गुणाधार! गुणबीज! गुणात्मक! गुणीश! और गुणियोंके आदिकारण! आप समस्त गुणवानोंके गुरु हैं; आपको नमस्कार है। ब्रह्मस्वरूप! ब्रह्मज्ञ!
१-२ अन्य पुराणोंके अनुसार कपिलजी कर्दमके तथा कवि भृगुके पुत्र थे। सम्भव है ये दूसरे कपिल हों।