ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तत्पश्चात् वे भी आज्ञा पाकर सबसे आगे बैठे। उनसे श्रीहरिने समस्त ब्रह्माण्डोंके ब्रह्माओंका और उनके राज्यमें रहनेवाले देवताओंका क्रमशः कुशल-समाचार पूछा। उन सब ब्रह्माओंको देखकर अपनेको विष्णु-तुल्य माननेवाले चतुर्मुख ब्रह्माका घमंड चूर-चूर हो गया। इसके बाद श्रीहरिने विभिन्न ब्रह्माण्डोंमें रहनेवाले अन्यान्य ब्रह्माओंके भी दर्शन कराये। उन्हें देखकर चतुर्मुख ब्रह्मा मृतक-तुल्य हो गये। उस समय भगवान्ने कहा—‘मुझ नारायणके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने ही ब्रह्माण्ड और उनके उतने ही ब्रह्मा विद्यमान हैं।’ यह सुनकर वे सभी आगन्तुक ब्रह्मा नारायणको प्रणाम करके शीघ्र ही अपने-अपने स्थानको चले गये। चतुर्मुख ब्रह्माने अपनेको अत्यन्त छोटा तथा अल्प राज्यका अधिपति माना। लज्जासे उनका सिर झुक गया और वे भगवान् विष्णुके चरणोंमें पड़ गये। तब भगवान्ने उनसे पूछा—‘ब्रह्मन्! बोलो, इस समय तुमने स्वप्नकी भाँति यह क्या देखा है।’ उनका प्रश्न सुनकर ब्रह्मा बोले—‘प्रभो! भूत, वर्तमान और भविष्य—सारा जगत् आपकी मायासे ही उत्पन्न हुआ है।’ यों कह चतुर्भुज ब्रह्मा वैकुण्ठकी सभामें लज्जाका अनुभव करते हुए चुप हो गये। तब सर्वान्तर्यामी भगवान् श्रीहरिने उनके शाप-निवारणका उपाय किया।
(अध्याय ३१—३३)
गङ्गाकी उत्पत्ति तथा महिमा
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**प्रिये! इसी बीचमें भगवान् शंकर वहाँ उपस्थित हुए। उनके मुखपर मुस्कराहट थी। वे सारे अङ्गोंमें विभूति लगाये वृषभराज नन्दिकेश्वरकी पीठपर बैठे थे। व्याघ्रचर्मका वस्त्र, सर्पमय यज्ञोपवीत, सिरपर सुनहरे रंगकी जटाका भार, ललाटमें अर्धचन्द्र, हाथोंमें त्रिशूल, पट्टिश तथा उत्तम खट्वाङ्ग धारण किये, श्रेष्ठ रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित स्वर-यन्त्र लिये भगवान् शिव शीघ्र ही वाहनसे उतरे और भक्तिभावसे मस्तक झुका कमलाकान्तको प्रणाम करके उनके वामभागमें बैठे। फिर इन्द्र आदि समस्त देवता, मुनि, आदित्य, वसु, रुद्र, मनु, सिद्ध और चारण वहाँ पधारे। उन सबने पुरुषोत्तमकी स्तुति की। उस समय उनके सारे अङ्ग पुलकित हो रहे थे। फिर समस्त देवताओंने सिर झुकाकर भगवान् शिवको प्रणाम किया। तदनन्तर स्वर-यन्त्र लिये भगवान् शंकरने सुमधुर तालस्वरके साथ संगीत आरम्भ किया। प्रिये! उसमें हम दोनोंके गुणों तथा राससम्बन्धी सुन्दर पदोंका गान होने लगा।
मनको मोह लेनेवाले सामयिक राग,* कण्ठकी
* संगीतमें षड्ज आदि स्वरों, उनके वर्णों और अङ्गोंसे युक्त वह ध्वनि जो किसी विशिष्ट तालमें बैठायी हुई हो और जो मनोरञ्जनके लिये गायी जाती हो। संगीत-शास्त्रके भारतीय आचार्योंने छः राग माने हैं; परंतु इन