ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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नीचे गिर गये हैं। उनका उद्धार करनेके लिये त्रेतायुगमें अयोध्यापुरीके भीतर श्रीहरिका आविर्भाव होगा। तुम भी शिशुरूप धारण करके मिथिलाको जाओ। वहाँ राजा जनक अयोनिजा कन्याके रूपमें तुम्हें पाकर यत्नपूर्वक तुम्हारा लालन-पालन करेंगे। वहाँ तुम्हारा नाम सीता होगा। श्रीराम भी मिथिलामें जाकर तुम्हारे साथ विवाह करेंगे। तुम प्रत्येक कल्पमें नारायणकी ही प्राणवल्लभा होओगी।
यों कह पार्वती वेदवतीको हृदयसे लगाकर अपने निवास-स्थानको लौट गयीं। साध्वी वेदवती मिथिलामें जाकर मायासे हलद्वारा भूमिपर की गयी रेखा (हराई)-में सुखपूर्वक स्थित हो गयीं। उस समय राजा जनकने देखा, एक नग्न बालिका आँख बंद किये भूमिपर पड़ी है। उसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान उद्दीप्त है तथा वह तेजस्विनी बालिका रो रही है। उसे देखते ही राजाने उठाकर गोदमें चिपका लिया। जब वे घरको लौटने लगे, उस समय वहीं उनके प्रति आकाशवाणी हुई—'राजन्! यह अयोनिजा कन्या साक्षात् लक्ष्मी है; इसे ग्रहण करो। स्वयं भगवान् नारायण तुम्हारे दामाद होंगे।' यह आकाशवाणी सुन कन्याको गोदमें लिये राजर्षि जनक घरको गये और प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने लालन-पालनके लिये उसे अपनी प्यारी रानीके हाथमें दे दिया। युवती होनेपर सती सीताने इस व्रतके प्रभावसे त्रिलोकीनाथ विष्णुके अवताररूप दशरथनन्दन श्रीरामको प्रियतम पतिके रूपमें प्राप्त कर लिया। महर्षि वसिष्ठने इस व्रतको पृथ्वीपर प्रकाशित किया तथा श्रीराधाने इस व्रतका अनुष्ठान करके श्रीकृष्णको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त किया। अन्यान्य गोपकुमारियोंने इस व्रतके प्रभावसे उनको पाया। नारद! इस प्रकार मैंने गौरी-व्रतकी कथा कही। जो कुमारी भारतवर्षमें इस व्रतका पालन करती है, उसे श्रीकृष्ण-तुल्य पतिकी प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं है।
भगवान् नारायण कहते हैं—इस प्रकार उन गोपकुमारियोंने एक मासतक व्रत किया। वे पूर्वोक्त स्तोत्रसे प्रतिदिन देवीकी स्तुति करती थीं। समाप्तिके दिन व्रत पूर्ण करके गोपियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने काण्व-शाखामें वर्णित उस स्तोत्रद्वारा परमेश्वरी पार्वतीका स्तवन किया, जिसके द्वारा स्तुति करके सत्यपरायणा सीताने शीघ्र ही कमल-नयन श्रीरामको प्रियतम पतिके रूपमें प्राप्त किया था। वह स्तोत्र यह है।
जानकी बोलीं—सबकी शक्तिस्वरूपे! शिवे! आप सम्पूर्ण जगत्की आधारभूता हैं। समस्त सद्गुणोंकी निधि हैं तथा सदा भगवान् शंकरके संयोग-सुखका अनुभव करनेवाली हैं; आपको नमस्कार है। आप मुझे सर्वश्रेष्ठ पति दीजिये। सृष्टि, पालन और संहार आपका रूप है। आप सृष्टि, पालन और संहाररूपिणी हैं। सृष्टि, पालन और संहारके जो बीज हैं, उनकी भी बीजरूपिणी हैं; आपको नमस्कार है। पतिके मर्मको जाननेवाली पतिव्रतपरायणे गौरि! पतिव्रते! पत्यनुरागिणि! मुझे पति दीजिये; आपको नमस्कार है। आप समस्त मङ्गलोंके लिये भी मङ्गलकारिणी हैं। सम्पूर्ण मङ्गलोंसे सम्पन्न हैं, सब प्रकारके मङ्गलोंकी बीजरूपा हैं; सर्वमङ्गले! आपको नमस्कार है। आप सबको प्रिय हैं, सबकी बीजरूपिणी हैं, समस्त अशुभोंका विनाश करनेवाली हैं, सबकी ईश्वरी तथा सर्वजननी हैं; शंकरप्रिये! आपको नमस्कार है। परमात्मस्वरूपे! नित्यरूपिणि! सनातनि! आप साकार और निराकार भी हैं; सर्वरूपे! आपको नमस्कार है। क्षुधा, तृष्णा, इच्छा, दया, श्रद्धा, निद्रा, तन्द्रा, स्मृति और क्षमा—ये सब आपकी कलाएँ हैं; नारायणि! आपको नमस्कार है। लज्जा, मेधा, तुष्टि, पुष्टि, शान्ति, सम्पत्ति और वृद्धि—ये सब भी आपकी ही कलाएँ हैं; सर्वरूपिणि! आपको नमस्कार है। दृष्ट और अदृष्ट दोनों आपके ही स्वरूप