भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 810 में से

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पृष्ठ 573

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६३

हैं, आप उन्हें बीज और फल दोनों प्रदान करती हैं, कोई भी आपका निर्वचन (निरूपण) नहीं कर सकता है, महामाये! आपको नमस्कार है। शिवे! आप शंकरसम्बन्धी सौभाग्यसे सम्पन्न हैं तथा सबको सौभाग्य देनेवाली हैं। देवि! श्रीहरि ही मेरे प्राणवल्लभ और सौभाग्य हैं; उन्हें मुझे दीजिये। आपको नमस्कार है। जो स्त्रियाँ व्रतकी समाप्तिके दिन इस स्तोत्रसे शिवादेवीकी स्तुति करके बड़ी भक्तिसे उन्हें मस्तक झुकाती हैं; वे साक्षात् श्रीहरिको पतिरूपमें प्राप्त करती हैं। इस लोकमें परात्पर परमेश्वरको पतिरूपमें पाकर कान्त-सुखका उपभोग करके अन्तमें दिव्य विमानपर आरूढ़ हो भगवान् श्रीकृष्णके समीप चली जाती हैं*।

समाप्तिके दिन गोपियोंसहित श्रीराधाने देवीकी वन्दना और स्तुति करके गौरी-व्रतको पूर्ण किया। एक ब्राह्मणको प्रसन्नतापूर्वक एक सहस्र गौएँ तथा सौ सुवर्णमुद्राएँ दक्षिणाके रूपमें देकर वे घर जानेको उद्यत हुईं। उन्होंने आदरपूर्वक एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराया, बाजे बजवाये और भिखमंगोंको धन बाँटा। इसी समय दुर्गतिनाशिनी दुर्गा वहाँ आकाशसे प्रकट हुईं, जो ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रही थीं। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी प्रभा फैल रही थी। वे सौ योगिनियोंके साथ थीं। सिंहसे जुते हुए रथपर बैठी तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थीं। उनके दस भुजाएँ थीं। उन्होंने रत्नसारमय उपकरणोंसे युक्त सुवर्णनिर्मित दिव्य रथसे उतरकर तुरंत ही श्रीराधाको हृदयसे लगा लिया। देवी दुर्गाको देखकर अन्य गोपकुमारियोंने भी प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम किया। दुर्गाने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा—'तुम सबका मनोरथ सिद्ध होगा।' इस प्रकार गोपिकाओंको वर दे उनसे सादर सम्भाषण कर देवीने मुस्कराते हुए


* जानक्युवाच— शक्तिस्वरूपे सर्वेषां सर्वाधारे गुणाश्रये। सदा शङ्करयुक्ते च पतिं देहि नमोऽस्तु ते॥
सृष्टिस्थित्यन्तरूपेण सृष्टिस्थित्यन्तरूपिणि। सृष्टिस्थित्यन्तबीजानां बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥
हे गौरि पतिमर्मज्ञे पतिव्रतपरायणे। पतिव्रते पतिरते पतिं देहि नमोऽस्तु ते॥
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये सर्वमङ्गलसंयुते। सर्वमङ्गलबीजे च नमस्ते सर्वमङ्गले॥
सर्वप्रिये सर्वबीजे सर्वाशुभविनाशिनि। सर्वेशे सर्वजनके नमस्ते शङ्करप्रिये॥
परमात्मस्वरूपे च नित्यरूपे सनातनि। साकारे च निराकारे सर्वरूपे नमोऽस्तु ते॥
क्षुत्तृष्णेच्छा दया श्रद्धा निद्रा तन्द्रा स्मृतिः क्षमा। एतास्तव कलाः सर्वा नारायणि नमोऽस्तु ते॥
लज्जा मेधा तुष्टिपुष्टिशान्तिसम्पत्तिवृद्धयः। एतास्तव कलाः सर्वाः सर्वरूपे नमोऽस्तु ते॥
दृष्टादृष्टस्वरूपे च तयोर्बीजफलप्रदे। सर्वानिर्वचनीये च महामाये नमोऽस्तु ते॥
शिवे शङ्करसौभाग्ययुक्ते सौभाग्यदायिनि। हरिं कान्तं च सौभाग्यं देहि देवि नमोऽस्तु ते॥
स्तोत्रेणानेन याः स्तुत्वा समाप्तिदिवसे शिवाम्। नमन्ति परया भक्त्या ता लभन्ति हरिं पतिम्॥
इह कान्तसुखं भुक्त्वा पतिं प्राप्य परात्परम्। दिव्यं स्यन्दनमारुह्य यान्त्यन्ते कृष्णसंनिधिम्॥
(२७।१७३—१८४)

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