ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सकता । अतः यह निश्चय करनेके लिये कि कर्ता कौन है, अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है । वहाँ गौणरूपसे 'जीवात्मा कर्ता है' यह बात सिद्ध करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं— कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ॥ २ । ३ । ३३ ॥ कर्ता=कर्ता जीवात्मा है; शास्त्रार्थवत्त्वात्=क्योंकि विधि-निषेधबोधक शास्त्रकी इसीमें सार्थकता है । व्याख्या—श्रुतियोंमे जो बार-बार यह कहा गया है कि अमुक काम करना चाहिये, अमुक नहीं करना चाहिये । अमुक शुभकर्म करनेवालेको अमुक श्रेष्ठ फल मिलता है, अमुक पापकर्म करनेवालेको अमुक दुःख भोग करना पड़ता है, इत्यादि; यह जो शास्त्रका कथन है, वह किसी चेतनको कर्ता न माननेसे और जड प्रकृतिको कर्ता माननेसे भी व्यर्थ होता है; किन्तु शास्त्र-वचन कभी व्यर्थ नहीं हो सकता । इसलिये जीवात्माको ही समस्त कर्मोंका कर्ता मानना उचित है । इसके सिवा, श्रुति स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको कर्ता बतलाती है; ( प्र० उ० ४ । ९ ) यहाँ यह ध्यानमें रखना चाहिये कि अनादिकालसे जो जीवात्माका कारण- शरीरके साथ सम्बन्ध है, उसीसे जीवको कर्ता माना गया है, स्वरूपसे वह कर्ता नहीं है; क्योकि श्रुतिमें उसका स्वरूप निष्क्रिय बताया गया है । ( श्वेता० ६ । १२ ) यह बात इस प्रकरणके अन्तमे सिद्ध की गयी है । सम्बन्ध—जीवात्माके कर्ता होनेमें दूसरा हेतु बताया जाता है— विहारोपदेशात् ॥ २ । ३ । ३४ ॥ विहारोपदेशात्=स्वप्नमें स्वेच्छासे विहार करनेका वर्णन होनेसे भी ( यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा 'कर्ता' है ) । व्याख्या—शास्त्रके विधि-निषेधके सिवां, यह स्वप्नावस्थामें स्वेच्छापूर्वक घूमना- फिरना, खेल-तमाशा करना आदि कर्म करता है, ऐसा वर्णन है ( बृह० उ० ४ । ३ । १३; २ । १ । १८ ) इसलिये भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा कर्ता है, जड प्रकृतिमें स्वेच्छापूर्वक कर्म करना नहीं बनता । सम्बन्ध—तीसरा कारण बताते हैं— उपादानात् ॥ २ । ३ । ३५ ॥