भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६१

श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने अनेक रूप धारण करके स्थल-प्रदेशमें मधुर लीला-विलास किये। इसके बाद राधाके साथ सनातन पूर्णब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णने यमुनाजीके जलमें प्रवेश किया। श्रीकृष्णके जो अन्य मायामय स्वरूप थे, वे भी गोपियोंके साथ जलमें उतरे। यमुनाजीमें परम रसमयी क्रीड़ा करनेके पश्चात् सबने बाहर निकलकर सूखे वस्त्र पहने और माला आदि धारण कीं।

तदनन्तर सब गोप-किशोरियाँ पुनः रासमण्डलमें गयीं। वहाँके उद्यानमें सब ओर तरह-तरहके फूल खिले हुए थे। उन्हें देखकर परमेश्वरी राधाने कौतुकपूर्वक गोपियोंको पुष्पचयनके लिये आज्ञा दी। कुछ गोपियोंको उन्होंने माला गूँथनेके काममें लगाया। किन्हींको पानके बीड़े सुसज्जित करनेमें तथा किन्हींको चन्दन घिसनेमें लगा दिया। गोपियोंके दिये हुए पुष्पहार, चन्दन तथा पानको लेकर बाँके नेत्रोंसे देखती हुई सुन्दरी राधाने मन्द हास्यके साथ श्यामसुन्दरको प्रेमपूर्वक वे सब वस्तुएँ अर्पित कीं। फिर कुछ गोपियोंको श्रीकृष्णकी लीलाओंके गानमें और कुछको मृदङ्ग, मुरज आदि बाजे बजानेमें उन्होंने लगाया। इस प्रकार रासमें लीला-विलास करके राधा निर्जन वनमें श्रीहरिके साथ सर्वत्र मनोहर विहार करने लगीं। रमणीय पुष्पोद्यान, सरोवरोंके तट, सुरम्य गुफा, नदों और नदियोंके समीप, अत्यन्त निर्जन प्रदेश, पर्वतीय कन्दरा, नारियोंके मनोवाञ्छित स्थान, तैंतीस वन—भाण्डीरवन, रमणीय श्रीवन, कदम्बवन, तुलसीवन, कुन्दवन, चम्पकवन, निम्बवन, मधुवन, जम्बीरवन, नारिकेलवन, पूगवन, कदलीवन, बदरीवन, बिल्ववन, नारंगवन, अश्वत्थवन, वंशवन, दाडिमवन, मन्दारवन, तालवन, आम्रचूतवन, केतकीवन, अशोकवन, खर्जूरवन, आम्रातकवन, जम्बूवन, शालवन, कटकीवन, पद्मवन, जातिवन, न्यग्रोधवन, श्रीखण्डवन और विलक्षण केसरवन—इन सभी स्थानोंमें तीस दिन-राततक कौतूहलपूर्वक शृङ्गार किया, तथापि उनका मन तनिक भी तृप्त नहीं हुआ। अधिकाधिक इच्छा बढ़ती गयी, ठीक उसी तरह, जैसे घीकी धारा पड़नेसे अग्नि प्रज्वलित होती है। देवता, देवियाँ और मुनि, जो रास-दर्शनके लिये पधारे थे, अपने-अपने घरको लौट गये। उन सबने रास-रसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और आश्चर्यचकित हो हर्षका अनुभव करते हुए वे वहाँसे विदा हुए। बहुत-सी देवाङ्गनाओंने श्रीहरिके साथ प्रेम-मिलनकी लालसा लेकर भारतवर्षके श्रेष्ठ नरेशोंके घर-घरमें जन्म लिया।

(अध्याय २८)


श्रीराधाके साथ श्रीकृष्णका वन-विहार, वहाँ अष्टावक्रमुनिके द्वारा उनकी स्तुति तथा मुनिका शरीर त्यागकर भगवच्चरणोंमें लीन होना

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद ! तदनन्तर प्रेम-विह्वला गोपियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णने विविध भाँतिसे रास-क्रीड़ा की। गोपियाँ उन्मत्ता-सी हो गयीं। तब श्रीकृष्ण राधिकाको लेकर वहाँसे अन्तर्धान हो गये तथा अनेक सुरम्य वनों, पर्वतों, सरोवरों एवं नदी-तटोंपर ले जाकर राधिकाको आनन्द प्रदान करते रहे। श्रीराधाके साथ भ्रमण करते हुए श्यामसुन्दरने अपने सामने एक वट-वृक्ष देखा, जिसकी शाखाओंका अग्रभाग बहुत ही ऊँचा था। उस वृक्षका विस्तार भी बहुत अधिक था। उसके नीचे एक योजनतकका भूभाग छायासे घिरा हुआ था। केतकीवन भी वहाँसे निकट ही था। श्रीकृष्ण राधाके साथ वहीं बैठे थे। शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु उस स्थानको सुवासित कर रही थी। हर्षसे भरे हुए श्रीकृष्णने वहाँ राधासे चिरकालतक पुरातन एवं विचित्र रहस्यको