भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७३६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अदिति आदि देवियोंद्वारा पार्वतीका स्वागत-सत्कार, वसुदेवजीका देव-पूजन आदि माङ्गलिक कार्य करके बलराम और श्रीकृष्णका उपनयन करना, तत्पश्चात् नन्द आदि समागत अभ्यागतोंकी बिदाई और वसुदेव-देवकीका अनेकविध वस्तुओंका दान करना

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! तदनन्तर अदिति, दिति, देवकी, रोहिणी, रति, सरस्वती, पतिव्रता यशोदा, लोपामुद्रा, अरुन्धती, अहल्या तथा तारका—ये सभी महिलाएँ पार्वतीको देखकर तुरंत ही मन्दिरसे बाहर निकलीं और बारंबार आलिङ्गन करके उन्हें नमस्कार करने लगीं। तत्पश्चात् परस्पर वार्तालाप करके उन्हें एक रत्ननिर्मित महलमें प्रवेश कराया। वहाँ उन परमेश्वरीको रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया गया और वस्त्र, रत्नोंके आभूषणों तथा पुष्पमालाओंसे उनकी पूजा की गयी। तत्पश्चात् देवकीने भक्तिपूर्वक उनके चरणकमलोंमें इन्द्रद्वारा लाया गया पारिजातका मनोहर पुष्प निवेदन किया। फिर माँगमें सिन्दूरकी बेंदी और ललाटपर चन्दनका बिन्दु लगाकर उन दोनों बिन्दुओंके चारों ओर कस्तूरी और कुङ्कुम आदिका लेप किया। तत्पश्चात् मिष्टान्न भोजन कराया, सुवासित शीतल जल पीनेको दिया और कपूर आदिसे सुवासित सुन्दर एवं श्रेष्ठ पानका बीड़ा समर्पित किया। उनके दोनों चरणकमलोंके नखोंपर अलक्तक लगाकर पैरोंको कुङ्कुमसे रँग दिया और श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा की। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नारद! इस प्रकार पार्वतीदेवीका भलीभाँति पूजन करके वसुदेवजीकी प्रियतमा देवकीने क्रमशः मुनिपत्नियों, पति-पुत्रवती सतियों, राजकन्याओं, देवकन्याओं, सौन्दर्यशालिनी नाग-कन्याओं, मुनिकन्याओं और भाई-बन्धुओंकी कन्याओंका भी विधिवत् पूजन किया। कौतुकवश नाना प्रकारके सुन्दर बाजे बजवाये; माङ्गलिक कार्य कराया; ब्राह्मणोंको जिमाया; मथुराकी ग्रामदेवता भैरवी और मङ्गलचण्डिका षष्ठीकी षोडशोपचारद्वारा पूजा की। पुण्यकारक एवं मङ्गलमय शुद्ध स्वस्त्ययन तथा वेदोंका पाठ कराया। तदनन्तर पुत्रवत्सला देवकीने स्वर्गगङ्गाके उत्तम जलसे परिपूर्ण सुवर्णकलशसे बलरामसहित श्रीकृष्णको नहलाया और वस्त्र, चन्दन, माला तथा बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए मनोहर आभूषणोंसे उन दोनों बालकोंका शृङ्गार किया। नारद! यों माताद्वारा दिये गये आभूषणोंसे विभूषित हो बलराम और श्रीकृष्ण देवताओं और मुनिवरोंकी उस सभामें आये। उन जगदीश्वरको आये हुए देखकर स्वयं ब्रह्मा, शम्भु, शेषनाग, धर्म और सूर्य आदि सभी सभासद् बड़ी उतावलीके साथ अपने-अपने आसनोंसे उठकर खड़े हो गये। फिर देवगण, मुनिगण, कार्तिकेय, गणेश, भगवान् ब्रह्मा, शिव और अनन्त आदिने पृथक्-पृथक्