भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 615

·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६०५

आधार होगा, उसे बताती हूँ, सुनिये।

सम्पूर्ण वैष्णव, यति, ब्रह्मचारी, पतिव्रता स्त्री, ज्ञानी पुरुष, वानप्रस्थ, भिक्षु (संन्यासी), धर्मशील राजा, साधु-संत, श्रेष्ठ वैश्यजाति तथा सत्पुरुषोंके संसर्गमें रहनेवाले द्विज, सेवक, शूद्र— इन सबमें आप सदा पूर्णरूपसे विराजमान रहेंगे। युग-युगमें जहाँ भी पुण्यात्मा पुरुष होंगे, वे आपके आधार रहेंगे। पीपल, वट, बिल्व, तुलसी, चन्दन—इन वृक्षोंपर; दीक्षा, परीक्षा, शपथ, गोशाला और गोपद भूमियोंमें; विवाहमें, फूलोंमें, देववृक्षोंमें, देवालयोंमें, तीर्थोंमें तथा साधु पुरुषोंके गृहोंमें आपका सदा निवास होगा। वेद-वेदाङ्गोंके श्रवणकालमें, जलमें, सभाओंमें, श्रीकृष्णके नाम और गुणोंके कीर्तन, श्रवण तथा गानके स्थानोंमें; व्रत, पूजा, तप, न्याय, यज्ञ एवं साक्षीके स्थानोंमें; गोशालाओंमें तथा गौओंमें विद्यमान रहकर आप अपनेको पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित देखेंगे। धर्म! उन स्थानोंमें आप क्षीण नहीं होंगे। इनसे भिन्न स्थानोंमें आपकी कृशता देखी जायगी। जो स्थान आपके लिये अगम्य हैं; उनका वर्णन सुनिये। सम्पूर्ण व्यभिचारिणियोंमें, नरघाती मनुष्योंके घरोंमें, नरहत्या करनेवाले नीच पुरुषोंमें, मूर्ख और दुष्टोंमें, देवता, गुरु, ब्राह्मण, इष्टदेव तथा पालनीय मनुष्योंके धनका अपहरण करनेवालोंमें; दुष्टों, धूर्तों और चोरोंमें, रति-स्थानोंमें; जूआ, मदिरापान और कलहके स्थानोंमें; शालग्राम, साधु, तीर्थ और पुराणोंसे रहित स्थलोंमें; डाकुओंके स्नेहमें, वाद-विवादमें, ताड़की छायामें, गर्वीले मनुष्योंमें, तलवारसे जीविका चलानेवाले तथा स्याहीसे जीवन-निर्वाह करनेवाले, देवालयोंमें पूजाकी वृत्तिसे जीनेवाले तथा ग्राम-पुरोहितोंमें; बैल जोतनेवालों, सुनारों और जीव-हिंसासे जीविका चलानेवालोंमें; भर्तृनिन्दित नारियों तथा नारीके वशमें रहनेवाले पुरुषोंमें; दीक्षा, संध्या तथा विष्णुभक्तिसे हीन द्विजोंमें; अपनी पुत्री तथा पत्नी बेचनेवालोंमें; शालग्राम और देवमूर्तियोंका विक्रय करनेवालोंमें; मित्रद्रोही, कृतघ्न, सत्यनाशक तथा विश्वासघातियोंमें; शरणागतकी रक्षासे दूर रहनेवालों तथा शरणमें आये हुए लोगोंका नाश करनेवालोंमें; सदा झूठ बोलनेवाले, सीमाका अपहरण करनेवाले, काम, क्रोध और लोभवश झूठी गवाही देनेवाले, पुण्यकर्महीन तथा पुण्यकर्मके विरोधी मनुष्योंमें आप नहीं रहेंगे। प्रभो! इन निन्दनीय स्थानोंमें रहनेका आपको अधिकार नहीं होगा। ऐसी व्यवस्था होनेसे मेरी बात भी सच्ची हो जायगी। तात! अब मैं पतिसेवाके लिये जाऊँगी। आप भी अपने घरको पधारिये।

ऐसी बातें कहनेवाली पद्माके वचन सुनकर ब्रह्मपुत्र श्रीमान् धर्मका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठा। वे उस पतिव्रतासे अत्यन्त विनयपूर्वक बोले।

धर्मने कहा—मेरी रक्षा करनेवाली देवि! तुम धन्य हो। पतिपरायणा हो। तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। मैं तुम्हें वर देता हूँ; ग्रहण करो। बेटी! तुम्हारे पति युवावस्थासे सम्पन्न तथा रतिकर्ममें समर्थ हों। साध्वि! वे रूपवान् और गुणवान् हों। उनका यौवन सदा ही स्थिर रहे। वत्से! तुम भी उत्तम ऐश्वर्यसे युक्त एवं स्थिरयौवना हो जाओ। तुम्हारे पति मार्कण्डेयके बाद दूसरे चिरंजीवी पुरुष हों। वे कुबेरसे भी धनी और इन्द्रसे भी बढ़कर ऐश्वर्यवान् हों। शिवके समान विष्णुभक्त तथा कपिलके बाद उन्हींकी श्रेणीके सिद्ध हों। तुम जीवनभर पतिके सौभाग्यसे सम्पन्न बनी रहो। साध्वि! तुम्हारे घर कुबेरके भवनसे भी अधिक सुन्दर हों। तुम अपने पतिसे भी अधिक गुणवान् और चिरंजीवी दस पुत्रोंकी माता बनोगी; इसमें संशय नहीं है।

शैलराज! यों कहकर धर्मराज चुपचाप खड़े हो गये। पद्मा उनकी परिक्रमा और प्रणाम करके अपने घरको चली गयी। धर्म भी उसे आशीर्वाद दे अपने धामको गये और प्रत्येक सभामें