भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 574, कुल 810 में से

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पृष्ठ 574
५६४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मुखारविन्दसे राधिकाको सम्बोधित करके कहा।

**पार्वती बोलीं—**राधे! तुम सर्वेश्वर श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो। जगदम्बिके! तुम्हारा यह व्रत लोकशिक्षाके लिये है। तुम मायासे मानवरूपमें प्रकट हुई हो। सुन्दरि! क्या तुम गोलोकनाथ, गोलोक, श्रीशैल, विरजाके तटप्रान्त, श्रीरासमण्डल तथा दिव्य मनोहर वृन्दावनको कुछ याद करती हो? क्या तुम्हें प्रेमशास्त्रके विद्वान् तथा रतिचोर श्यामसुन्दरके उस चरित्रका किञ्चित् भी स्मरण होता है, जो नारियोंके चित्तको बरबस अपनी ओर खींच लेता है? तुम श्रीकृष्णके अर्द्धाङ्गसे प्रकट हुई हो; अतः उन्हींके समान तेजस्विनी हो। समस्त देवाङ्गनाएँ तुम्हारी अंशकलासे प्रकट हुई हैं; फिर तुम मानवी कैसे हो? तुम श्रीहरिके लिये प्राणस्वरूपा हो और स्वयं श्रीहरि तुम्हारे प्राण हैं। वेदमें तुम दोनोंका भेद नहीं बताया गया है; फिर तुम मानवी कैसे हो? पूर्वकालमें ब्रह्माजी साठ हजार वर्षोंतक तप करके भी तुम्हारे चरणकमलोंका दर्शन न पा सके; फिर तुम मानुषी कैसे हो? तुम तो साक्षात् देवी हो। श्रीकृष्णकी आज्ञासे गोपीका रूप धारण करके पृथ्वीपर पधारी हो; शान्ते! तुम मानवी स्त्री कैसे हो? मनुवंशमें उत्पन्न नृपश्रेष्ठ सुयज्ञ तुम्हारी ही कृपासे गोलोकमें गये थे; फिर तुम मानुषी कैसे हो? तुम्हारे मन्त्र और कवचके प्रभावसे ही भृगुवंशी परशुरामजीने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रिय-नरेशोंसे शून्य कर दिया था। ऐसी दशामें तुम्हें मानवी स्त्री कैसे कहा जा सकता है? परशुरामजीने भगवान् शंकरसे तुम्हारे मन्त्रको प्राप्त कर पुष्करतीर्थमें उसे सिद्ध किया और उसीके प्रभावसे वे कार्तवीर्य अर्जुनका संहार कर सके; फिर तुम मानुषी कैसे हो? उन्होंने अभिमानपूर्वक महात्मा गणेशका एक दाँत तोड़ दिया। वे केवल तुमसे ही भय मानते थे; फिर तुम मानवी स्त्री कैसे हो? जब मैं क्रोधसे उन्हें भस्म करनेको उद्यत हुई, तब हे ईश्वरि! मेरी प्रसन्नताके लिये तुमने स्वयं आकर उनकी रक्षा की; फिर तुम मानुषी कैसे हो? श्रीकृष्ण प्रत्येक कल्पमें तथा जन्म-जन्ममें तुम्हारे पति हैं। जगन्मातः! तुमने लोकहितके लिये ही यह व्रत किया है। अहो! श्रीदामके शापसे और भूमिका भार उतारनेके लिये पृथ्वीपर तुम्हारा निवास हुआ है; फिर तुम मानवी स्त्री कैसे हो? तुम जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाली देवी हो। कलावतीकी अयोनिजा पुत्री एवं पुण्यमयी हो; फिर तुम्हें साधारण मानुषी कैसे माना जा सकता है? तीन मास व्यतीत होनेपर जब मनोहर मधुमास (चैत्र) उपस्थित होगा, तब रात्रिके समय निर्जन, निर्मल एवं सुन्दर रासमण्डलमें वृन्दावनके भीतर श्रीहरिके साथ समस्त गोपिकाओंसहित तुम्हारी रासक्रीड़ा सानन्द सम्पन्न होगी। सती राधे! प्रत्येक कल्पमें भूतलपर श्रीहरिके साथ तुम्हारी रसमय लीला होगी, यह विधाताने ही लिख दिया है। इसे कौन रोक सकता है? सुन्दरी! श्रीहरिप्रिये! जैसे मैं महादेवजीकी सौभाग्यवती पत्नी हूँ, उसी प्रकार तुम श्रीकृष्णकी सौभाग्यशालिनी वल्लभा हो। जैसे दूधमें धवलता, अग्निमें दाहिका शक्ति, भूमिमें गन्ध और जलमें शीतलता है; उसी प्रकार श्रीकृष्णमें तुम्हारी स्थिति है। देवाङ्गना, मानवकन्या, गन्धर्वजातिकी स्त्री तथा राक्षसी—इनमेंसे कोई भी तुमसे बढ़कर सौभाग्यशालिनी न तो हुई है और न होगी ही। मेरे वरसे ब्रह्मा आदिके भी वन्दनीय, परात्पर एवं गुणातीत भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं तुम्हारे अधीन होंगे। पतिव्रते! ब्रह्मा, शेषनाग तथा शिव भी जिनकी आराधना करते हैं, जो ध्यानसे भी वशमें होनेवाले नहीं हैं तथा जिन्हें आराधनाद्वारा रिझा लेना समस्त योगियोंके लिये भी अत्यन्त कठिन है; वे ही भगवान् तुम्हारे अधीन रहेंगे। राधे! स्त्रीजातिमें तुम विशेष सौभाग्यशालिनी हो। तुमसे बढ़कर दूसरी कोई

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