भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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आभूषणोंसे विभूषित आठ वर्षकी कुमारी कन्या जिसपर संतुष्ट हो जाती है और जिस पुण्यात्माको पुस्तक देती है; वह विश्वविख्यात कवीश्वर एवं पण्डितराज होता है। जिसे स्वप्नमें माताकी भाँति वह पढ़ाती है; वह सरस्वती-पुत्र होता है और अपने समयका सबसे बड़ा पण्डित माना जाता है। यदि विद्वान् ब्राह्मण किसीको पिताकी भाँति यत्नपूर्वक पढ़ावे या प्रसन्नतापूर्वक पुस्तक दे तो वह भी उसीके समान विद्वान् होता है। जो स्वप्नमें मार्गपर या जहाँ कहीं भी पड़ी हुई पुस्तक पाता है; वह भूतलपर विख्यात एवं यशस्वी पण्डित होता है। जिसे ब्राह्मण-ब्राह्मणी स्वप्नमें महामन्त्र दें; वह पुरुष विद्वान्, धनवान् और गुणवान् होता है। ब्राह्मण स्वप्नमें जिसे मन्त्र अथवा शिलामयी प्रतिमा देता है; उसे मन्त्रसिद्धि प्राप्त होती है। यदि ब्राह्मण स्वप्नमें ब्राह्मणसमूहका दर्शन एवं वन्दन करके आशीर्वाद पाता है तो वह राजाधिराज अथवा महान् कवि एवं पण्डित होता है। स्वप्नमें ब्राह्मण जिसे संतुष्ट होकर श्वेत धान्ययुक्त भूमि देता है; वह राजा होता है। ब्राह्मण जिसे स्वप्नमें रथपर बिठाकर नाना प्रकारके स्वर्ग दिखाता है; वह चिरंजीवी होता है तथा उसकी आयु एवं सम्पत्तिकी निश्चय ही वृद्धि होती है। सपनेमें संतुष्ट ब्राह्मण जिस ब्राह्मणको अपनी कन्या देता है; वह सदा धनाढ्य राजा होता है। स्वप्नमें सरोवर, समुद्र, नदी, नद, श्वेत सर्प और श्वेत पर्वतका दर्शन करनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। जो स्वप्नमें अपनेको मरा हुआ देखता है, वह चिरंजीवी होता है। रोगी देखनेपर नीरोग होता है और सुखी देखनेपर निश्चय ही दुःखी होता है। दिव्य नारी जिससे स्वप्नमें कहती है कि आप मेरे स्वामी हैं और वह उस स्वप्नको देखकर तत्काल जाग उठता है तो अवश्य राजा होता है। स्वप्नमें कालिकाका दर्शन करके और स्फटिककी माला, इन्द्र-धनुष एवं वज्रको पाकर मनुष्य अवश्य ही प्रतिष्ठाका भागी होता है। स्वप्नमें ब्राह्मण जिससे कहे कि तुम मेरे दास हो जाओ, वह मेरी दास्यभक्ति पाकर वैष्णव हो जाता है। स्वप्नावस्थामें ब्राह्मण शिव और विष्णुका स्वरूप है। ब्राह्मणी लक्ष्मी एवं पार्वतीका प्रतीक है तथा श्वेतवर्णा स्त्री वेदमाता सावित्री, गङ्गा एवं सरस्वतीका रूप है। ग्वालिनका वेष धारण करनेवाली बालिका मेरी राधिका है और बालक बाल-गोपालका स्वरूप है। स्वप्नविज्ञानके जाननेवाले विद्वानोंने इस रहस्यको प्रकाशित किया है। पिताजी ! यह मैंने पुण्यदायक उत्तम स्वप्नोंका वर्णन किया है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ?

(अध्याय ७७)


श्रीकृष्णके द्वारा नन्दको आध्यात्मिक ज्ञानका उपदेश, बाईस प्रकारकी सिद्धि, सिद्धमन्त्र तथा अदर्शनीय वस्तुओंका वर्णन

नन्दजी बोले—जगन्नाथ श्रीकृष्ण ! मैंने अच्छे स्वप्नोंका वर्णन सुना। यह वेदोंका सारभाग तथा लौकिक-वैदिक नीतिका सारतत्त्व है। वत्स ! अब मैं उन स्वप्नोंको सुनना चाहता हूँ, जिन्हें देखनेसे पाप होता है। अथवा जिस कर्मके करनेसे पाप होता है, उसका वर्णन करो। वेदका अनुसरण करनेवाले संतस मनुष्य तुम्हारे मुखसे वेद-शास्त्रोंकी बातें सुनना चाहते हैं; क्योंकि तुम वेदोंके जनक हो और वैदिक सत्पुरुषों, ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों तथा तीनों लोकोंके भी जन्मदाता हो। वत्स ! अपने वियोगसे तुमने मेरे हृदयमें दाह उत्पन्न कर दिया है; किंतु इस समय तुम्हारे मुखारविन्दसे जो प्रमाणभूत वचनामृत सुननेको मिला है, उससे मेरा तन, मन अभिषिक्त

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