ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७३५
पधारे। उन्हें आया देखकर वसुदेवजीने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर सबकी चरण-वन्दना की।
इसी समय अपने वाहन हंसपर सवार हो प्रसन्नमुखवाले ब्रह्मा, रत्ननिर्मित विमानपर आरूढ़ हो पार्वतीसहित शंकर, स्वयं नन्दी, महाकाल, वीरभद्र, सुभद्रक, मणिभद्र, पारिभद्र, कार्तिकेय, गणेश्वर, गजराज ऐरावतपर बैठे हुए महेन्द्र, धर्म, चन्द्रमा, सूर्य, कुबेर, वरुण, पवन, अग्नि, संयमनीपुरीके स्वामी यम, जयन्त, नलकूबर, सभी ग्रह, आठों वसु, गणोंसहित ग्यारहों रुद्र, बारहों आदित्य, शेषनाग तथा अनेकानेक देवगण भी आये। वसुदेवजीने भक्तिपूर्वक भूमिपर सिर रखकर उन सबकी वन्दना की और भक्तिवश मस्तक झुकाकर परम भक्तिके साथ उन ऋषिगणों, देवेन्द्रों तथा देवगणोंका स्तवन आरम्भ किया। उस समय उनका शरीर हर्षसे पुलकायमान हो रहा था।
वसुदेवजी बोले—जो परब्रह्म, परम धाम, परमेश्वर, परात्पर, लोकोंके प्रतिपालक, वेदोंके उत्पादक, सृष्टिकर्ता, सृष्टिके कारण और सनातन देव हैं; वे स्वयं ब्रह्मा, जो देवताओं, मुनीन्द्रों और सिद्धेन्द्रोंके गुरुके गुरु हैं, स्वप्नमें भी जिनके चरणकमलका क्षणमात्रके लिये दर्शन मिलना परम दुर्लभ है, जिनके स्मरणमात्रसे सभी अनिष्ट दूर भाग जाते हैं, वे भगवान् शिव; जिनके स्मरणसे मनुष्य सम्पूर्ण संकटोंसे पार होकर कल्याणका भागी हो जाता है, सर्वप्रथम जिनकी पूजा होती है, जो देवताओंके अगुआ और श्रेष्ठ हैं, कलशोंपर भक्तिपूर्वक मन्त्रोंद्वारा जिनका आवाहन करनेसे मङ्गल होता है, जो विघ्नोंके विनाशक हैं, वे स्वयं साक्षात् भगवान् गणेश, देवताओंके पूज्य भगवान् कार्तिकेय—ये सब मेरे घर आये हैं। देवताओंकी पूजनीया परात्परा सर्वश्रेष्ठा महालक्ष्मीने भी मेरे गृहमें पदार्पण किया है। जो लोकोंकी आदिरूपिणी, सर्वशक्तिस्वरूपा, मूलप्रकृति, ईश्वरी, परात्परोंमें भी परमश्रेष्ठ और परब्रह्मस्वरूपिणी हैं; शरत्कालमें भक्तिपूर्वक जिनके चरणोंकी समाराधना करके मनुष्य अपना अभीष्ट सिद्ध कर लेता है; जो परमाद्या, कृपामयी और कृपापरवश हो भारत-भूमिपर आविर्भूत हुई हैं; उन भक्तवत्सला साक्षात् माता पार्वतीका सम्पूर्ण देवताओं और गणोंके साथ मेरे मन्दिरमें शुभागमन हुआ है। दुर्गे ! चूँकि आप मेरे घर पधारी हैं, अतः मैं धन्य और कृतार्थ हो गया। मेरा जीवन सफल हो गया।
इस प्रकार वसुदेवजीने गलेमें वस्त्र बाँधकर हर्षपूर्वक क्रमशः परस्पर सभी देवों, मुनिवरों और विप्रोंकी स्तुति की और उन्हें पृथक्-पृथक् श्रेष्ठ रत्नसिंहासनोंपर बैठाया। फिर क्रमशः अलग-अलग उनकी विधिवत् पूजा की। तत्पश्चात् भक्तिभावित हृदयसे रत्न, मूँगा, मणि, मोती, माणिक्य, हीरा, भूषण, वस्त्र, सुगन्धित चन्दन और पुष्पमालाओंद्वारा ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनिसमूहों, ब्राह्मणों और पुरोहित गर्गजीका एक-एक करके वरण किया। तदनन्तर उस शुभ कर्मके अवसरपर सभीके मध्यभागमें स्थित एक रमणीय रत्नसिंहासनपर गणेशजीका पूजाके लिये वरण किया और जिसमें सात तीर्थोंका जल, पुष्प-चन्दनयुक्त शीतल, सुवासित स्वर्गगङ्गाका जल, पुष्करका पुण्यमय जल और समुद्रका जल भरा था, उस सुवर्णकलशसे तथा शुद्ध पञ्चामृत और पञ्चगव्यसे भक्तिभावसहित मन्त्रोच्चारणपूर्वक गणेशको स्नान कराया। फिर अग्निशुद्ध वस्त्र, रत्नोंके आभूषण, पारिजातपुष्पोंकी माला, गन्ध, चन्दन, पुष्प, रत्नोंकी माला और अंगूठी निवेदित की। नारद ! तत्पश्चात् जो समस्त देवताओंके अधिपति, शुभकारक, विघ्नोंके विनाशक, शान्त, ऐश्वर्यशाली और सनातन हैं; उन पार्वतीनन्दन गणेशकी वसुदेवजीने स्तुति की। (अध्याय ९९)