भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 612

६०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण जो एक महान् पुरुष थे। उनका काल व्यतीत थे। नृपश्रेष्ठ मङ्गलारण्यके कोई पुत्र नहीं था; अतः हो जानेपर उत्तम मनुका राज्य आया। उत्तमके वे तपस्याके लिये पुष्करमें गये। वहाँ दीर्घकालतक भी चले जानेपर धर्मात्मा तामस मनुके पदपर तप करके महेश्वरसे वर पाकर वे घर आये। वहाँ प्रतिष्ठित हुए। उनके बाद ज्ञानिशिरोमणि रैवतका उन्हें अनरण्य नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जो भगवान् मन्वन्तर आया। तत्पश्चात् छठे चाक्षुष मनु और विष्णुका भक्त और जितेन्द्रिय था। उस पुत्रको सातवें श्राद्धदेव मनु उस पदके अधिकारी हुए राज्य देकर मङ्गलारण्य तपस्याके लिये वनमें चले हैं। आठवें मनुका नाम सावर्णि समझना चाहिये, गये। नृपश्रेष्ठ अनरण्य सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका जो सूर्यके ज्येष्ठ पुत्र हैं। वे ही पूर्वजन्ममें भूतलपर पालन करने लगे; उन्होंने भृगुजीको पुरोहित चैत्रवंशी राजा सुरथके नामसे प्रसिद्ध थे। नवें बनाकर सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया; परंतु इन्द्रपदको मनुका नाम दक्षसावर्णि और दसवेंका ब्रह्मसावर्णि नश्वर और अत्यन्त तुच्छ मानकर उन्होंने उसे ग्रहण है। ग्यारहवें श्रेष्ठ मनुको धर्मसावर्णि कहते हैं। नहीं किया। उन शुद्धबुद्धिवाले नरेशने अपने तत्पश्चात् रुद्रसावर्णिका मन्वन्तर आता है। रुद्रसावर्णि प्रज्वलित तेजसे इन्द्र, बलि तथा समस्त दानवेन्द्रोंको भगवान् शिवके भक्त और जितेन्द्रिय थे। उनके लीलापूर्वक जीत लिया। बाद क्रमशः देवसावर्णि और इन्द्रसावर्णि तेरहवें हिमालय ! उन महाराजके सौ पुत्र और एक तथा चौदहवें मन्वन्तरोंके अधिकारी हुए हैं। सुन्दरी कन्या हुई, जो लक्ष्मीके समान लावण्यमयी भैया ! इस प्रकार मैंने तुम्हें चौदह मनुओंका थी। उसका नाम पद्मा रखा गया था। वह पिताके परिचय दिया। इन सबके व्यतीत हो जानेपर घरमें रहकर धीरे-धीरे युवावस्थामें प्रविष्ट हुई। ब्रह्माजीका एक दिन पूरा होता है। अब तुम तब महाराजने वरकी खोजके लिये दूत भेजा। इन्द्रसावर्णिका सारा वृत्तान्त मुझसे सुनो। एक दिन अपने आश्रमको जानेके लिये उत्सुक इन्द्रसावर्णि सब मनुओंमें श्रेष्ठ, धर्मात्मा तथा हुए पिप्पलाद मुनिने तपस्याके निर्जन स्थानमें एक गदाधारी भगवान् विष्णुके अनन्य भक्त थे। उन्होंने गन्धर्वको देखा, जो स्त्रियोंसे घिरा था। उसका इकहत्तर युगोंतक धर्मपूर्वक राज्य किया। इसके चित्त शृङ्गाररसके समुद्रमें डूबा हुआ था। कामसे बाद वे अपने पुत्र सुरेन्द्रको राज्य देकर तपस्याके अत्यन्त मतवाले हुए उस गन्धर्वको दिन-रातका लिये वनमें चले गये। सुरेन्द्रका पुत्र महाबली भान नहीं होता था। उसे देखकर मुनिवर श्रीमान् श्रीनिकेत हुआ। उसका पुत्र महायोगी पिप्पलादके मनमें कामभावका उदय हुआ। पुरीषतरु और उसका पुत्र अत्यन्त तेजस्वी उनका चित्त तपस्यासे विचलित हो गया और वे गोकामुख हुआ। गोकामुखके वृद्धश्रवा, वृद्धश्रवाके पत्नी-प्राप्तिका उपाय सोचने लगे। एक दिन भानु, भानुके पुण्डरीक, पुण्डरीकके जिह्वल, पुष्पभद्रा नदीमें स्नानके लिये जाते हुए मुनीश्वर जिह्वलके शृङ्गी, शृङ्गीके भीम और भीमके पुत्र पिप्पलादने युवती पद्माको देखा, जो पद्मा यशश्चन्द्र हुए; जिन्होंने अपने यशसे चन्द्रमाको (लक्ष्मी)-के समान मनोरम जान पड़ती थी। जीत लिया था। संतपुरुष तथा देवतालोग सदा ही मुनिने आसपास खड़े हुए लोगोंसे पूछा - 'यह उनकी निर्मल कीर्तिका गान करते हैं। उनका पुत्र कन्या कौन है?' लोगोंने बताया - 'ये महाराज वरेण्य और वरेण्यका पुत्र पुरारण्य हुआ। पुरारण्यके अनरण्यकी पुत्री हैं।' मुनिने स्नान करके अपने धार्मिक पुत्रका नाम धरारण्य था। धरारण्यके पुत्र इष्टदेव राधावल्लभका पूजन किया और कामनापूर्वक मङ्गलारण्य हुए, जो ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और तपस्वी भिक्षा माँगनेके लिये वे अनरण्यकी सभामें गये।