भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 584

५७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सारभूत वचन सुना रहा हूँ, जो तपस्वी ब्राह्मणोंके कुलधर्मके अनुकूल और सत्य है। जो मनुष्य अपनी पत्नीको त्यागकर परायी स्त्रीके साथ सम्बन्ध स्थापित करता है, वह जीते-जी मरा हुआ है। उसके यश, धन और आयुकी हानि होती है। भूतलपर जिसके यशका विस्तार नहीं हुआ, उसका जीवन निष्फल है। एक तपस्वीको उत्तम सम्पत्ति, राज्य और सुखसे क्या लेना है? मैं निष्काम और वृद्ध हूँ। मुझसे तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? माँ! तुम सुन्दरी हो; अतः किसी उत्तम वेश-भूषावाले सुन्दर तरुण पुरुषकी खोज करो।'

देवलजीकी यह बात सुनते ही रम्भाको क्रोध आ गया। उसने पुनः अपनी वही बात दोहरायी। तब मुनि उसे कुछ भी उत्तर न देकर पूर्ववत् ध्यानस्थ हो गये। यह देख रम्भाने रोषपूर्वक शाप देते हुए कहा—'कुटिलहृदय ब्राह्मण! तेरे सारे अवयव टेढ़े-मेढ़े हो जायँ। तेरा शरीर काजलके समान काला तथा रूप-यौवनसे शून्य हो जाय। आकार अत्यन्त विकृत तथा तीनों लोकोंमें निन्दित हो और तेरा पुरातन तप अवश्य ही शीघ्र नष्ट हो जाय।'

यह शाप प्राप्त होनेपर जब मुनिवर देवलने आँख खोलकर देखा तो सारा अङ्ग विकृत तथा पूर्वपुण्यसे वर्जित दिखायी दिया। तब वे अग्निकुण्ड तैयार करके शोकवश अपने प्राण त्याग देनेको उद्यत हुए। उस समय मैंने उन्हें दर्शन एवं वर दिया तथा दिव्य ज्ञान देकर उन्हें समझाया। प्रेमपूर्वक मेरे आश्वासन देनेपर वे शान्त हुए। उन महामुनिके आठों अङ्गोंको वक्र देख मैंने तत्काल ही कौतूहलवश उनका नाम अष्टावक्र* रख दिया। मेरे कहनेसे उन्होंने मलयाचलकी कन्दरामें आकर साठ हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। प्रिये! उस तपकी समाप्ति होनेपर मेरा वह भक्त मुझसे आ मिला है। मैंने स्वयं उसे अपनेमें मिला लिया है। प्रलयकालमें सबके नष्ट हो जानेपर भी मेरे भक्तका नाश नहीं होता। इस मुनिने आहार बिलकुल छोड़ दिया था। अतः दीर्घकालकी तपस्या एवं जठराग्निकी ज्वालासे इनके शरीरका भीतरी भाग जलकर भस्मरूप हो गया था। प्रिये! ये मुनि मेरे ही लिये मलयाचलकी कन्दरा छोड़कर यहाँ आये थे। इन अष्टावक्र (देवल)-से बढ़कर दूसरा कोई मेरा भक्त न तो हुआ है और न होगा। ब्रह्माजीके प्रपौत्र मुनिवर देवल ऐसे उत्तम तपस्वी थे; परंतु उस पुंश्चलीके शापसे उसी तरह हीन अवस्थाको पहुँच गये, जैसे पूर्वकालमें ब्रह्माजी अपूजनीय हो गये थे। महात्मा देवलका यह सारा गूढ़ रहस्य मैंने कह सुनाया, जो सुखद और पुण्यप्रद है। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? (अध्याय ३०)


* इस प्रसङ्गसे यह सूचित होता है कि असितपुत्र देवल (भी) कुछ कालतक 'अष्टावक्र' कहलाये। महाभारतके अनुसार 'अष्टावक्र' नामसे प्रसिद्ध एक दूसरे मुनि भी थे, जो जन्मसे ही वक्राङ्ग थे। उद्दालक-कन्या सुजाता उनकी माता थीं और महर्षि कहोड पिता। उन्होंने राजा जनकके दरबारमें शास्त्रार्थी पण्डित बन्दीको पराजित किया था। श्वेतकेतु उनके मामा थे। महर्षि वदान्यकी पुत्री सुप्रभाके साथ उनका विवाह हुआ था। समङ्गा नदीमें स्नान करनेसे इनके सब अङ्ग सीधे हो गये थे। महाभारत वनपर्वके अध्याय १३२ से लेकर १३४ तक उनका प्रसङ्ग है। अनुशासनपर्वके उन्तीसवें और इक्कीसवें अध्यायोंमें भी उनकी कथा आयी है।