भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1022, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1022

| १००८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ | | :--- | :--- |


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
वन्तो विषयास्तेषु; तस्य चैवम्भूतस्य आजानदेवैः समान आनन्द इत्येतदन्वाकृष्यते चशब्दात्।उनमें तृणारहित है; उस इस प्रकारके पुरुषका आनन्द भी आजानदेवोंके समान ही होता है—यह अर्थ ['यश्च' इसके] 'च' शब्दसे निकलता है।
तच्छतगुणीकृतपरिमाणः प्रजापतिलोके एक आनन्दो विराट्शरीरे। तथा तद्विज्ञानवाञ्छ्रोत्रियोऽधीतवेदश्चावृजिन इत्यादि पूर्ववत्; तच्छतगुणीकृतपरिमाण एक आनन्दो ब्रह्मलोके हिरण्यगर्भात्मनि। यश्चेत्यादि पूर्ववदेव। अतः परं गणितनिवृत्तिः।वह सौगुना किया हुआ आजानदेवोंका आनन्द प्रजापतिलोकमें—विराट् शरीरमें एक आनन्द है। तथा विराट्के उपासक श्रोत्रिय—अधीतवेद, निष्पाप, निष्काम पुरुषको भी वैसा ही आनन्द होता है—इत्यादि सब अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। उसके भी सौगुने किये हुए परिमाणवाला ब्रह्मलोकमें अर्थात् हिरण्यगर्भात्मामें एक आनन्द है। 'यश्च' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। इससे आगे गणनाकी निवृत्ति हो जाती है।
एष परम आनन्द इत्युक्तः; यस्य च परमानन्दस्य ब्रह्मलोकाद्यानन्दा मात्राः, उदधेरिव विप्रुषः।यह परम आनन्द है—ऐसा कहा गया है, समुद्रके बूँदके समान ब्रह्मलोकादिके आनन्द जिस परमानन्दके केवल अंशमात्र हैं।
एवं शतगुणोत्तरोत्तरवृद्ध्युपेता आनन्दा यत्रैकतां यान्ति, यश्च श्रोत्रियप्रत्यक्षोऽथैष एव सम्प्रसादलक्षणः परम आनन्दः। तत्र हि नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति;इस प्रकार उत्तरोत्तर सौगुनी वृद्धिको प्राप्त हुए आनन्द जहाँ एकताको प्राप्त हो जाते हैं और जो श्रोत्रियको प्रत्यक्ष है, वही सम्प्रसादरूप परम आनन्द है। वहीं न कोई दूसरा देखता है, न कोई दूसरा