भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 595

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८५ दक्षके प्रति बड़ा रोष था। सतीके मनमें पिता आदिके प्रति मोह था; इसलिये उन्होंने यत्नपूर्वक पतिदेवको उस यज्ञमें चलनेके लिये समझाया। जब किसी तरह उन्हें वहाँ ले जानेमें वे समर्थ न हो सकीं, तब स्वयं चञ्चल हो उठीं और पतिकी आज्ञा प्राप्त किये बिना ही दर्पवश पिताके घर चली आयीं। पतिके शापसे वहाँ उनका दर्प- भङ्ग हुआ। पिताने उनसे बाततक नहीं की। वाणीमात्रसे भी पुत्रीका सत्कार नहीं किया। इतना ही नहीं, उन्हें वहाँ पतिकी निन्दा भी सुननी पड़ी। उसे सुनकर स्वाभिमानवश सतीने अपने शरीरको त्याग दिया। प्रिये ! इस प्रकार सतीके दर्प-भङ्गका वृत्तान्त कहा गया। अब तुम उनके जन्मान्तर तथा दर्प- दलनकी कथा सुनो। सतीने शीघ्र ही गिरिराज हिमालयकी पत्नी मेनाके गर्भसे जन्म ग्रहण किया। शिवने प्रेमवश सतीकी चिताका भस्म और उनकी अस्थियाँ ग्रहण कीं। अस्थियोंकी तो माला बनायी और भस्मसे अङ्गरागका काम लिया। वे प्रेमवश बार-बार सतीको याद करते और उनके विरहमें इधर-उधर घूमते रहते थे। उधर मेनाने देवीको जन्म दिया। उनकी आकृति बड़ी ही मनोहर थी। विधाताकी सृष्टिमें गिरिराजनन्दिनीके लिये कहीं कोई उपमा नहीं थी। गुणोंकी तो वे जननी ही हैं; अतः सभी और सब प्रकारके सद्गुणोंको धारण करती हैं। समस्त देवपत्नियों उनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कला बढ़ती है, उसी तरह हिमालयके घरमें वे देवी दिनोंदिन बढ़ने लगीं। जब उन्होंने युवावस्थामें प्रवेश किया, तब उन जगदम्बाको सम्बोधित करके आकाशवाणीने कहा—'शिवे ! तुम कठोर तपस्याद्वारा भगवान् शिवको पति-रूपमें प्राप्त करो; क्योंकि तपस्याके बिना ईश्वरको पाना अथवा उनके अंशसे गर्भ धारण करना असम्भव है।' यह आकाशवाणी सुनकर यौवनके गर्वसे भरी हुई पार्वती हँसकर चुप हो रहीं। वह मन-ही-मन सोचने लगीं कि 'जो मेरे दूसरे जन्मकी अस्थि और भस्मको धारण करते हैं; वे इस जन्ममें मुझे सयानी हुई देख कैसे नहीं ग्रहण करेंगे। जो चतुर होकर भी मेरे शोकसे समूचे ब्रह्माण्डमें भटकते फिरे; वे ही मुझ परम सुन्दरीको अपनी आँखोंसे देख लेनेपर क्यों नहीं ग्रहण करेंगे ? जिन कृपानिधानने मेरे लिये दक्षयज्ञका विध्वंस कर डाला था; वे अपनी जन्म-जन्मकी पत्नी मुझ पार्वतीको क्यों नहीं ग्रहण करेंगे ? पूर्वजन्मसे ही जो जिसकी पत्नी है और जिसका जो पति है, उन दोनोंमें यहाँ भेद कैसे हो सकता है ? क्योंकि प्रारब्धको कोई पलट नहीं सकता।' अत्यन्त अभिमानके कारण अपनेको समस्त रूप और गुणोंका आधार मानकर साध्वी शिवाने तप नहीं किया। उन्होंने शिवको ईश्वर नहीं समझा। 'समस्त सुन्दरियोंमें मुझसे बढ़कर सुन्दरी दूसरी कोई नहीं है'—यह धारणा हृदयमें लेकर शिवादेवी गर्ववश तपस्यामें नहीं प्रवृत्त हुईं। वे यही सोचती थीं कि पुरुष अपनी स्त्रियोंके रूप, यौवन तथा वेश-भूषाका ग्राहक है। शिव मेरा नाम सुनते ही बिना तपस्याके मुझे ग्रहण कर लेंगे। मनमें यह विश्वास लेकर गिरिजा हिमवान्‌के घरमें रहती थीं और दिन-रात सखी-सहेलियोंके बीच खेल-कूदमें मतवाली रहा करती थीं। इसी समय शीघ्रतापूर्वक दूतने गिरिराजके भवनमें आकर दोनों हाथ जोड़ उनके सामने मधुर वाणीमें कहा। दूत बोला-शैलराज ! उठिये, उठिये। अक्षयवटके पास जाइये। वहाँ वृषभवाहन महादेवजी अपने गणोंके साथ पधारे हैं। महाराज ! आप भक्तिभावसे मस्तक झुका उन्हें मधुपर्क आदि देकर उन इन्द्रियातीत देवेश्वरका पूजन कीजिये।