भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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५८० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

रत्नेन्द्रसारनिर्मित हारसे उनका वक्षःस्थल अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देता था। वे अग्निशुद्ध सूक्ष्म वस्त्र धारण करके नूतन यौवनसे सम्पन्न एवं अत्यन्त कमनीय दृष्टिगोचर होती थीं। उनके दो हाथोंमें वीणा और पुस्तक तथा अन्य हाथोंमें व्याख्याकी मुद्रा देखी जाती थी। ब्रह्मलोकवासियोंने उनपर प्रिय वस्तुएँ निछावर करके परम मङ्गलमय उत्सव मनाया और ब्रह्मा तथा भारतीको वे सानन्द पुरीके भीतर ले गये।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिये! ब्रह्माण्डोंमें जिन-जिन लोगोंको अपनी शक्तिपर गर्व होता है, उनके उस गर्व या अभिमानको जानकर मैं ही उनपर शासन करता हूँ—उनके घमंडको चूर कर देता हूँ; क्योंकि मैं सबका आत्मा और परात्पर परमेश्वर हूँ; पहले ब्रह्माके गर्वको जो मैंने चूर्ण किया था, वह प्रसङ्ग तो तुमने सुन लिया। अब शंकर, पार्वती, इन्द्र, सूर्य, अग्नि, दुर्वासा तथा धन्वन्तरिके अभिमान-भञ्जनका प्रसङ्ग क्रमशः सुनाता हूँ, सुनो। प्रिये! छोटे-बड़े जो भी लोग हैं, उनके इस तरहके गर्वको मैं अवश्य चूर्ण कर देता हूँ। स्वयं शिव मेरे अंश हैं, जगत्के संहारक हैं और मेरे समान ही तेज, ज्ञान तथा गुणसे परिपूर्ण हैं। प्रिये! योगीलोग उनका ध्यान करते हैं। वे योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु हैं तथा ज्ञानानन्दस्वरूप हैं। उनकी कथा कहता हूँ, सुनो। साठ सहस्र युगोंतक दिन-रात तपस्या करके मेरी कलासे पूर्ण भगवान् शिव तप और तेजमें मेरे समान हो गये। सनातन तेजकी राशि हो गये। उनमें करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाश प्रकट हुआ। वे भक्तोंकी मनोवाञ्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षरूप हो गये। योगीन्द्रगण दीर्घकालतक उनके तेजका ध्यान करते-करते उसके भीतर अत्यन्त सुन्दर स्वरूपका साक्षात्कार करने लगते हैं। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल है। वे पाँच मुखोंसे सुशोभित होते हैं और उनके प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पाते हैं। हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश हैं। कटिभागमें व्याघ्रचर्ममय वस्त्र शोभा पाता है। वे श्वेत कमलके बीजकी मालासे स्वयं ही अपने-आपका—अपने मन्त्रोंका जप करते हैं। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी छटा छायी रहती है। वे परात्पर शिव मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट तथा सुनहरे रंगकी जटाओंका भार धारण करते हैं। उनका स्वरूप शान्त है। वे तीनों लोकोंके स्वामी तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर रहनेवाले हैं। अपने-आपको परमेश्वर मानकर समस्त सम्पत्तियोंके दाता होकर कल्पवृक्षके समान सबको सारी मनोवाञ्छित वस्तुएँ देते हैं। जो जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसे वही वर देकर वे समस्त वरोंके स्वामी हो गये हैं। इस प्रकार स्वात्माराम शिव अपनी ही लीलासे अभिमानको अपनाकर गर्वयुक्त हो गये।

एक समयकी बात है। वृक नामक दैत्यने शिवके केदारतीर्थमें एक वर्षतक दिन-रात कठोर तपस्या की। कृपानिधान शिव प्रतिदिन कृपापूर्वक अभीष्ट वर देनेके लिये उसके पास जाते थे; परंतु वह असुर किसी दिन भी वर नहीं ग्रहण करता था; वर्ष पूर्ण होनेपर भगवान् शंकर निरन्तर उसके सामने उपस्थित रहने लगे। वे भक्ति-पाशसे बँधकर वर देनेके लिये उद्यत हो क्षणभर भी वहाँसे अन्यत्र न जा सके। सम्पूर्ण ऐश्वर्य, समस्त सिद्धि, भोग, मोक्ष तथा श्रीहरिका पद—यह सब कुछ भगवान् शूलपाणि देना चाहते थे; परंतु उस दैत्यने कुछ भी ग्रहण नहीं किया। वह केवल उनके चरणकमलोंका ध्यान करता रहा। जब ध्यान टूटा, तब उस दैत्यराजने अपने सामने साक्षात् शिवको देखा, जो सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता हैं। उनकी ही मायासे प्रेरित हो वृकने भक्तिपूर्वक यह वर माँगा कि 'प्रभो! मैं जिसके माथेपर हाथ रख दूँ, वह जलकर भस्म हो