भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 627

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१७ प्रकृतिने इन्द्रको शाप दे दिया। इसीलिये उन्हें अपने गुरुकी ओरसे भी अत्यन्त क्रोधपूर्वक शाप मिला। एक दिन इन्द्र अपनी सभामें बैठे थे। प्रकृतिके शापसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी; अतः वे गुरुको आते देखकर भी न तो उठे और न प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम ही किया। यह देख बृहस्पतिजी क्रोधसे युक्त हो उस सभामें नहीं बैठे, उलटे पाँव घर लौट आये। वहाँ भी वे ताराके निकट नहीं ठहरे, तपस्याके लिये वनमें चले गये। उन्होंने मन-ही-मन दुःखी होकर कहा—'इन्द्रकी सम्पत्ति चली जाय।' तदनन्तर इन्द्रको सुबुद्धि प्राप्त हुई और वे बोले—'मेरे स्वामी यहाँसे कहाँ चले गये।' यों कहकर वे वेगपूर्वक सिंहासनसे उठे और ताराके पास गये। वहाँ उन्होंने भक्तिभावसे मस्तक झुका दोनों हाथ जोड़कर माता ताराको प्रणाम किया और सारी बातें बतायीं। फिर वे उच्चस्वरसे बारंबार रोदन करने लगे। पुत्रको रोते देख माता तारा भी बहुत रोयीं और बोलीं—'बेटा! तू घर जा। इस समय तुझे गुरुदेवके दर्शन नहीं होंगे। जब दुर्दिनका अन्त होगा, तभी तुझे गुरुजी मिलेंगे और उनकी कृपासे पुनः लक्ष्मीकी प्राप्ति होगी। मूढ़! तेरा अन्तःकरण दूषित है; अतः अब अपने कर्मोंका फल भोग। दुर्दिनमें अपने गुरुपर दोषारोपण करता है और अच्छे दिनोंमें अपने- आपको ही संतुष्ट करनेमें लगा रहता है। (गुरुकी परवा नहीं करता।) इन्द्र! सुदिन और दुर्दिन ही सुख और दुःखके कारण हैं।' यों कहकर पतिव्रता तारादेवी चुप हो गयीं। तदनन्तर इन्द्र वहाँसे लौट आये और एक दिन मन्दाकिनीके तटपर स्नानके लिये गये। वहाँ उन्होंने स्नान करती हुई गौतमपत्नी अहल्याको देखा। इन्द्रकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी। उन्होंने गौतमका रूप धारण करके अहल्याका शील भङ्ग कर दिया। इसी बीच गौतमजी भी वहाँ आ गये। इन्द्रने भयभीत होकर मुनिके चरण पकड़ लिये। तब गौतमजीने कुपित होकर उनसे कहा। गौतम बोले—इन्द्र! तुझे धिक्कार है। तू देवताओंमें श्रेष्ठ समझा जाता है। कश्यपजीका पुत्र है; ज्ञानी है और जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीका प्रपौत्र है तो भी तेरी ऐसी बुद्धि कैसे हो गयी? जिसके नाना साक्षात् प्रजापति दक्ष हैं और माता पतिव्रता अदिति देवी हैं, उसका इतना पतन आश्चर्यकी बात है! तू वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी कहलाता है; किंतु कर्मसे योनि-लम्पट है; अतः तेरे शरीरमें एक सहस्र योनियाँ प्रकट हो जायँ । पूरे एक वर्षतक तुझे सदा योनिकी ही दुर्गन्ध प्राप्त होती रहेगी। तत्पश्चात् सूर्यकी आराधना करनेपर तेरे शरीरकी योनियाँ नेत्रोंके रूपमें परिणत हो जायँगी। मेरे शाप और गुरुके क्रोधसे इस समय तू राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो जा। ओ मूढ़! तेरे गुरु बड़े तेजस्वी और मेरे अत्यन्त प्रेमी बन्धु हैं। हम दोनों बन्धुओंमें फूट न पड़ जाय; इस भयसे तेरे गुरुका ही खयाल करके मैंने इस समय तेरे प्राण नहीं लिये हैं। तदनन्तर पैरोंमें पड़ी हुई अहल्याको लक्ष्य करके मुनिवर गौतमने कहा—'प्रिये ! अब तू वनमें जा अपने शरीरको पत्थर बनाकर चिरकाल- तक उसी अवस्थामें रह। इस बातको मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तेरे मनमें कोई कामना नहीं थी। इन्द्रने स्वयं आसक्त होकर तेरे साथ छल किया है।' स्वामीकी ऐसी आज्ञा होनेपर अहल्या बहुत डर गयी और 'हा नाथ ! हा नाथ !' पुकारती तथा रोती हुई वनमें चली गयी। साठ हजार वर्षोंतक कर्मफलका भोग करनेके बाद मुनिप्रिया अहल्या श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका स्पर्श पाकर तत्काल शुद्ध हो गयी। फिर वह अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके गौतमजीके पास गयी। मुनिने सुन्दरी अहल्याको पाकर प्रसन्नताका अनुभव किया।