भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 588, कुल 810 में से

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पृष्ठ 588

५७८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण दिव्य जलराशि ही देवनदी गङ्गाके नामसे प्रख्यात हुई। वह मुमुक्षुओंको मोक्ष और भक्तोंको हरि- भक्ति प्रदान करनेवाली है। उसका स्पर्श करके आयी हुई वायुके सम्पर्कसे भी पापियोंके करोड़ों जन्मोंके नानाविध पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। प्राणेश्वरि ! देवनदीके साक्षात् दर्शन तथा स्पर्शका क्या फल होगा—यह मैं भी नहीं जानता; फिर उसके जलमें स्नान करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यके विषयमें तो कहना ही क्या है ? उसकी महिमाका सम्यक् निरूपण असम्भव है। पृथ्वीपर 'पुष्कर' को सब तीर्थोंसे उत्तम बताया गया है। वेदोंने उसे सर्वश्रेष्ठ कहा है; परंतु वह भी इस (गङ्गा)-की सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है। राजा भगीरथ इस देवनदीको भूतलपर लाये थे, इसलिये यह 'भागीरथी' नामसे प्रसिद्ध हुई। सुरधुनी अपने स्रोतके अंशसे पृथ्वीपर आयी थी; अतः 'गां गता' इस व्युत्पत्तिके अनुसार उसका 'गङ्गा' नाम प्रसिद्ध हुआ। इसके जलपर क्रोध होनेके कारण महात्मा जह्नुने इस नदीको अपने जानुओं (घुटनों)-द्वारा ग्रहण कर लिया था। फिर उनकी कन्यारूपसे इसका प्राकट्य हुआ; अतः इसका दूसरा नाम 'जाह्नवी' है। वसुके अवतार भीष्म इसके गर्भसे उत्पन्न हुए थे, इस कारण यह 'भीष्मसू' (भीष्मजननी) कहलाती है। गङ्गा मेरी आज्ञासे तीन धाराओंद्वारा स्वर्ग, पृथ्वी तथा पातालमें गयी है; अतः 'त्रिपथगा' कही जाती है। इसकी प्रमुख धारा स्वर्गमें है। वहाँ इसे 'मन्दाकिनी' कहते हैं। स्वर्गमें इसका पाट एक योजन चौड़ा है और यह दस हजार योजनकी दूरीमें प्रवाहित होती है। इसका जल दूधके समान स्वच्छ एवं स्वादिष्ट है तथा इसमें सदा ऊँची-ऊँची लहरें उठती रहती हैं। वैकुण्ठसे यह ब्रह्मलोकमें और वहाँसे स्वर्गमें आयी है। स्वर्गसे चलकर हिमालयके शिखरपर होती हुई यह प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वीपर उतरी है। इसकी उस धाराका नाम 'अलकनन्दा' है। यह क्षार-समुद्रमें जाकर मिली है। इसकी जलराशि शुद्ध स्फटिकके समान स्वच्छ तथा अत्यन्त वेगवती है। यह पापियोंके पापरूपी सूखे काठको जलानेके लिये अग्निरूपिणी है। इसीने राजा सगरके पुत्रोंको निर्वाणमोक्ष प्रदान किया है। यह वैकुण्ठधामतक जानेके लिये श्रेष्ठ सोपान है। यदि मृत्युकालमें पहले पुण्यात्मा सत्पुरुषोंके चरणोंको धोकर उस चरणोदकको मुमूर्षु मनुष्यके मुखमें दिया जाय तो उसे गङ्गाजल पीनेका पुण्य होता है। ऐसे पुण्यात्मा सत्पुरुष गङ्गारूपी सोपानपर आरूढ़ हो निरामयपद (वैकुण्ठधाम)- को प्राप्त होते हैं। वे ब्रह्मलोकतकको लाँघकर विमानपर बैठे हुए निर्बाध गतिसे ऊपरके लोक (वैकुण्ठ)-में चले जाते हैं। यदि दैववश पूर्वकर्मके प्रभावसे पापी पुरुष गङ्गामें डूब जायँ तो वे शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने दिव्य वर्षोंतक भगवद्धाममें सानन्द निवास करते हैं। तदनन्तर उन्हें निश्चय ही अपने पाप-पुण्यका फल भोगना पड़ता है। परंतु वह भोग स्वल्पकालमें ही पूरा हो जाता है; तत्पश्चात् भारतवर्षमें पुण्यवानोंके घरमें जन्म ले निश्चल भक्ति पाकर वे भगवत्स्वरूप हो जाते हैं। जो शुद्धिके लिये यात्रा करके देवेश्वरी गङ्गामें नहानेके लिये जाता है, वह जितने पग चलता है, उतने वर्षोंतक अवश्य ही वैकुण्ठधाममें आनन्द भोगता है। यदि आनुषङ्गिकरूपसे भी गङ्गाको पाकर कोई पापयुक्त मनुष्य उसमें स्नान करता है तो वह उस समय सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यदि वह फिर पापमें लिप्त न हो तो निष्पाप ही रहता है। कलियुगमें पाँच हजार वर्षोंतक भारतवर्षमें गङ्गाकी साक्षात् स्थिति है। उसके विद्यमान होते हुए कलिका क्या प्रभाव रह सकता है ? कलिमें दस हजार वर्षोंतक मेरी प्रतिमाएँ तथा पुराण रहते हैं। उनके होते हुए वहाँ कलिका प्रभाव क्या हो सकता है ?

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