भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 614
६०४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सतीका शाप सुनकर देवेश्वर धर्म काँपने लगे और राजाका रूप छोड़ अपनी मूर्ति धारण करके उससे बोले।

धर्मने कहा—मातः ! आप मुझे धर्मज्ञोंके गुरुका भी गुरु धर्म समझिये। पतिव्रते ! मैं सदा परायी स्त्रीके प्रति माताका ही भाव रखता हूँ। मैं आपके आन्तरिक भावको समझनेके लिये ही आया था। यद्यपि आप-जैसी सतियोंका मन कैसा होता है, यह मैं जानता था; तथापि दैवसे प्रेरित होकर परीक्षा करनेके लिये चला आया। साध्वि ! आपने जो मेरा दमन किया है, वह नीतिके विरुद्ध नहीं है; सर्वथा उचित ही है; क्योंकि कुमार्गपर चलनेवालोंके लिये दण्डका विधान साक्षात् परमेश्वर श्रीकृष्णने ही किया है। जो धर्मको भी स्वधर्मका ज्ञान कराने और कालकी भी कलना (गणना) तथा स्रष्टाकी भी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो समयपर संहर्ताका भी संहार करनेकी शक्ति रखते हैं और अनायास ही स्रष्टाकी भी सृष्टि कर सकते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो शत्रुको भी मित्र बना सकते हैं, कलहको भी उत्तम प्रेममें परिणत कर सकते हैं तथा सृष्टि और विनाशकी भी क्षमता रखते हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो सबको शाप, सुख, दुःख, वर, सम्पत्ति और विपत्ति भी देनेमें समर्थ हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जिन्होंने प्रकृतिको प्रकट किया है, महाविष्णु तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर आदिको उत्पन्न किया है; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जिन्होंने दूधको श्वेत, जलको शीतल और अग्निको दाहिका शक्तिसे सम्पन्न बनाया है; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो अत्यन्त तेजःपुञ्जसे प्रकट होते हैं, जिनकी मूर्ति तेजोमयी है तथा जो गुणोंसे श्रेष्ठ एवं निर्गुण हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है और जो सर्वरूप, सर्वबीजस्वरूप, सबके अन्तरात्मा तथा समस्त जीवोंके लिये बन्धुस्वरूप हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है।

यों कहकर जगद्गुरु धर्म पद्माके सामने खड़े हो गये। शैलराज! धर्मका परिचय पाकर वह साध्वी सहसा बोल उठी।

पद्माने कहा—भगवन् ! क्या आप ही सबके समस्त कर्मोंके साक्षी, सबके भीतर रहनेवाले, सर्वात्मा, सर्वज्ञ तथा सर्वतत्त्ववेत्ता धर्म हैं? फिर मेरे मनको जाननेके लिये मुझ दासीकी विडम्बना क्यों करते हैं? धर्मदेव ! आपके प्रति मैंने जो कुछ किया है, वह मेरा अपराध है। प्रभो ! मैंने स्त्री-स्वभाववश आपको न जाननेके कारण क्रोधपूर्वक शाप दे दिया है। उस शापकी क्या व्यवस्था होगी; यही इस समय मेरा चिन्ताका विषय है। आकाश, सम्पूर्ण दिशाएँ और वायु भी यदि नष्ट हो जायँ तो भी पतिव्रताका शाप कभी नष्ट नहीं हो सकता*। मेरे शापसे यदि आप नष्ट हो जाते हैं तो सम्पूर्ण सृष्टिका ही नाश हो जायगा। यह सोचकर मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही हूँ; तथापि आपसे कहती हूँ। देवेश्वर! जैसे पूर्णिमाको चन्द्रमा पूर्ण होते हैं, उसी प्रकार सत्ययुगमें आप चारों चरणोंसे परिपूर्ण रहेंगे। उस युगमें सर्वत्र और सर्वदा दिन-रात आप विराजमान होंगे। किंतु भगवन् ! त्रेतायुग आनेपर आपके एक चरणका नाश हो जायगा। प्रभो! द्वापरमें दो पैर क्षीण होंगे और कलियुगमें आपका तीसरा पैर भी नष्ट हो जायगा। कलिके अन्तमें आपका चौथा चरण भी छिप जायगा। फिर सत्ययुग आनेपर आप चारों चरणोंसे परिपूर्ण हो जायँगे। सत्ययुगमें आप सर्वव्यापी होंगे और उससे भिन्न युगोंमें भी कहीं-कहीं पूर्णरूपमें विद्यमान रहेंगे। प्रभो! जहाँ आपका स्थान या


*आकाशोऽसौ दिशः सर्वा यदि नश्यन्ति वायवः । तथापि साध्वीशापस्तु न नश्यति कदाचन ॥
(४२।३४)